जनवरी माह से सब्जियों की कीमतों में आई अचानक और तेज गिरावट ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी है। इस गिरावट के पीछे मुख्य रूप से बंपर पैदावार, मंडियों में फसलों की पीक आवक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर पड़ रही निर्यात मांग को जिम्मेदार माना जा रहा है।
प्रमुख कृषि मंडियों के आंकड़ों के अनुसार, आलू की कीमतों में लगभग 40 प्रतिशत की कमी आई है और दिल्ली की आजादपुर मंडी में यह 4 प्रति किलो के निचले स्तर पर पहुँच गया है। प्याज के हालात भी कुछ अलग नहीं हैं। लासलगांव मंडी में प्याज की कीमतें 50 प्रतिशत तक गिरकर 10 से 11 प्रति किलो रह गई हैं। टमाटर के मामले में तो स्थिति और भी चिंताजनक है। पिंपलगांव जैसी मंडियों में टमाटर के दाम 80 प्रतिशत तक गिरकर 7 रुपए प्रति किलो तक पहुँच गए हैं।
बाजार से जुड़े विशेषज्ञों ने बताया कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण निर्यात प्रभावित होने से देश के भीतर प्याज की अतिरिक्त उपलब्धता ने कीमतों पर भारी दबाव बनाया है। साथ ही महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे बड़े उत्पादक राज्यों में ‘ स्थानीय स्तर पर टमाटर की भरपूर पैदावार ने अंतर-राज्यीय मांग को लगभग समाप्त कर दिया है। इसके अलावा, एलपीजी की कमी के कारण होटल और रेस्टोरेंट सेक्टर से होने वाली मांग में भी भारी गिरावट आई है, जिसका सीधा असर टमाटर की कीमतों पर पड़ा है।
कीमतों में नरमी का यह रुझान केवल सब्जियों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि अनाज बाज़ार में भी इसका प्रभाव स्पष्ट दिख रहा है। पिछले कुछ समय में गेहूं के दामों में लगभग 10 प्रतिशत और चावल की कीमतों में 5 से 6 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि इस गिरावट ने सरकार को महंगाई नियंत्रित करने में बड़ी मदद दी है, लेकिन किसानों को अपनी मेहनत का वाजिब हक नहीं मिल पा रहा है।
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