मार्च के महीने में तापमान तेजी से बढ़ना शुरू हो जाता है। इस समय अधिकतर गेहूं की फसल दूधिया अवस्था में होती है। यदि इस दौरान अचानक गर्म हवाएं चलें या तापमान सामान्य से अधिक हो जाए, तो दानों का भराव प्रभावित होता है। परिणामस्वरूप दाना पतला, सिकुड़ा हुआ और हल्का रह जाता है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में कमी आती है।
ऐसी स्थिति में जी-एमिनो प्लस, जी-बायो ह्यूमिक और जी-सी लिक्विड का प्रयोग फसल को गर्मी के तनाव से बचाने में सहायक माना जाता है। इसे पौधों की एस्पिरिन भी कहा जाता है, क्योंकि यह तनाव की स्थिति में पौधों की आंतरिक रक्षा प्रणाली को सक्रिय करता है।
इस जैविक पोषक तत्वों के प्रमुख लाभ
पहला- यह पौधे के अंदरूनी जैव रासायनिक क्रियाओं को संतुलित रखकर तापमान के प्रभाव को कम करने में मदद करता है।
दूसरा- यह पत्तियों से अत्यधिक वाष्पोत्सर्जन को नियंत्रित करता है, जिससे पौधे में नमी बनी रहती है और सूखे के प्रति सहनशीलता बढ़ती है।
तीसरा- यह दानों के उचित भराव में मदद करता है, जिससे दाना पिचकता नहीं और वजनदार बनता है।
चौथा- यह पौधे की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, जिससे फसल अन्य तनाव कारकों से भी बेहतर तरीके से मुकाबला कर पाती है।
प्रयोग का सही समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब गेहूं की फसल दूधिया अवस्था में हो और दाना बन रहा हो, तभी इसका छिड़काव करना चाहिए। स्प्रे हमेशा शाम के समय करें या ठंडे वातावरण में, जब धूप कम हो जाए और तापमान अपेक्षाकृत कम हो। इससे घोल का अवशोषण बेहतर होता है और पत्तियों पर जलन का खतरा कम रहता है।
मात्रा की बात करें तो इन पोषक तत्वों की मात्रा 100 ग्राम प्रति एकड़ पर्याप्त मानी जाती है। ध्यान रखें 150 लीटर पानी में अच्छी तरह मिलाकर प्रति एकड़ खेत में छिड़काव करें। टैंक में घोल को अच्छी तरह मिलाना जरूरी है ताकि समान रूप से स्प्रे हो सके।
बेहतर परिणाम के लिए इन्हें जी-पोटाश के साथ मिलाकर स्प्रे किया जा सकता है। इससे दानों में बेहतर भराव, चमक और वजन प्राप्त होता है। पोटाश की उपलब्धता बढ़ने से पौधे की गर्मी सहन करने की क्षमता भी मजबूत होती है।
इसके साथ-साथ खेत में हल्की सिंचाई का प्रबंधन भी आवश्यक है, ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे। अत्यधिक पानी भराव से बचें, लेकिन फसल को सूखे तनाव में न जाने दें।
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