उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए इस समय पानी की बढ़ती समस्या के बीच खेत तालाब योजना एक बहुत ही काम की पहल बनकर सामने आई है। हर साल देखा जाता है कि बरसात का बहुत सारा पानी खेतों से बहकर निकल जाता है और कुछ ही दिनों में जमीन फिर से सूखी हो जाती है।
इसके बाद किसान को सिंचाई के लिए या तो ट्यूबवेल पर निर्भर रहना पड़ता है या महंगे डीजल से पानी निकालना पड़ता है। ऐसे में अगर किसान पहले से तैयारी करके अपने खेत में तालाब बनवा ले, तो वही बरसाती पानी पूरे साल उसके काम आ सकता है। यही इस योजना का मुख्य उद्देश्य है कि पानी को बचाया जाए और किसान को आत्मनिर्भर बनाया जाए।
खेत तालाब योजना के तहत सरकार किसानों को अपने खेत में छोटा तालाब बनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि कुल लागत का लगभग 50 प्रतिशत तक अनुदान सरकार की तरफ से दिया जाता है। यानी अगर तालाब बनाने में एक निश्चित खर्च आता है, तो उसका आधा हिस्सा सरकार देती है और बाकी किसान को लगाना होता है।
यह अनुदान सीधे किसान के बैंक खाते में भेजा जाता है, जिससे पारदर्शिता भी बनी रहती है। इस योजना को राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और पर ड्रॉप मोर क्रॉप जैसी योजनाओं से भी जोड़ा गया है, ताकि पानी का सही उपयोग हो सके। इस योजना का असली फायदा तब मिलता है जब किसान इसे सही समय पर अपनाता है।
सबसे अच्छा समय बारिश शुरू होने से पहले का होता है। अगर तालाब पहले से तैयार रहेगा, तो मानसून का पानी सीधे उसमें जमा हो जाएगा। इससे खेत में पानी रुककर बेकार नहीं जाएगा, बल्कि सुरक्षित रहेगा।
बाद में यही पानी फसल की सिंचाई में काम आता है। खासकर उन इलाकों में जहां पानी की कमी रहती है या जहां भूजल स्तर नीचे चला गया है, वहां यह योजना बहुत ज्यादा उपयोगी साबित हो रही है। किसानों के लिए यह सिर्फ सिंचाई तक सीमित नहीं है, बल्कि आय बढ़ाने का भी एक अच्छा जरिया बन सकता है।
तालाब में जमा पानी का उपयोग मछली पालन के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा सिंघाड़ा या अन्य जल आधारित खेती भी की जा सकती है। कई किसान ऐसे उदाहरण दे रहे हैं जहां उन्होंने एक ही तालाब से दो से तीन तरह की आमदनी शुरू कर दी है। इससे खेती पर निर्भरता थोड़ी कम होती है और जोखिम भी बंट जाता है।
जमीनी स्तर पर देखा जाए तो जिन किसानों ने तालाब बनवाया है, उन्हें सबसे ज्यादा फायदा सूखे समय में मिला है। जब आसपास के खेतों में पानी की कमी हो जाती है, तब उनके पास खुद का पानी होता है।
इससे फसल समय पर सिंचित हो जाती है और उत्पादन भी बेहतर मिलता है। वहीं जिन किसानों के पास तालाब नहीं होता, उन्हें या तो सिंचाई के लिए इंतजार करना पड़ता है या फिर अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है।
इस योजना का एक और बड़ा फायदा यह है कि इससे मिट्टी की नमी बनी रहती है। जब खेत के पास पानी का स्रोत होता है, तो आसपास की जमीन में भी नमी बनी रहती है। इससे पौधों की वृद्धि अच्छी होती है और बार-बार सिंचाई की जरूरत भी कम पड़ती है। लंबे समय में यह मिट्टी की गुणवत्ता को भी सुधारता है, क्योंकि लगातार सूखने और गीला होने का दबाव कम हो जाता है।
आवेदन की प्रक्रिया भी अब पहले की तुलना में आसान कर दी गई है। किसान अपने जिले के कृषि विभाग के कार्यालय, ब्लॉक स्तर के कृषि अधिकारी या सरकारी पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। आवेदन करते समय कुछ जरूरी कागजात जैसे आधार कार्ड, बैंक खाता, जमीन के कागज आदि देने होते हैं।
कई जगहों पर पहले आओ पहले पाओ के आधार पर भी चयन होता है, इसलिए समय पर आवेदन करना जरूरी है। आवेदन के बाद अधिकारी स्थल का निरीक्षण करते हैं और फिर मंजूरी दी जाती है। हालांकि कुछ किसानों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि तालाब बनवाने के बाद उसकी देखभाल भी जरूरी होती है।
अगर तालाब की सही तरीके से सफाई और रखरखाव नहीं किया गया, तो उसमें गाद भर सकती है और उसकी क्षमता कम हो सकती है। इसलिए समय-समय पर उसकी सफाई करना और किनारों को मजबूत रखना जरूरी है। अगर संभव हो तो तालाब के चारों तरफ घास या पौधे लगाकर मिट्टी के कटाव को भी रोका जा सकता है।
आज के समय में खेती में सबसे बड़ी चुनौती पानी की ही है। बारिश अनियमित हो रही है, भूजल स्तर नीचे जा रहा है और सिंचाई का खर्च बढ़ता जा रहा है। ऐसे में खेत तालाब योजना जैसे उपाय किसानों के लिए बहुत जरूरी हो गए हैं। यह सिर्फ एक योजना नहीं बल्कि एक लंबी अवधि का समाधान है, जिससे किसान अपनी खेती को सुरक्षित और मजबूत बना सकता है।
इसलिए जो किसान अभी तक इस योजना का लाभ नहीं ले पाए हैं, उन्हें इस दिशा में जरूर सोचना चाहिए। थोड़ी सी योजना और समय पर लिया गया निर्णय आने वाले कई सालों तक फायदा दे सकता है। पानी बचाना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है और जो किसान इस बात को समझ जाएगा, वही आने वाले समय में आगे रहेगा।
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