आज मैं आपसे एक ऐसी जरूरी बात साझा करना चाहता हूँ जो सीधे हमारी सेहत, परिवार और खेती के भविष्य से जुड़ी हुई है। हम सभी खेती में कीटनाशक, फफूंदनाशक और खरपतवारनाशक दवाओं का उपयोग करते हैं, क्योंकि बिना इनके कई बार फसल बचाना मुश्किल हो जाता है। लेकिन क्या आपने कभी दवा खरीदते समय उसके डिब्बे या बोतल पर बने रंगीन तिकोने निशान को ध्यान से देखा है? यह केवल डिजाइन नहीं होता, बल्कि किसानों की सुरक्षा का संकेत होता है।
एक जागरूक किसान होने के नाते किसानों को इन संकेतों को समझना बहुत जरूरी है। किसान अक्सर बाजार जाते हैं और दुकानदार से कहते हैं कि ऐसी दवा दे दीजिए जिससे कीट तुरंत खत्म हो जाए। कई बार दुकानदार भी जल्दी असर वाली या ज्यादा महंगी दवा दे देता है। लेकिन हम यह नहीं सोचते कि वह दवा हमारे शरीर, हमारे परिवार और खेत की मिट्टी पर क्या असर डालेगी। यही वजह है कि आज कई किसानों को त्वचा, सांस और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
इसलिए अब समय आ गया है कि हम केवल फसल ही नहीं, अपनी सुरक्षा को भी प्राथमिकता दें। सबसे पहले बात करते हैं लाल रंग के तिकोने निशान की। यह श्रेणी अत्यधिक जहरीली दवाओं की होती है। ऐसी दवाएं मनुष्य, पशु, पक्षी और पर्यावरण के लिए बहुत ही खतरनाक होती हैं। कई बार इनके संपर्क में आने से गंभीर बीमारी या जान का खतरा भी हो सकता है। मेरे अनुभव में, जब तक बहुत अधिक मजबूरी न हो, इन दवाओं से दूरी बनाकर रखना ही बेहतर है। किसानों को थोड़ी कम प्रभाव वाली लेकिन सुरक्षित दवा अपनाना ज्यादा समझदारी है।
दूसरी श्रेणी पीले रंग की होती है, जिसे उच्च विषाक्त माना जाता है। इन दवाओं का उपयोग करते समय पूरी सुरक्षा जरूरी होती है। लेकिन हमारे गांवों में अक्सर देखा जाता है कि किसान बिना मास्क, बिना दस्ताने और साधारण कपड़ों में ही छिड़काव कर देते हैं। कई बार हवा की दिशा भी नहीं देखते। यही लापरवाही धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती है। इसलिए यदि ऐसी दवा का उपयोग करना पड़े, तो हमेशा सुरक्षा उपकरण जरूर अपनाएं।
तीसरी श्रेणी नीले रंग की होती है, जिसे मध्यम विषाक्त कहा जाता है। यह अपेक्षाकृत कम हानिकारक होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसमें कोई खतरा नहीं है। हमें हमेशा सुबह या शाम के समय छिड़काव करना चाहिए, जब हवा कम हो। छिड़काव के बाद नहाना और कपड़े बदलना भी जरूरी है। यह छोटी-छोटी आदतें हमें लंबे समय तक स्वस्थ रख सकती हैं।
चौथी श्रेणी हरे रंग की होती है, जिसे कम विषाक्त या अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है। आज के समय में टिकाऊ खेती और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए हमें इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। जैविक, नीम आधारित या कम जहरीली दवाओं का उपयोग करने से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, लाभकारी कीट सुरक्षित रहते हैं और उत्पादन भी स्थिर रहता है। कई किसान अब इसी सोच के साथ खेती कर रहे हैं और अच्छा लाभ भी ले रहे हैं।
एक किसान के रूप में मैं यह मानता हूँ कि किसान केवल उत्पादन के पीछे न भागें, बल्कि सुरक्षित और टिकाऊ खेती को अपनाएं। यदि हम स्वस्थ रहेंगे, तभी खेती कर पाएंगे और परिवार का भविष्य सुरक्षित रहेगा। इसलिए दवा खरीदते समय हमेशा लेबल पढ़ें, तिकोने रंग को पहचानें और जरूरत के अनुसार ही दवा लें। ज्यादा दवा या ज्यादा जहरीली दवा हमेशा ज्यादा फायदा नहीं देती।
आज खेती केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। हमें अपने खेत, मिट्टी, पानी और शरीर की रक्षा करनी है। जागरूक किसान ही सफल किसान होता है। आइए, हम सभी मिलकर सुरक्षित खेती की ओर कदम बढ़ाएं और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें।
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