इस बार गेहूं खरीदी की व्यवस्था ने किसान को राहत देने के बजाय उसे और ज्यादा परेशान कर दिया है। सरकार कहती है कि एक-एक दाना खरीदा जाएगा, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि लाखों किसान खरीदी के दायरे से बाहर हो गए हैं।
करीब 8 लाख किसान ऐसे हैं जिनकी जमीन 2 हेक्टेयर से ज्यादा है, और उनके लिए स्लॉट ही उपलब्ध नहीं हो पा रहा। क्या ज्यादा जमीन होना अब गलती बन गया है? खरीदी शुरू करने में देरी की गई, बार-बार तारीख बढ़ाई गई, और जब प्रक्रिया शुरू हुई तो नई-नई शर्तें लगा दी गईं। एक तरफ प्रति केंद्र 1000 क्विंटल की लिमिट, दूसरी तरफ प्रति एकड़ उत्पादन भी कम मान लिया गया।
किसान 18 से 20 क्विंटल उत्पादन करता है, लेकिन खरीदी 16 क्विंटल के हिसाब से हो रही है। बाकी अनाज किसान क्या करे? मजबूरी में मंडी में सस्ते दाम पर बेच दे। ई-उपार्जन पोर्टल की तकनीकी खामियां अलग सिरदर्द बन गई हैं। डबल वेरिफिकेशन और सैटेलाइट मैपिंग की गलतियों के कारण सही किसानों के डेटा भी गलत दिख रहे हैं।
जिन किसानों की फसल तैयार है, वे स्लॉट के इंतजार में बैठे हैं। आखिर किसान खेती करे या पोर्टल की गलतियों को सुधारता रहे। सबसे बड़ी चोट किसान की जेब पर पड़ रही है। मार्च से अब तक लगभग 20 लाख टन गेहूं व्यापारियों को कम दाम पर बिक चुका है। समर्थन मूल्य से कम 2200 से 2350 रुपए प्रति क्विंटल पर बिक्री करना किसान की मजबूरी बन गई है।
यह सीधे-सीधे किसानों का नुकसान है और व्यवस्था की विफलता है। ऊपर से बारदाने की कमी और घटिया क्वालिटी के बैग की शिकायतें सामने आ रही हैं। जब व्यवस्था ही अधूरी हो, तो खरीदी सुचारू कैसे चलेगी? किसान अपनी उपज लेकर केंद्रों के चक्कर काट रहा है, लेकिन समाधान कहीं नजर नहीं आता।
छोटे किसानों को प्राथमिकता देना गलत नहीं है, लेकिन इसके नाम पर बड़े और मध्यम किसानों को नजरअंदाज करना भी न्यायसंगत नहीं है। हर किसान का हक बराबर होना चाहिए। जमीन ज्यादा होने का मतलब यह नहीं कि उसकी फसल खरीदी ही न जाए। आज किसान सबसे ज्यादा यही सवाल पूछ रहा है कि आखिर वह जाए तो जाए कहां?
अगर सरकारी खरीदी में जगह नहीं, और बाजार में सही दाम नहीं, तो उसकी मेहनत का मूल्य कौन तय करेगा? जरूरत है कि खरीदी प्रक्रिया को तुरंत सरल और पारदर्शी बनाया जाए, तकनीकी खामियों को दूर किया जाए और सभी किसानों को समान अवसर दिया जाए। वरना यह व्यवस्था किसान के लिए सहारा नहीं, बल्कि बोझ बनती जाएगी।
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