भारत के प्रीमियम आमों, विशेषकर अल्फांसो (हापुस) और केसर के निर्यात सीजन पर पश्चिम एशिया में जारी तनाव का प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगा है। समुद्री मार्गों में पैदा हुई बाधाओं और लॉजिस्टिक्स लागत में अचानक आई भारी तेजी ने निर्यातकों के मुनाफे और निर्यात खेपों की मात्रा दोनों को संकट में डाल दिया है। खाड़ी देशों को जाने वाले आमों के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक मुख्य रास्ता है, जहाँ वर्तमान भू-राजनीतिक अस्थिरता ने पूरी आपूर्ति श्रृंखला को अस्त-व्यस्त कर दिया है।
निर्यातकों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय रेफ्रिजरेटेड कंटेनरों की भारी किल्लत और बढ़ता हुआ माल भाड़ा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, कंटेनर की लागत में लगभग 4,000 प्रति कंटेनर की बढ़ोतरी हुई है, जो सामान्य दिनों की तुलना में करीब चार गुना अधिक है। इस अप्रत्याशित खर्चे और जहाजों के देरी से पहुँचने के कारण आम जैसे जल्दी खराब होने वाले फलों के सड़ने का जोखिम भी काफी बढ़ गया है।
भारतीय आम निर्यात के कुल बाजार में खाड़ी देशों की हिस्सेदारी लगभग 40 से 45 प्रतिशत तक रहती है। इतने बड़े बाजार में व्यवधान आने से पीक सीजन के दौरान ऑर्डर्स को समय पर पूरा करना एक कठिन चुनौती बन गया है। भारत हालांकि दुनिया के लगभग आधे आमों का उत्पादन करता है, लेकिन मौजूदा संकट यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के कारण पेरिशेबल उत्पादों का व्यापार कितना संवेदनशील हो सकता है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लॉजिस्टिक्स और शिपिंग की स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो इस साल निर्यात की कुल मात्रा में बड़ी गिरावट देखी जा सकती है। भले ही घरेलू बाजारों में आम की आवक सामान्य बनी हुई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय शिपमेंट में देरी किसानों और निर्यातकों की आय पर सीधा असर डालेगी। यह स्थिति भविष्य के लिए नए बाजारों की खोज और बेहतर कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता को भी मजबूती से रेखांकित करती है।
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने भारतीय आम निर्यात, विशेषकर अल्फांसो और केसर जैसी प्रीमियम किस्मों के लिए एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। लॉजिस्टिक्स लागत में चार गुना वृद्धि, कंटेनरों की कमी और समुद्री मार्गों में असुरक्षा ने न केवल निर्यातकों के मुनाफे को कम किया है, बल्कि खाड़ी देशों जैसे प्रमुख बाजारों (40 से 45% हिस्सेदारी) तक खेप पहुँचाना भी चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
यह स्थिति स्पष्ट करती है कि अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता के प्रति ‘पेरिशेबल’ (जल्द खराब होने वाले) उत्पादों का व्यापार कितना संवेदनशील है, जो भविष्य में निर्यात के लिए नए वैकल्पिक बाजारों की खोज और एक अधिक सुदृढ़ एवं आत्मनिर्भर कोल्ड-चेन बुनियादी ढांचे के निर्माण की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।
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