गेहूं में जिसे कई किसान पीली हल्दी वाला रोग कहते हैं, वह अधिकतर मामलों में पीला रतुआ रोग होता है। इसका वैज्ञानिक नाम Puccinia Striiformis है और यह एक फफूंद जनित रोग है। यह रोग खासतौर पर ठंडे, नम और ओस वाले मौसम में तेजी से फैलता है, इसलिए फरवरी-मार्च के समय किसानों को अधिक सतर्क रहने की जरूरत होती है।
उत्तर भारत के कई हिस्सों, विशेषकर गंगा के मैदानी क्षेत्रों में, जहां सर्दियों में तापमान 10 से 15 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है और सुबह ओस गिरती है, वहां इसका प्रकोप तेजी से देखा जाता है। पीला रतुआ रोग की पहचान करना अपेक्षाकृत सरल है। सबसे पहले गेहूं की पत्तियों पर पीली धारियां सीधी पंक्तियों में दिखाई देती हैं। ये धारियां नसों के समानांतर चलती हैं। यदि आप संक्रमित पत्ती को हाथ से रगड़ें, तो पीला चूर्ण जैसा पाउडर उंगलियों पर लग जाता है, जो हल्दी जैसा प्रतीत होता है।
शुरुआत में यह लक्षण निचली पत्तियों पर दिखाई देते हैं, लेकिन यदि समय पर नियंत्रण न किया जाए तो यह ऊपर की पत्तियों, यहां तक कि बालियों तक पहुंच सकता है। अधिक संक्रमण की स्थिति में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है, जिससे दाने भरने की क्षमता कम हो जाती है। उत्पादन पर इसका प्रभाव गंभीर हो सकता है।
यदि रोग प्रारंभिक अवस्था में आ जाए और नियंत्रण न किया जाए, तो 20 से 50 प्रतिशत तक उपज में कमी संभव है। दानों का आकार छोटा रह जाता है, वजन घट जाता है और बाजार में गुणवत्ता के आधार पर भाव भी कम मिल सकता है। जिन खेतों में अत्यधिक नाइट्रोजन का उपयोग किया गया हो, वहां पौधे कोमल रहते हैं और रोग का प्रकोप अधिक तेजी से बढ़ता है।
इस रोग को नियंत्रण करने के लिए नियमित रूप से गेहूं की निगरानी करना सबसे महत्वपूर्ण है। जैसे ही इस रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई दें, तुरंत जैविक फफूंदनाशी का छिड़काव करें। इसके लिए आप 150 लीटर पानी एक लीटर जी-बायो फॉस्फेट एडवांस को किसी छायादार स्थान पर मिलाकर प्रति एकड़ खेत में संध्या के समय स्प्रे करें।
यदि संक्रमण अधिक हो या मौसम अनुकूल बना रहे, तो 10 दिन के अंतराल पर पुनः स्प्रे करना उचित है। छिड़काव सुबह या शाम के समय करें, जब हवा कम हो, ताकि दवा का अधिकतम प्रभाव मिल सके। आप रासायनिक नियंत्रण करते है तो इसके साथ-साथ सांस्कृतिक उपाय भी आवश्यक हैं। संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाएं, नाइट्रोजन की मात्रा विभाजित खुराक में दें और खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था रखें।
अधिक घनी बुवाई से बचें ताकि वायु संचार बना रहे। भविष्य के लिए रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना एक दीर्घकालिक रणनीति है। समय पर बुवाई और प्रमाणित बीज का उपयोग भी जोखिम कम करता है। सबसे सरल और आसान फसल चक्र अपनाएं। लगातार एक ही खेत में गेहूं की बुआई कर रहे हैं और हर साल गेहूं की फसल में रतुआ रोग लग रहा है तो अगले साल दूरी फसल की बुआई करें।
देश की जनता के लिए गेहूं प्रमुख खाद्यान्न फसल है और देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ी है। इसलिए पीला रतुआ जैसे रोगों के प्रति जागरूक रहना और शुरुआती अवस्था में ही जैविक प्रबंधन अपनाना अत्यंत आवश्यक है। नियमित रूप से खेत निरीक्षण, संतुलित पोषण और समय पर पोषक तत्वों का छिड़काव करके किसान अपनी गेहूं की फसल को रोगों से सुरक्षित रख सकते हैं और बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
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