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पश्चिम एशिया तनाव से भारतीय किसानों की खेती में लागत बढ़ने का खतरा..!

23/03/2026 by krishijagriti5

पश्चिम एशिया तनाव से भारतीय किसानों की खेती में लागत बढ़ने का खतरा..!

किसानों के लिए हाल ही में सामने आई एक खबर खेती के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन सकती है। वैश्विक स्तर पर चल रहे संघर्षों का असर अब सीधे खेती-किसानी पर पड़ने लगा है। रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित होने के कारण कीटनाशकों यानी पेस्टिसाइड के दाम 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं, जिसका सीधा असर किसानों की लागत और आय पर पड़ेगा।

खबर में बताया गया है कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट प्रभावित हुए हैं। इसका असर यह हुआ है कि कीटनाशक बनाने में उपयोग होने वाला कच्चा माल समय पर नहीं पहुंच पा रहा है। जब कच्चा माल महंगा या कम उपलब्ध होगा, तो स्वाभाविक है कि तैयार दवाइयों के दाम भी बढ़ेंगे। इससे किसानों के लिए खेती की लागत और बढ़ जाएगी।

किसानों के लिए पहले ही बीज, खाद, डीजल और मजदूरी की लागत बढ़ चुकी है। ऐसे में अगर कीटनाशक भी महंगे हो जाते हैं, तो खेती करना और चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। खासकर सब्जी, कपास, धान और फल वाली फसलों में कीटनाशकों का उपयोग ज्यादा होता है, इसलिए इन फसलों के किसानों पर इसका ज्यादा असर पड़ सकता है।

खबर में यह भी बताया गया है कि देश में जरूरी कीटनाशकों की कमी भी हो सकती है। अगर समय पर दवा उपलब्ध नहीं होगी, तो किसान सही समय पर कीट नियंत्रण नहीं कर पाएंगे, जिससे फसल को नुकसान होने का खतरा बढ़ जाएगा। इसका असर सीधे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों पर पड़ेगा। दूसरी तरफ, उर्वरकों को लेकर थोड़ी राहत की बात भी सामने आई है।

यूरिया और डीएपी के आयात में 63 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे फिलहाल देश में उर्वरकों की कमी नहीं होने की उम्मीद है। सरकार का कहना है कि पहले से पर्याप्त स्टॉक होने के कारण किसानों को खाद की उपलब्धता में दिक्कत नहीं आएगी। लेकिन किसानों के लिए असली चिंता कीटनाशकों की लागत और उपलब्धता को लेकर है।

अगर दवाइयां महंगी होंगी, तो कई किसान कम मात्रा में या गलत समय पर छिड़काव करेंगे, जिससे कीट और रोग का प्रकोप बढ़ सकता है। इससे फसल का उत्पादन घटेगा और बाजार में सही दाम भी नहीं मिलेगा। ऐसी स्थिति में किसानों को कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने की जरूरत है। सबसे पहले, बिना जरूरत के कीटनाशकों का उपयोग बंद करें। केवल तभी दवा का छिड़काव करें जब खेत में कीट का स्तर आर्थिक नुकसान की सीमा से ऊपर पहुंच जाए। इससे दवा की बचत होगी और लागत कम होगी।

दूसरा, जैविक और पोषक तत्वों को अपनाने की कोशिश करें। नीम तेल, दशपर्णी अर्क और फेरोमोन ट्रैप जैसे उपाय सस्ते और सुरक्षित होते हैं। इससे कीटों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है और रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम होती है।

तीसरा, एक ही रासायनिक दवा का बार-बार उपयोग करने से बचें। इससे कीटों में प्रतिरोध बढ़ जाता है और बाद में दवाएं असर करना बंद कर देती हैं। इसलिए दवाओं का रोटेशन अपनाएं और अलग-अलग समूह की दवाओं का उपयोग करें।

चौथा, किसान समूह बनाकर या समूह में खरीदारी करें। इससे थोक में दवाइयां सस्ती मिल सकती हैं और नकली दवाओं से भी बचाव होगा। साथ ही, सही जानकारी और सलाह भी आसानी से मिलती है।

किसानों के लिए यह समय सतर्क रहने का है। बदलते वैश्विक हालात का असर अब सीधे भारतीय खेती पर पड़ रहा है। ऐसे में समझदारी से फैसले लेना बहुत जरूरी है। अगर आप सही समय पर सही मात्रा में दवा का उपयोग करेंगे और वैकल्पिक उपाय अपनाएंगे, तो इस बढ़ती लागत के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

अंत में यही कहना है कि खेती अब सिर्फ मेहनत का नहीं, बल्कि समझदारी और सही प्रबंधन का काम भी बन चुका है। हालात चाहे जैसे भी हों, अगर किसान जागरूक रहेगा तो नुकसान को कम किया जा सकता है और मुनाफा बनाए रखा जा सकता है।

यह भी पढ़े: पश्चिम एशिया के तनाव ने बिगाड़ा ब्यादगी मिर्च बाजार, निर्यात ठप होने के संकेत..!

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