भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित अंतरिम व्यापार समझौता भारतीय अर्थव्यवस्था के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों कृषि और कपड़ा उद्योग के लिए एक दोधारी तलवार की तरह उभर कर आया है। जहाँ एक ओर यह समझौता भारतीय परिधानों को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धी बनाने का वादा करता है, वहीं दूसरी ओर यह ‘सफेद सोना’ उगाने वाले कपास किसानों के लिए एक जटिल आर्थिक पहेली खड़ा कर रहा है।
वस्त्र उद्योग के लिए अवसर
इस समझौते का सबसे आकर्षक पहलू भारतीय परिधानों के लिए अमेरिकी बाजार में जीरो-टैरिफ पर प्रवेश मिलने की संभावना है। यदि भारतीय निर्माता अमेरिकी कपास या धागे का उपयोग कर वस्त्र तैयार करते हैं, तो उन्हें वही रियायतें मिल सकती हैं जो वर्तमान में बांग्लादेश जैसे देशों को प्राप्त हैं।
निर्यात में उछाल की संभावनाः टैरिफ रियायतों से भारतीय कपड़ों की कीमत अमेरिकी बाजार में कम होगी, जिससे निर्यात की मात्रा बढ़ने की प्रबल संभावना है।
प्रतिस्पर्धात्मक बढ़तः वियतनाम और बांग्लादेश जैसे कड़े प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले भारत अब अधिक मजबूती से खड़ा हो सकेगा।
कपास किसानों के लिए ‘मूल्य संकट’ की आशंका
यही “जीरो-टैरिफ” का प्रावधान घरेलू कपास उत्पादकों के लिए चुनौती बन सकता है। आर्थिक विशेषज्ञों ने इसके पीछे दो प्रमुख तर्क दिए हैं:
1. घरेलू मांग में गिरावटः यदि भारतीय कपड़ा मिलें अमेरिकी बाजार में टैरिफ-मुक्त प्रवेश का लाभ उठाने के लिए अमेरिकी कपास के आयात को प्राथमिकता देती हैं, तो भारतीय कपास की मांग में भारी कमी आ सकती है। मांग घटने का सीधा परिणाम कीमतों में गिरावट के रूप में सामने आएगा, जिससे महाराष्ट्र, गुजरात और तेलंगाना के कपास बेल्ट के किसान सीधे प्रभावित होंगे।
2.निर्यात बाज़ार का छिने जाने का खतरा (बांग्लादेश फैक्टर): बांग्लादेश ऐतिहासिक रूप से भारतीय कपास का बहुत बड़ा खरीदार रहा है। हालाँकि, बांग्लादेश-अमेरिका व्यापार समझौते के बाद अब अपने वस्त्रोद्योग के हितों के लिए बांग्लादेश भी भारत से किनारा कर अमेरिकी कपास खरीदने को प्राथमिकता दे सकता है। इससे भारतीय कपास का निर्यात घटेगा और घरेलू मंडियों में अत्यधिक आवक से कपास की कीमतों में गिरावट आ सकती है। इसका सीधा असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ेगा, जिनकी आय पहले से सीमित लाभांश पर निर्भर है।
कुल मिलाकर यह व्यापार समझौता भारतीय वस्त्र उद्योग के लिए अवसर लेकर आया है, लेकिन कपास उत्पादकों के लिए बाजार प्रतिस्पर्धा और मूल्य स्थिरता का संकट भी पैदा करता है। अब कपास किसानों के हित इस बात पर निर्भर होंगे कि आने वाले समय में सरकार किस प्रकार संतुलित नीति के माध्यम से निर्यात प्रोत्साहन और किसान हितों के बीच तालमेल स्थापित करती है।
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