किसानों के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण खबर सामने आई है, जो सीधे किसानों की खेती और आमदनी से जुड़ी हुई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे संघर्ष और सप्लाई चेन की समस्या का असर अब हमारे खेत तक पहुंचने लगा है। आने वाले समय में कीटनाशक दवाएं 20 से 25 प्रतिशत तक महंगे हो सकते हैं। सोचिए, पहले ही बीज, खाद, डीजल और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ रही है, ऊपर से अगर दवाएं भी महंगी हो जाएं तो खेती करना और मुश्किल हो जाएगा।
सबसे ज्यादा असर हम छोटे और मध्यम किसानों पर पड़ेगा, क्योंकि हमारी खेती का हर खर्च सीधे जेब से जाता है। खबर के अनुसार, कीटनाशक बनाने के लिए जो कच्चा माल विदेशों से आता है, उसकी सप्लाई में दिक्कत आ रही है। जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है, जिससे कंपनियों की लागत बढ़ रही है। इसका सीधा मतलब है कि आने वाले सीजन में हमें वही दवा ज्यादा कीमत देकर खरीदनी पड़ेगी।
हालांकि एक राहत की बात यह है कि यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरकों का आयात बढ़ा है, जिससे फिलहाल खाद की कमी नहीं होगी। लेकिन फसल को बचाने के लिए दवाओं की जरूरत तो पड़ेगी ही, और वहीं पर खर्च बढ़ने वाला है। ऐसी स्थिति में हमें थोड़ा समझदारी से काम लेना होगा। बिना जरूरत बार-बार स्प्रे करने की आदत छोड़नी होगी। खेत में नियमित निगरानी करें और तभी दवा का उपयोग करें जब कीट का प्रकोप ज्यादा हो जाए। इससे खर्च भी बचेगा और दवा का असर भी अच्छा मिलेगा।
समेकित कीट प्रबंधन अपनाना आज की जरूरत है। नीम आधारित दवाएं, फेरोमोन ट्रैप, लाइट ट्रैप और जैविक तरीके अपनाकर हम रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम कर सकते हैं। इससे लागत भी कम होगी और फसल भी सुरक्षित रहेगी। एक और जरूरी बात- एक ही रासायनिक दवा को बार-बार इस्तेमाल न करें। अलग-अलग दवाओं का रोटेशन करें, ताकि कम मात्रा में भी अच्छा नियंत्रण मिले और कीटों में प्रतिरोधक क्षमता न बने। अगर संभव हो तो अपने गांव या क्षेत्र के किसानों के साथ मिलकर दवाओं की सामूहिक खरीद करें।
इससे दाम थोड़ा कम मिल सकता है। साथ ही, कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेते रहें, ताकि सही समय पर सही निर्णय लिया जा सके। किसानों के लिए समय बदल रहा है और खेती भी बदल रही है। अब सिर्फ मेहनत नहीं, बल्कि समझदारी से खेती करना जरूरी हो गया है। खर्च को नियंत्रित करके ही किसान मुनाफा बचा सकते हैं।
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