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बजट में छोटे और सीमांत किसानों को क्या मिला..!

27/02/2026 by krishijagriti5

बजट में छोटे और सीमांत किसानों को क्या मिला..!

भारत में कृषि आज भी करीब 45 से 50 प्रतिशत कार्यबल को आजीविका प्रदान करती है और सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान 18 प्रतिशत से अधिक है, किसान केवल सरकारी योजनाओं के लाभार्थी नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता, खाद्य सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और ग्रामीण विकास की केंद्रीय धूरि हैं। केंद्रीय बजट 2026 में पहली बार किसान को ऐसे उद्यमी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास दिखता है, जो मूल्य-श्रृंखलाओं, बाजारों, निर्यात संभावनाओं व तकनीक समर्थित प्रणालियों से सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है।

ग्रामीण आय का एक महत्वपूर्ण, लेकिन, कम चर्चित आधार पशुपालन है, जो कृषि आय का लगभग 16 प्रतिशत योगदान देता है और छोटे- सीमांत किसानों के लिए अपेक्षाकृत स्थिर आजीविका प्रदान करता है। बजट में पशु चिकित्सा कॉलेजों, अस्पतालों, डायग्नोस्टिक लैब और प्रजनन केंद्रों के लिए ऋण-संलग्न पूंजी सब्सिडी के माध्यम से पशु चिकित्सकों की कमी दूर करने, बीस हजार से अधिक पेशेवरों को जोड़ने और वैश्विक सहयोग की बात की गई है।

इसी क्रम में मत्स्य पालन को आय विविधीकरण के रणनीतिक क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करते हुए 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों के एकीकृत विकास, स्टार्टअप्स, महिला-नेतृत्व वाले समूहों और मछुआ एफपीओ की भागीदारी का प्रस्ताव रखा गया है। हालांकि, आसान और कम ब्याज ऋऋण, ऋऋण गारंटी और जोखिम साझेदारी जैसे वित्तीय साधनों के अभाव में इन पहलों का जमीनी प्रभाव सीमित रह जाने की आशंका बनी रहती है। बजट में उच्च-मूल्य कृषि पर दिया गया विशेष जोर पारंपरिक अनाज-केंद्रित नीति से स्पष्ट विचलन को दर्शाता है।

विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में नारियल, कोको, काजू, चंदन, अगरवुड तथा पर्वतीय क्षेत्रों में अखरोट, बादाम और पाइन नट्स को समर्थन देना इस स्वीकारोक्ति को दर्शाता है कि किसानों की आय में वास्तविक वृद्धि विविधीकरण और मूल्य-संवर्धन से ही संभव है। दुनिया के सबसे बड़े नारियल उत्पादक के रूप में भारत में लगभग तीन करोड़ लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है और पुराने, कम उत्पादक पेड़ों के प्रतिस्थापन और उन्नत किस्मों को बढ़ावा देने की योजना व्यावहारिक सुधार की समझ दिखाती है।

इंडियन काजू और इंडियन कोको को 2030 तक वैश्विक ब्रांड बनाने का लक्ष्य बताता है कि कृषि नीति अब उत्पादन से आगे बढ़कर ब्रांडिंग, निर्यात और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जुड़ रही है। हालांकि, उच्च मूल्य कृषि को अनाज सुरक्षा, न्यूनतम समर्थन मूल्य और जोखिम प्रबंधन तंत्र का विकल्प नहीं बनाया जा सकता, संतुलन के अभाव में यह मॉडल कुछ क्षेत्रों और बड़े उत्पादकों तक सीमित रह जाने का जोखिम रखता है।

भारत-विस्टार जैसे बहुभाषी कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्लेटफॉर्म के माध्यम से कृषि स्टैक और आइसीएआर की जानकारी को जोड़कर किसानों को वैयक्तिक सलाह देने का प्रयास स्वागतयोग्य है। इसकी सफलता डिजिटल साक्षरता, इंटरनेट कनेक्टिविटी और संस्थागत विश्वास पर निर्भर करेगी, जो आज भी देश के बड़े ग्रामीण हिस्से में असमान रूप से उपलब्ध हैं। पिछले कुछ वर्षों से मोटे अनाज, जैविक खेती और देसी बीजों को लेकर पहले बनी नीति-दिशा इस बजट में लगभग गायब है- न इनके संरक्षण, न प्रसार और न ही विपणन के लिए ठोस प्रावधान हैं।

इसी तरह कृषि को सशक्त बनाने में पानी और मिट्टी की भूमिका निर्णायक होती है। किंतु, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने तथा जैविक खाद के उत्पादन और उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए इस बजट में किसी प्रकार का अनुदान या प्रोत्साहन नहीं दिया गया है। पाकिस्तान के साथ इंडस वाटर ट्रीटी से जुड़े हालिया घटनाक्रमों के बाद यह अपेक्षा थी कि इस संधि से प्राप्त जल का उपयोग सिंचाई विस्तार के लिए किया जाएगा और नदियों के जल प्रवाह का लाभ पश्चिमी और मध्य भारत तक पहुंचेगा, नदियों को जोडने की बहुप्रतीक्षित योजना बजट में अनुपस्थित है।

प्रसंस्करण और विनिर्माण के माध्यम से सीधे किसान को लाभ पहुंचाने वाली नीतियां भी अस्पष्ट हैं। खाद और बीज जैसे कृषि इनपुट्स को टैक्स फी करने, देसी बीजों के संरक्षण और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप शोध व नवाचार पर भी विशेष जोर नहीं दिया गया है। यह बजट एक गहरे द्वंद्व को उजागर करता है। एक ओर किसान को उद्यमी बनाने, उसे तकनीक, बाजार और वैश्विक ब्रांडिंग से जोडने की महत्वाकांक्षा है, दूसरी ओर वही किसान पानी, मिट्टी, बिजली, बीज, खाद, सस्ते ऋऋण और जोखिम-सुरक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के स्तर पर लगभग अकेला छोड़ दिया गया है।

प्रश्न यह नहीं है कि भारत वैश्विक कृषि ब्रांड बनेगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत का छोटा किसान उस ब्रांड का साझेदार बनेगा। केवल कच्चा माल उपलब्ध कराने वाला। जब तक कृषि नीति का संतुलन बाजार और संरक्षण, उद्यमिता और सुरक्षा और स्थानीय स्थायित्व के बीच स्थापित नहीं होता, तब तक किसान केंद्रित विकास एक आकर्षक नारा ही बना रहेगा, जमीनी सच्चाई नहीं।

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