हाल ही में दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट ने कृषि व्यवस्था की एक बड़ी सच्चाई सामने रखी है। रायसेन के वेयरहाउस में रखा गया लगभग 35 करोड़ रुपय का गेहूं, गलत भंडारण और लगातार लापरवाही के कारण पूरी तरह सड़कर जहरीला हो गया। हालत यह हो गई कि उस पर बार-बार कीटनाशक छिड़काव करने के बाद भी उसे बचाया नहीं जा सका और कुल लागत करीब 150 करोड़ रुपय तक पहुंच गई।
यह सिर्फ सरकारी नुकसान नहीं है, बल्कि हर उस किसान के लिए चिंता का विषय है जो अपनी मेहनत से फसल तैयार करता है। जब फसल तैयार होती है, तो किसान की उम्मीद होती है कि उसे सही कीमत मिलेगी और उसका अनाज सुरक्षित रहेगा। लेकिन अगर भंडारण और प्रबंधन सही नहीं हो, तो पूरी मेहनत बेकार हो सकती है।
इस मामले में सबसे बड़ी गलती यह रही कि गेहूं को समय पर उठाया नहीं गया। कई सालों तक गोदाम में पड़े रहने के कारण उसकी गुणवत्ता लगातार गिरती गई। ऊपर से 30 से ज्यादा बार कीटनाशक छिड़काव ने उसे पूरी तरह जहरीला बना दिया, जिससे अब वह इंसान तो क्या, पशुओं के लिए भी उपयोगी नहीं रहा।
किसानों के लिए यह एक बड़ा सबक है कि खेती केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है। सही समय पर बिक्री, सुरक्षित भंडारण और बाजार तक पहुंच उतनी ही जरूरी है। वहीं सरकार और एजेंसियों के लिए यह जरूरी है कि खरीद के बाद अनाज का सही प्रबंधन किया जाए, ताकि ऐसी स्थिति दोबारा न बने। आज जरूरत है कि किसान खेती को एक पूरी प्रणाली के रूप में देखें, जहां खेत से लेकर गोदाम और बाजार तक हर कदम मजबूत हो। तभी किसान की मेहनत का सही मूल्य मिलेगा और देश की खाद्य सुरक्षा भी बनी रहेगी।
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