किसान भाइयों, गेहूं की अच्छी पैदावार केवल अच्छे बीज पर निर्भर नहीं करती, बल्कि बुवाई के समय खाद एवं उर्वरकों का सही प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है। अगर शुरुआत में फसल को जरूरत के अनुसार पोषक तत्व नहीं मिलते, तो जड़ों का विकास, पौधों की बढ़वार और कल्ले निकलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
इसलिए खेत तैयार करते समय ही खाद की योजना बना लेनी चाहिए। लेकिन ध्यान रखें कि हर खेत में एक जैसी खाद और एक जैसी मात्रा डालना सही नहीं है। मिट्टी की जांच, पिछली फसल, उपलब्ध नमी, गेहूं की किस्म और पहले से खेत में मौजूद पोषक तत्वों के आधार पर उर्वरक की मात्रा तय करनी चाहिए।
पहला विकल्प: DAP के साथ खाद प्रबंधन
गेहूं की बुवाई में किसान सामान्यतः डीएपी का इस्तेमाल करते हैं। डीएपी से फसल को नाइट्रोजन और फास्फोरस मिलता है। फास्फोरस शुरुआती जड़ों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक किसान द्वारा बताए गए विकल्प में प्रति एकड़ 50 से 55 किलोग्राम डीएपी, 20 से 25 किलोग्राम एमओपी और 20 से 25 किलोग्राम यूरिया शामिल है।
हालांकि, इसे हर खेत के लिए निश्चित सिफारिश नहीं मानना चाहिए। डीएपी से मिलने वाली नाइट्रोजन को भी कुल नाइट्रोजन की गणना में शामिल करें। एमओपी यानी पोटाश तभी डालें, जब मिट्टी में पोटाश की कमी हो या स्थानीय कृषि सिफारिश के अनुसार इसकी जरूरत हो। यूरिया की मात्रा भी मिट्टी की उर्वरता और पूरी फसल के लिए निर्धारित नाइट्रोजन की जरूरत के अनुसार तय करें।
दूसरा विकल्प: NPK 12:32:16 का संतुलित विकल्प
जिन किसानों के पास डीएपी के स्थान पर एनपीके 12:32:16 उपलब्ध है, वे इस उर्वरक को भी पोषक तत्वों की जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं। एक किसान द्वारा बताए गए विकल्प में प्रति एकड़ 60 से 75 किलोग्राम एनपीके 12:32:16 और 15 से 20 किलोग्राम यूरिया दिया गया है। लेकिन यहां एक जरूरी बात समझिए।
एनपीके 12:32:16 में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश तीनों मौजूद होते हैं। इसलिए इसे डालने के बाद अलग से यूरिया या पोटाश की मात्रा तय करते समय यह देखना जरूरी है कि फसल को कुल कितने पोषक तत्व मिल रहे हैं। केवल ज्यादा खाद डालने से ज्यादा पैदावार की गारंटी नहीं मिलती। संतुलित पोषण और सही समय पर सिंचाई अधिक महत्वपूर्ण हैं।
तीसरा विकल्प: SSP के साथ खाद प्रबंधन
सिंगल सुपर फॉस्फेट यानी एसएसपी भी गेहूं में फास्फोरस उपलब्ध कराने का एक विकल्प है। इसमें फास्फोरस के साथ सल्फर और कैल्शियम भी मिलता है। एक किसान द्वारा बताए गए विकल्प में प्रति एकड़ 150 किलोग्राम एसएसपी, 35 से 40 किलोग्राम यूरिया और 20 से 25 किलोग्राम एमओपी शामिल हैं।
यह मात्रा भी खेत की जरूरत और मिट्टी की जांच के अनुसार समायोजित की जानी चाहिए। एसएसपी की सही मात्रा तय करते समय उसकी पैकिंग पर लिखी पोषक तत्वों की मात्रा देखें। अगर मिट्टी में पोटाश पर्याप्त है, तो एमओपी डालना जरूरी नहीं हो सकता। इसी तरह यूरिया की मात्रा निर्धारित नाइट्रोजन की जरूरत के हिसाब से रखें, ताकि फसल में अनावश्यक नाइट्रोजन न जाए।
सल्फर और जिंक का प्रबंधन भी समझें
गेहूं की फसल में सल्फर की जरूरत मिट्टी की स्थिति और पहले दिए गए उर्वरकों पर निर्भर करती है। एसएसपी इस्तेमाल करने पर कुछ सल्फर पहले से मिल जाता है, लेकिन इससे यह जरूरी नहीं कि हर खेत में सल्फर की पूरी जरूरत पूरी हो जाए। बेंटोनाइट सल्फर 90 प्रतिशत का उपयोग तभी करें, जब मिट्टी की जांच या कृषि विशेषज्ञ की सिफारिश से इसकी जरूरत स्पष्ट हो।
सल्फर पौधों में प्रोटीन निर्माण सहित कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है, लेकिन केवल सल्फर डालने से दानों का वजन और चमक निश्चित रूप से बढ़ेगी, ऐसा दावा करना सही नहीं है।
जिंक भी गेहूं के लिए महत्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक तत्व है। इसकी कमी होने पर पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। जिंक की कमी की पुष्टि मिट्टी की जांच या लक्षणों के आकलन से करें। जिंक सल्फेट 21 प्रतिशत और 33 प्रतिशत की मात्रा अलग-अलग होती है, इसलिए दोनों को एक जैसी मात्रा में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
जिंक को डीएपी या एनपीके के साथ मिलाने पर हर परिस्थिति में उसका असर कम हो जाता है, ऐसा सामान्य नियम भी सही नहीं है। फिर भी अनुकूलता और उपयोग की विधि के लिए उत्पाद के लेबल तथा कृषि विशेषज्ञ की सलाह का पालन करें। पहली सिंचाई के समय जिंक देना है या नहीं, यह कमी और स्थानीय सिफारिश पर निर्भर करेगा।
बुवाई के समय खाद डालने का सही तरीका
खाद को बीज के सीधे संपर्क में रखने से बचें, क्योंकि कुछ उर्वरकों की अधिक सांद्रता से बीज के अंकुरण और शुरुआती पौधों को नुकसान पहुंच सकता है। संभव हो तो सीड-कम-फर्टिलाइजर ड्रिल से खाद को बीज से अलग उचित गहराई पर डालें। मशीन का इस्तेमाल करते समय उसके निर्देशों के अनुसार बीज और खाद के बीच दूरी बनाए रखें।
खेत में 12 माह पुरानी सड़ी हुई गोबर की खाद उपलब्ध हो, तो मिट्टी की स्थिति और खेत की जरूरत के अनुसार बुवाई से पहले उसका इस्तेमाल भी लाभकारी हो सकता है। गोबर की खाद की मात्रा ट्रॉली के आकार और खाद की गुणवत्ता के अनुसार बदलती है, इसलिए केवल ट्रॉलियों की संख्या को सभी खेतों के लिए एक समान मानक न समझें।
सबसे जरूरी बात गेहूं में बेसल डोज का उद्देश्य शुरुआत में फसल को जरूरी पोषण उपलब्ध कराना है, न कि एक साथ अधिकतम खाद डाल देना। नाइट्रोजन की पूरी जरूरत को फसल की अवस्था और स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश के अनुसार बांटकर देना बेहतर रहता है। फास्फोरस जैसे कम गतिशील पोषक तत्वों को सामान्यतः बुवाई के समय मिट्टी में देना उपयोगी होता है। सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण और समय पर अगली खाद का प्रबंधन भी पैदावार तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
किसान भाइयों, खाद खरीदने और डालने से पहले मिट्टी की जांच जरूर कराएं और अपने क्षेत्र की कृषि सिफारिश को प्राथमिकता दें। इससे अनावश्यक खर्च कम करने और फसल को जरूरत के अनुसार पोषण देने में मदद मिल सकती है। आप इस बार गेहूं की बुवाई कौन-सी किस्म से कर रहे हैं-समय पर बोई जाने वाली या पछेती किस्म? अपना जिला, बुवाई का समय और किस्म कमेंट में जरूर बताएं।
गेहूं में बेसल डोज देते समय किसान कभी न करें ये 3 गलतियां
यूरिया की पूरी मात्रा बुवाई पर डालना: नत्रजन पानी में तेजी से बह जाता है। बुवाई के समय केवल 20-25% नत्रजन ही बेसल डोज में दें; बाकी मात्रा पहली और दूसरी सिंचाई (CRI व टिलरिंग स्टेज) पर टॉप ड्रेसिंग के रूप में दें।
बीज और खाद को मिलाकर बोना: उर्वरक को बीज के सीधे संपर्क में डालने से रासायनिक नमक की सांद्रता अंकुरण को जला देती है। खाद हमेशा बीज से अलग गहराई पर गिरनी चाहिए।
डीएपी न मिलने पर बुवाई रोक देना: यदि डीएपी उपलब्ध न हो, तो एनपीके 12:32:16 या एसएसपी (सिंगल सुपर फॉस्फेट) एक बेहतरीन विकल्प है। एसएसपी से फसल को मुफ्त में सल्फर और कैल्शियम भी मिल जाता है।
निष्कर्ष: गेहूं की फसल में बेसल डोज का उद्देश्य शुरुआत में ही अधिक से अधिक खाद झोंकना नहीं, बल्कि शुरुआती 30 दिनों में पौधों को मजबूत जड़ें और भरपूर कल्ले विकसित करने के लिए संतुलित पोषण उपलब्ध कराना है।
चाहे आप डीएपी का चुनाव करें, एनपीके 12:32:16 अपनाएं या एसएसपी का प्रयोग करें, नत्रजन की संतुलित मात्रा और बीज से खाद की सुरक्षित दूरी बनाए रखना ही सबसे बड़ा वैज्ञानिक नियम है। किसान भाई अंधाधुंध रासायनिक खाद डालने से बचें, बुवाई से पहले अपनी मिट्टी की जांच कराएं और सही समय पर संतुलित बेसल डोज देकर अपनी गेहूं की फसल से रिकॉर्ड पैदावार हासिल करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. गेहूं की बुवाई के समय डीएपी (DAP) की प्रति एकड़ कितनी मात्रा डालनी चाहिए?
उत्तर: सामान्यतः प्रति एकड़ 50 से 55 किलोग्राम डीएपी, 20 से 25 किलोग्राम यूरिया और मिट्टी में पोटाश की कमी होने पर 20 से 25 किलोग्राम एमओपी (पोटाश) देने की अनुशंसा की जाती है।
Q2. डीएपी न मिलने पर एनपीके 12:32:16 का उपयोग कैसे करें?
उत्तर: डीएपी के स्थान पर प्रति एकड़ 60 से 75 किलोग्राम एनपीके 12:32:16 और 15 से 20 किलोग्राम यूरिया का प्रयोग करें; इसमें पोटाश पहले से मौजूद रहता है इसलिए अलग से पोटाश की जरूरत नहीं होती।
Q3. सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) से गेहूं में क्या अतिरिक्त लाभ मिलते हैं?
उत्तर: एसएसपी (150 किग्रा/एकड़) डालने से फास्फोरस के साथ-साथ 11% सल्फर और 19% कैल्शियम भी मिलता है, जिससे मिट्टी भुरभुरी होती है और पौधों का विकास मजबूत होता है।
Q4. क्या बुवाई के समय जिंक को डीएपी या एनपीके के साथ मिलाना चाहिए?
उत्तर: सामान्यतः जिंक सल्फेट को फास्फोरस वाले उर्वरकों के साथ सीधे मिलाकर लंबे समय तक रखने से बचना चाहिए क्योंकि इससे जिंक फास्फेट बन सकता है; उत्पाद के लेबल निर्देशों का पालन करें।
Q5. बुवाई के समय खाद को बीज से अलग गहराई पर क्यों डालना चाहिए?
उत्तर: रासायनिक उर्वरक बीज के सीधे संपर्क में आने पर बीजों के अंकुरण को नुकसान पहुंचा सकते हैं, इसलिए सीड-कम-फर्टिलाइजर ड्रिल से खाद को बीज से अलग गहराई पर डालना चाहिए।
यह भी पढ़े: ब्लैक राइस कितना फायदेमंद है? जानिए काले चावल में एंथोसायनिन और वजन पर वैज्ञानिक शोध क्या कहता है
जागरूक रहें और नुकसान से बचें! इसे अन्य किसान भाइयों की जागरूकता के लिए अवश्य साझा करें। कृषि लेख, सरकारी योजनाएं, कृषि तकनीक, व्यावसायिक एवं जैविक खेती से संबंधित सटीक जानकारियां प्राप्त करने के लिए कृषि जागृति से जुड़ें। खेती से जुड़ी किसी भी समस्या के समाधान के लिए सीधे WhatsApp करें।

मेरा नाम Anil Kumar Prasad है। मैं एक प्रगतिशील किसान हूं और पिछले 5 वर्षों से खेती की बारीकियों को धरातल पर सीख और समझ रहा हूं। ‘कृषि जागृति – चलो गांव की ओर’ के माध्यम से मैं अपने निजी अनुभव और खेती की सटीक जानकारी साझा करता हूं। मेरा उद्देश्य सरकारी योजनाओं, आधुनिक तकनीक और जैविक खेती के जरिए साथी किसानों को सशक्त बनाना है।
