आज के समय में सब्जी फसलों की खेती करने वाले किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है- इल्ली, तना छेदक और फल छेदक किट की समस्या। खासकर बैंगन की फसल में यह समस्या इतनी गंभीर हो जाती है कि कई बार 70 से 80 प्रतिशत तक फल नुकसानग्रस्त हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में किसान की पूरी मेहनत और लागत पर सीधा असर पड़ता है। इस लेख में हम किसान के दृष्टिकोण से इस समस्या को समझेंगे और उसके व्यावहारिक समाधान पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बैंगन की फसल में तना छेदक और फल छेदक कीट कैसे नुकसान पहुंचाते हैं। यह कीट पौधे के कोमल हिस्सों में अंडे देते हैं और जब उनसे इल्ली निकलती है तो वह तने या फल के अंदर घुसकर अंदर ही अंदर खाने लगती है। बाहर से पौधा सामान्य दिखाई देता है, लेकिन अंदर से पूरी तरह खोखला हो जाता है। फल में छेद दिखाई देता है और वह बाजार के लायक नहीं रहता। यही कारण है कि इस कीट को बैंगन की खेती का सबसे खतरनाक कीट माना जाता है।
किसानों की सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि जब तक उन्हें कीट का पता चलता है, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। इसलिए सबसे पहली रणनीति होनी चाहिए-समय पर पहचान और शुरुआती नियंत्रण। यदि छोटे-छोटे लक्षणों पर ही ध्यान दिया जाए, जैसे पत्तियों में छेद, मुरझाए हुए टॉप या छोटे फलों में छेद, तो शुरुआती अवस्था में ही नियंत्रण संभव है।
अब बात करते हैं नियंत्रण के उपायों की। बाजार में कई प्रकार की दवाइयां उपलब्ध हैं, लेकिन हर दवा हर क्षेत्र में उपलब्ध नहीं होती और हर दवा हर स्थिति में प्रभावी भी नहीं होती। इसलिए किसान को अपने अनुभव और स्थानीय उपलब्धता के आधार पर निर्णय लेना होता है। कई किसान अपने अनुभव के आधार पर कुछ विशेष दवाइयों का उपयोग करते हैं, जो लगातार अच्छे परिणाम देती हैं। यही व्यावहारिक खेती की सच्चाई है कि केवल किताबों की जानकारी नहीं, बल्कि खेत का अनुभव ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
इल्ली नियंत्रण के लिए जो रणनीति अपनाई जाती है, उसमें एक बात बहुत महत्वपूर्ण है- रोटेशन यानी दवाइयों का बदलाव। यदि किसान बार-बार एक ही रासायनिक दवा का उपयोग करता है, तो कीट उसमें प्रतिरोध विकसित कर लेता है और दवा असर करना बंद कर देती है। इसलिए समय-समय पर दवा बदलना जरूरी है।
स्प्रे के समय मात्रा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सामान्यतः 15 लीटर पानी के पंप में 15 से 20 मिली दवा का उपयोग किया जाता है, लेकिन यह पूरी तरह दवा के प्रकार और उसकी सांद्रता पर निर्भर करता है। अधिक मात्रा का उपयोग करने से फायदा नहीं होता, बल्कि पौधे को नुकसान भी हो सकता है और लागत भी बढ़ जाती है।
इसके साथ ही एक और महत्वपूर्ण चीज है-स्प्रे की तकनीक। केवल दवा डाल देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि दवा पौधे के हर हिस्से तक पहुंचे। खासकर पत्तियों के नीचे, तनों के जोड़ और छोटे फलों पर स्प्रे अच्छी तरह होना चाहिए। इसके लिए स्टिकर का उपयोग करना फायदेमंद रहता है, जिससे दवा पत्तियों पर अच्छी तरह चिपक जाती है और उसका असर बढ़ जाता है।
यदि हम एक समग्र दृष्टिकोण से देखें, तो केवल रासायनिक दवाइयों पर निर्भर रहना सही रणनीति नहीं है। हमें एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाना चाहिए। इसमें कुछ महत्वपूर्ण उपाय शामिल हैं जैसे- संक्रमित टहनियों और फलों को समय-समय पर तोड़कर नष्ट करना। खेत की नियमित निगरानी करना। फेरोमोन ट्रैप का उपयोग करना ताकि कीट की संख्या पर नजर रखी जा सके।
संतुलित उर्वरक प्रबंधन ताकि पौधा मजबूत रहे एक मजबूत और स्वस्थ पौधा कीटों का सामना बेहतर तरीके से कर सकता है। यदि पौधा कमजोर है, तो कीटों का प्रकोप तेजी से बढ़ता है। इसलिए पोषण प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कीटनाशक का उपयोग। कई किसान यह भी बताते हैं कि उन्होंने महंगी दवाइयां इस्तेमाल की लेकिन परिणाम नहीं मिला।
इसका कारण अक्सर गलत समय पर स्प्रे, गलत मात्रा या गलत तकनीक होती है। इसलिए यह जरूरी है कि किसान केवल दवा पर नहीं, बल्कि पूरे प्रबंधन पर ध्यान दे। आज के समय में एक और समस्या है-बाजार में दवाइयों के अलग-अलग नाम। कई बार एक ही तकनीकी तत्व अलग-अलग ब्रांड नाम से बिकता है, जिससे किसान भ्रमित हो जाता है।
इसलिए यह समझना जरूरी है कि दवा का असली काम उसका तकनीकी तत्व करता है, न कि उसका नाम। यदि किसान यह समझ लेता है, तो वह सही निर्णय ले सकता है। छोटे पौधों (नर्सरी या शुरुआती अवस्था) में हल्की और सुरक्षित दवाइयों का उपयोग करना चाहिए, क्योंकि इस अवस्था में पौधा संवेदनशील होता है। वहीं फूल और फल आने की अवस्था में थोड़ी मजबूत दवाइयों की जरूरत पड़ती है, लेकिन वहां भी सावधानी जरूरी है ताकि अवशेष की समस्या न हो।
अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात-अनुभव और सीख। खेती एक ऐसा क्षेत्र है जहां हर सीजन कुछ नया सिखाता है। जो किसान लगातार सीखता रहता है, वही आगे बढ़ता है। दूसरों के अनुभव से सीखना भी जरूरी है, लेकिन अपने खेत की परिस्थितियों को समझकर निर्णय लेना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए किसान भाइयों, इल्ली और तना छेदक जैसी समस्याओं से घबराने की जरूरत नहीं है। सही समय पर पहचान, संतुलित दवा का उपयोग, और सही प्रबंधन अपनाकर इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
यह भी पढ़े: खेत की मेड़ या दिलों की दरार? क्या चंद इंच ज़मीन रिश्तों से ज़्यादा कीमती है
जागरूक रहिए व नुकसान से बचिए और अन्य लोगों के जागरूकता के लिए साझा करें एवं कृषि जागृति, स्वास्थ्य सामग्री, सरकारी योजनाएं, कृषि तकनीक, व्यवसायिक एवं जैविक खेती से संबंधित जानकारियां प्राप्त करने के लिए जुड़े कृषि जागृति चलो गांव की ओर से या कृषि संबंधित किसी भी समस्या के जैविक समाधान के लिए WhatsApp करें।
