सूखाग्रस्त बीड जिले के किसानों की आय में दस गुना की बढ़ोतरी..!

महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त बीड जिले में पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर फल आधारित कृषि मॉडल अपनाने वाले किसानों के लिए आय के नए रास्ते खुलते दिख रहे हैं। ग्लोबल विकास ट्रस्ट की ‘कृषि-कुल’ पहल के तहत सोयाबीन और कपास जैसी जोखिम भरी व कम आय वाली फसलों से हटकर पपीता, सीताफल, मौसंबी, अमरूद, अनार, शहतूत और केला जैसी फल फसलों को बढ़ावा दिया गया। इस पहल से किसानों की प्रति एकड़ आय में कई गुना उछाल दर्ज किया गया है।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज द्वारा वर्ष 2024 में किए गए एक स्वतंत्र मूल्यांकन अध्ययन के मुताबिक, इस पहल से जुड़े किसानों की औसत प्रति एकड़ आय 38,700 रूपये से तक़रीबन दस गुना बढ़कर 3.93 लाख तक पहुंच गई है। यह अध्ययन सूखा प्रभावित क्षेत्रों में फसल विविधीकरण के महत्त्व और आर्थिक क्षमता को रेखांकित करता है।

इंडिअन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, कार्यक्रम के तहत अब तक करीब 43,000 एकड़ क्षेत्र में 6.7 करोड़ से अधिक फलदार पौधे लगाए जा चुके हैं। इससे लगभग 5,000 गांवों के 30,000 किसान परिवारों को सीधा लाभ मिला है। किसानों की शुरुआती लागत कम रखने के लिए पौधों की व्यवस्था विशेष रूप से की गई।

नर्सरियों से करीब 30 रूपये प्रति पौधा की लागत से खरीदे गए फल पौधे किसानों को 15 रूपये प्रति पौधा की रियायती दर पर उपलब्ध कराए गए। इस सब्सिडी की व्यवस्था कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी फंड के माध्यम से की गई।

परियोजना में जल प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया गया। भूजल पुनर्भरण के लिए फार्म तालाब, चेक डैम और निचले नदी क्षेत्रों में करीब 200 गहरे ऊर्ध्वाधर रिचार्ज ढांचे विकसित किए गए। परियोजना के आंकड़ों के अनुसार, कई स्थानों पर जहां भूजल स्तर पहले 400 फीट तक नीचे चला गया था, वह अब 50 फीट के आसपास आ गया है। इससे फल फसलों के लिए सुनिश्चित सिंचाई संभव हो सकी है, जो सूखे क्षेत्रों में खेती का सबसे बड़ा आधार बनती है।

कार्यक्रम के तहत किसानों को संस्थागत ऋण से भी जोड़ा गया। बैंकों के जोखिम को कम करने के लिए 1 करोड़ की फर्स्ट-लॉस डिफॉल्ट गारंटी सुविधा दी गई, जिससे किसानों को कर्ज उपलब्ध कराना आसान हुआ। किसानों के प्रशिक्षण और फसल परीक्षण के लिए 25 एकड़ में बुनियादी ढांचा विकसित किया गया है, ताकि किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन मिलता रहे।

फल आधारित खेती से बढ़ी आय का असर अब किसानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में भी दिखने लगा है। परियोजना से जुड़े परिवारों में नकदी प्रवाह बेहतर हुआ है। आगे चलकर इस पहल का दायरा बढ़ाने के साथ-साथ कटाई-पश्चात प्रबंधन और बाजार तक सीधी पहुंच मजबूत करने पर भी काम किया जा रहा है। यह पहल साबित करती है कि यदि सही फसल चयन, जल प्रबंधन और वित्तीय सहयोग मिले, तो सूखाग्रस्त क्षेत्रों में भी खेती किसानों की समृद्धि का आधार बन सकती है।

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