देश के किसानों के लिए खाद की उपलब्धता और कीमत हमेशा सबसे बड़ा मुद्दा रहती है। खरीफ सीजन के दौरान यूरिया की मांग अपने चरम पर होती है और यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ जाएं या आपूर्ति बाधित हो जाए तो इसका सीधा असर भारत की कृषि और सरकार दोनों पर पड़ता है। लेकिन इस बार किसानों के लिए राहत भरी खबर आई है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया 40% सस्ता: चीन की नीति में ढील बनी वजह
अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में जून 2026 के दौरान मई की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट ऐसे समय आई है जब कुछ सप्ताह पहले तक मध्य-पूर्व में तनाव और वैश्विक आपूर्ति को लेकर बड़ी चिंताएं बनी हुई थीं। कीमतों में आई इस कमी से भारत सरकार को राहत मिली है और किसानों के लिए भी खाद की उपलब्धता बेहतर रहने की उम्मीद बढ़ी है।
इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण चीन द्वारा यूरिया निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों में आंशिक ढील माना जा रहा है। पिछले कुछ समय से चीन ने अपने घरेलू बाजार को प्राथमिकता देते हुए यूरिया के निर्यात पर सख्ती कर दी थी। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति घट गई और कीमतें तेजी से बढ़ गईं। लेकिन जब चीन ने निर्यात में कुछ राहत दी, तो वैश्विक बाजार में यूरिया की उपलब्धता बढ़ी और कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिली।
वैश्विक बाजार के आंकड़े: जून 2026 में यूरिया के क्या रहे दाम?
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की औसत कीमत लगभग 572 अमेरिकी डॉलर प्रति टन रही। हालांकि यह कीमत जून 2025 के लगभग 395 डॉलर प्रति टन की तुलना में अभी भी करीब 45 प्रतिशत अधिक है, लेकिन मई की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत की गिरावट भारतीय बाजार के लिए राहत लेकर आई है।
खरीफ 2026: भारत में यूरिया का पर्याप्त स्टॉक और घरेलू उत्पादन
भारत दुनिया के सबसे बड़े यूरिया उपभोक्ताओं में शामिल है। देश में बड़ी मात्रा में घरेलू उत्पादन होता है, लेकिन मांग पूरी करने के लिए हर साल लाखों टन यूरिया का आयात भी करना पड़ता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर सरकार के उर्वरक सब्सिडी खर्च और आपूर्ति व्यवस्था दोनों पर पड़ता है।
उद्योग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, खरीफ 2026 सीजन के लिए भारत के पास पर्याप्त यूरिया का भंडार उपलब्ध है। सरकार लगातार वैश्विक परिस्थितियों पर नजर बनाए हुए है ताकि किसी भी संभावित आपूर्ति संकट से पहले आवश्यक आयात और भंडारण की व्यवस्था की जा सके। इसका उद्देश्य यही है कि किसानों को बुवाई और फसल की महत्वपूर्ण अवस्थाओं में खाद की कमी का सामना न करना पड़े।
DAP, पोटाश और सल्फर के मोर्चे पर अभी भी बनी है चुनौती
हालांकि यूरिया के मोर्चे पर राहत मिली है, लेकिन अन्य उर्वरकों की स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP), फॉस्फोरिक एसिड और सल्फर जैसी सामग्रियों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें पिछले वर्ष की तुलना में अभी भी ऊंची हैं।
विशेष रूप से सल्फर की कीमत लगभग 1,050 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 265 प्रतिशत अधिक बताई जा रही है। वहीं अमोनिया की कीमतें भी सालाना आधार पर लगभग 95 प्रतिशत ऊंची बनी हुई हैं। इसका मतलब यह है कि फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरकों पर अभी भी लागत का दबाव बना हुआ है।
उर्वरक क्षेत्र को मजबूत करने के लिए सरकार की नई नीति
भारत सरकार ने भी उर्वरक क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यूरिया क्षेत्र से संबंधित नई नीति को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य घरेलू उत्पादन को बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना और किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराना है। यदि घरेलू उत्पादन लगातार बढ़ता है तो भविष्य में वैश्विक बाजार की अस्थिरता का असर भारत पर कम पड़ेगा।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार मई और जून 2026 के दौरान देश में यूरिया का उत्पादन निर्धारित लक्ष्य से अधिक रहा। इससे भी सरकार को पर्याप्त स्टॉक बनाने में मदद मिली है और खरीफ सीजन के दौरान आपूर्ति को लेकर भरोसा बढ़ा है।
किसानों के लिए सलाह: संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाएं
किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि फिलहाल यूरिया की उपलब्धता को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि आवश्यकता से अधिक यूरिया का उपयोग किया जाए। कृषि वैज्ञानिक लगातार सलाह देते हैं कि केवल यूरिया पर निर्भर रहने के बजाय संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाया जाए। मृदा परीक्षण के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, सल्फर और सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग करने से लागत भी कम होती है और उत्पादन भी बेहतर मिलता है।
निष्कर्ष: यूरिया की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आई गिरावट निश्चित रूप से भारत के लिए राहत की खबर है, लेकिन वैश्विक बाजार अभी भी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है। इसलिए सरकार आयात स्रोतों में विविधता लाने, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और पर्याप्त भंडारण बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है।
यदि यही स्थिति बनी रहती है, तो आने वाले महीनों में किसानों को यूरिया की उपलब्धता बेहतर रहने की संभावना है और सरकार पर उर्वरक सब्सिडी का अतिरिक्त दबाव भी कुछ हद तक कम हो सकता है। हालांकि डीएपी, पोटाश और अन्य उर्वरकों की कीमतों पर अभी भी नजर बनाए रखना जरूरी होगा।
Frequently Asked Questions (FAQ)
Q. जून 2026 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में कितनी गिरावट आई है?
उत्तर: जून 2026 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में मई की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत की गिरावट आई है, जिससे इसकी औसत कीमत लगभग 572 अमेरिकी डॉलर प्रति टन हो गई है।
Q. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूरिया सस्ता होने का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: इसका मुख्य कारण चीन द्वारा अपने यूरिया निर्यात प्रतिबंधों में दी गई आंशिक ढील है, जिससे वैश्विक बाजार में यूरिया की आपूर्ति (Supply) बढ़ी है।
Q. क्या खरीफ 2026 सीजन के लिए भारत में यूरिया की कोई कमी होगी?
उत्तर: बिल्कुल नहीं। भारत में मई-जून 2026 के दौरान यूरिया का घरेलू उत्पादन लक्ष्य से अधिक रहा है और खरीफ सीजन के लिए देश के पास पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।
Q. यूरिया के अलावा क्या DAP और पोटाश (MOP) की कीमतें भी कम हुई हैं?
उत्तर: नहीं, DAP, पोटाश, सल्फर और अमोनिया जैसे कच्चे माल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें पिछले वर्ष की तुलना में अभी भी ऊंची बनी हुई हैं, जिससे फॉस्फेटिक और पोटाश खाद पर लागत का दबाव है।
Q. यूरिया का उपयोग करते समय किसानों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: किसानों को केवल यूरिया के अत्यधिक प्रयोग से बचना चाहिए और मिट्टी की जांच (Soil Test) की रिपोर्ट के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर का संतुलित उपयोग करना चाहिए।
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