हाल ही में सामने आई रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने गेहूं खरीद पर राशनिंग लागू करते हुए प्रति बीघा केवल लगभग 6 क्विंटल ही खरीदने का प्रावधान किया है, जबकि वास्तविक उत्पादन इससे कहीं अधिक है। ऐसे में किसान के सामने एक नई समस्या खड़ी हो गई है-बाकी उपज आखिर कहां और किस भाव पर बेची जाए।
रिपोर्ट के अनुसार कई क्षेत्रों में गेहूं का औसत उत्पादन 8 क्विंटल प्रति बीघा या उससे अधिक है, लेकिन सरकारी खरीद सीमा प्रति बीघा 6 क्विंटल तय होने से किसान को मजबूरी में शेष गेहूं खुले बाजार या बिचौलियों को बेचना पड़ेगा। यह स्थिति सीधे तौर पर किसान की आय को प्रभावित करती है, क्योंकि मंडियों में अक्सर MSP से कम दाम मिलते हैं।
समस्या यहीं खत्म नहीं होती। कई मंडियों में खरीद की व्यवस्था भी अधूरी बताई जा रही है। बारदाना की कमी, लेबर और ट्रांसपोर्ट की दिक्कत, और ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की जटिल प्रक्रिया ने किसानों की परेशानी और बढ़ा दी है। कई किसानों का कहना है कि पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन के बाद भी उनका नंबर समय पर नहीं आ रहा, जिससे उन्हें कई दिनों तक मंडी में इंतजार करना पड़ रहा है।
इसके अलावा नमी की समस्या भी किसानों के लिए बड़ी बाधा बनकर सामने आई है। सरकारी मानकों के अनुसार 12 प्रतिशत तक नमी वाला गेहूं ही खरीदा जाएगा, जबकि इस समय कई मंडियों में 16 से 20 प्रतिशत तक नमी वाला गेहूं पहुंच रहा है। ऐसे में किसानों की फसल रिजेक्ट हो रही है और उन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस पूरी व्यवस्था में सबसे बड़ा नुकसान छोटे और सीमांत किसानों को होता है।
उनके पास न तो भंडारण की सुविधा होती है और न ही इतना समय कि वे लंबे समय तक अपनी उपज रोक सकें। मजबूरी में उन्हें कम दाम पर अपनी फसल बेचनी पड़ती है, जिससे उनकी मेहनत का सही मूल्य नहीं मिल पाता। किसानों का यह भी कहना है कि यदि सरकार MSP घोषित करती है, तो उसे पूरी उपज पर लागू करना चाहिए, न कि सीमित मात्रा तक। आंशिक खरीद से बाजार में असंतुलन पैदा होता है और बिचौलियों को फायदा मिलता है, जबकि किसान घाटे में रहता है।
ऐसी स्थिति में जरूरत है कि खरीद प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया जाए। बारदाना, लेबर और ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था समय पर सुनिश्चित की जाए, और नमी की समस्या को देखते हुए किसानों को सुखाने के लिए उचित सुविधाएं दी जाएं। साथ ही, MSP पर खरीद की सीमा बढ़ाने या पूरी उपज खरीदने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
किसान देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है। यदि उसे उसकी उपज का उचित मूल्य और समय पर भुगतान नहीं मिलेगा, तो खेती से उसका विश्वास उठता जाएगा। यह केवल किसान की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे कृषि तंत्र के लिए चेतावनी है। अगर आप भी मानते हैं कि किसान को उसकी उपज का पूरा हक मिलना चाहिए, तो इस मुद्दे को आगे बढ़ाएं।
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