अगर इथेनॉल नीति से इतना बड़ा आर्थिक फायदा हो रहा है, तो किसान तक उसका लाभ क्यों नहीं पहुंच रहा? इस पूरे मुद्दे को समझने के लिए हमें तीन स्तरों पर देखना होगा। उत्पादन लागत, बाजार ढांचा और नीति का वितरण। सबसे पहले बात करें गन्ना किसानों की। देश में गन्ने से बनने वाली चीनी और इथेनॉल का पूरा मॉडल मिलों (शुगर मिल) के माध्यम से चलता है।
सरकार FRP (Fair And Remunerative Price) तय करती है, लेकिन भुगतान मिलों के जरिए होता है। जब चीनी की कीमतें कम रहती हैं और लागत बढ़ती है, तो मिलों की नकदी पर दबाव आता है। इसी वजह से भुगतान में देरी होती है और हजारों करोड़ का बकाया जमा हो जाता है। मौजूदा स्थिति में करीब 16,000 करोड़ रुपए का बकाया यही दर्शाता है कि सिस्टम में कहीं न कहीं असंतुलन है।
दूसरी तरफ, इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को सरकार ने तेजी से आगे बढ़ाया है। 20% ब्लेंडिंग का लक्ष्य पेट्रोल आयात कम करने और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए रखा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इससे देश को आर्थिक फायदा हो रहा है। लेकिन इस मॉडल में फायदा मुख्य रूप से प्रोसेसिंग कंपनियों और डिस्टिलरी तक केंद्रित हो जाता है, क्योंकि वही गन्ने या मक्का को इथेनॉल में बदलती हैं।
मक्का किसानों की स्थिति भी अलग नहीं है। कागज पर MSP तय है, लेकिन असल बाजार में कई जगह किसान को MSP से 40 से 50 प्रतिशत कम कीमत मिल रही है। इसका कारण है- खरीद की मजबूत सरकारी व्यवस्था का अभाव और निजी व्यापारियों पर निर्भरता। जब मांग-आपूर्ति का संतुलन बिगड़ता है, तो किसान को मजबूरी में कम दाम पर फसल बेचनी पड़ती है।
अब सवाल उठता है कि जब इथेनॉल सेक्टर बढ़ रहा है, तो किसान को फायदा क्यों नहीं मिल रहा? इसका मुख्य कारण वैल्यू चेन में असमानता है। किसान केवल कच्चा माल देता है, जबकि असली मुनाफा प्रोसेसिंग, मार्केटिंग और पॉलिसी इंसेंटिव में होता है। जब तक किसान इस वैल्यू चेन में ऊपर नहीं आएगा, तब तक उसकी आय सीमित ही रहेगी।
इसके अलावा, नीति निर्माण में भी एक गैप दिखाई देता है। सरकार का फोकस उत्पादन और ऊर्जा सुरक्षा पर ज्यादा है, लेकिन किसान की आय सुनिश्चित करने के लिए भुगतान गारंटी, समयबद्ध खरीद और मूल्य स्थिरता जैसे मुद्दों पर उतनी सख्ती नहीं दिखती। यही वजह है कि एक तरफ उद्योग बढ़ रहा है और दूसरी तरफ किसान संघर्ष कर रहा है।
जहां तक बड़े उद्योगपतियों या कंपनियों के मुनाफे की बात है, यह भी सच है कि जो लोग प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन में हैं, उन्हें ज्यादा फायदा मिलता है। लेकिन इसका समाधान आरोप लगाने से ज्यादा सिस्टम सुधार में है। जैसे- पहला, गन्ना भुगतान के लिए सख्त समय सीमा और पेनल्टी सिस्टम लागू हो। दूसरा, मक्का की सरकारी खरीद को मजबूत किया जाए। तीसरा, किसान उत्पादक संगठन (FPO) और कोऑपरेटिव मॉडल को बढ़ावा दिया जाए, ताकि किसान सीधे प्रोसेसिंग में हिस्सेदारी ले सकें। चौथा, इथेनॉल से जुड़े लाभ का एक हिस्सा सीधे किसानों तक पहुंचाने की नीति बने।
अंत में, आपकी बात का सार यही है कि देश को फायदा हो रहा है, लेकिन किसान तक उसका पूरा हिस्सा नहीं पहुंच रहा। यह एक वास्तविक समस्या है और इसका समाधान संतुलित नीति, पारदर्शिता और किसान-केंद्रित सुधारों में ही है। अगर यह सुधार नहीं हुए, तो उत्पादन बढ़ने के बावजूद किसान की हालत में बड़ा बदलाव नहीं आएगा।
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