आलू की खेती करने वाले किसान इस समय एक ऐसी स्थिति से गुजर रहे हैं जहां मेहनत पूरी है लेकिन दाम आधे भी नहीं मिल रहे। जब सरकार ने 6.5 रुपय प्रति किलो पर खरीद का ऐलान किया तो पहली नजर में लगा कि शायद अब राहत मिलेगी, लेकिन जमीन पर इसका असर उल्टा देखने को मिल रहा है। मंडियों में जैसे ही यह रेट घोषित हुआ, बाजार भाव और नीचे आ गए।
किसान जो पहले 700 से 800 रुपय प्रति क्विंटल की उम्मीद कर रहा था, उसे अब 600 से650 रुपय तक भी मुश्किल से मिल रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर यह पॉलिसी किसानों के हित में है या बाजार को और दबाने वाली है। असल समस्या सिर्फ सरकारी मूल्य कम होने की नहीं है, बल्कि समय की भी उतनी ही बड़ी गलती है।
जब फरवरी में खुदाई शुरू हुई थी और आलू 200 से 500 रुपय प्रति क्विंटल बिक रहा था, उस समय अगर Intervention होता तो किसानों को सीधा फायदा मिलता। लेकिन अब जब ज्यादातर आलू कोल्ड स्टोरेज में जा चुका है, तब खरीद की घोषणा करना व्यावहारिक तौर पर ज्यादा असरदार नहीं दिखता। किसान पहले ही स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट और हैंडलिंग पर खर्च कर चुका है, ऐसे में 650 रुपय प्रति क्विंटल का रेट उसकी लागत को भी कवर नहीं कर पा रहा।
अगर हम वास्तविक लागत की बात करें तो आज के समय में आलू की खेती सस्ती नहीं रही। बीज का खर्च, फर्टिलाइजर का खर्च, इरीगेशन, लेबर, पेस्टीसाइड, और फिर हार्वेस्टिंग के बाद स्टोरेज- इन सबको जोड़ें तो लागत आसानी से 1000 से 1200 रुपय प्रति क्विंटल पहुंच जाती है। इसके अलावा कोल्ड स्टोरेज का खर्च करीब 250 रुपय प्रति क्विंटल, बारदाना 60 से 70 रुपय और ढुलाई अलग से लगती है।
ऐसे में किसान अगर 650 रुपय प्रति क्विंटल पर आलू बेचता है तो वह सीधा घाटे में जा रहा है। यह सिर्फ प्रॉफिट कम होने की बात नहीं है, बल्कि कैपिटल लॉस की स्थिति बन रही है। इस साल एक और बड़ा कारण है प्रोडक्शन का इंबैलेंस, उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पश्चिम बंगाल, गुजरात और कर्नाटक में भी आलू का प्रोडक्शन काफी ज्यादा हुआ है।
जब सप्लाई ज्यादा होती है और डिमांड उतनी नहीं बढ़ती, तो मार्केट नेचुरली नीचे आता है। यही इस साल हुआ है। पहले यूपी से दक्षिण भारत में आलू जाता था, लेकिन अब कर्नाटक खुद प्रोडक्शन बढ़ा चुका है, जिससे बाहर की डिमांड कम हो गई है। जब बाहर का मार्केट कमजोर हो और लोकल सप्लाई ज्यादा हो, तो प्राइस क्रैश होना तय है।
किसानों की एक और समस्या वैरायटी सिलेक्शन से भी जुड़ी है। कई किसान उच्च गुणवत्ता की वैराइटीज जैसे कुफरी ख्याति, कुफरी मोहन या कुफरी गौरव लगा रहे हैं, जो प्रोडक्शन तो ज्यादा देती हैं लेकिन उनकी सेल्फ लाइफ कम होती है। इसका मतलब यह है कि उन्हें जल्दी बेचने का दबाव रहता है, और जब मार्केट पहले से कमजोर हो तो किसान मजबूरी में सस्ता बेच देता है।
वहीं कुछ वैराइटीज जैसे कुफरी बाहर या चिप्सोना थोड़ी ज्यादा दिन तक स्टेबल रहती हैं, लेकिन इनका प्रोडक्शन कम होता है। इसलिए वैरायटी का चुनाव भी मार्केट स्ट्रेटजी के हिसाब से होना चाहिए, सिर्फ Yield देखकर नहीं। इस पूरे मामले में एक और बड़ी कमी दिखती है मार्केट प्लानिंग की। किसान प्रोडक्शन तो कर लेता है, लेकिन मार्केट स्ट्रेटजी क्लियर नहीं होती।
अगर किसान समूह बनाकर स्टोरेज, ग्रेडिंग और डायरेक्ट सेल पर काम करें तो कुछ हद तक प्राइस कंट्रोल किया जा सकता है। अकेला किसान हमेशा कमजोर स्थिति में रहता है, जबकि ग्रुप फार्मिंग या FPO मॉडल में बार्गेनिंग पावर बढ़ती है। यह बात अब धीरे-धीरे समझ में आ रही है, लेकिन अभी भी ग्राउंड लेवल पर इंप्लीमेंटेशन कम है।
सरकार की पॉलिसी में भी सुधार की जरूरत है। Minimum Support Price जैसा मजबूत सिस्टम आलू जैसी फसलों में नहीं है, जिससे प्राइज पूरी तरह मार्केट पर निर्भर रहता है। Market Intervention Scheme (MIS) का मकसद किसानों को बचाना होता है, लेकिन अगर रेट ही लागत से नीचे तय हो, तो उसका फायदा सीमित रह जाता है।
किसानों की मांग कि कम से कम 10 से 12 रुपय प्रति किलो रेट होना चाहिए, व्यावहारिक लगती है क्योंकि वही कॉस्ट के करीब बैठता है। आगे के लिए किसानों को भी कुछ प्रैक्टिकल बदलाव करने होंगे। सबसे पहले, क्रॉप डाइवर्सिफिकेशन जरूरी है। हर साल एक ही फसल लगाने से रिस्क बढ़ जाता है। अगर किसान आलू के साथ दूसरी फसल या सब्जियों की फसल मिक्स करे तो आमदनी का बैलेंस बना रहता है।
दूसरा, मिट्टी के स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी है। लगातार रासायनिक उर्वरक के इस्तेमाल से मिट्टी की ताकत कम होती जा रही है, जिससे लंबी अवधि में उत्पादन भी प्रभावित होता है। जैविक उर्वरक जैसे गोबर की खाद, वार्मी कंपोस्ट, समुद्री शैवाल या माइकोराइजा का इस्तेमाल बढ़ाना जरूरी है।
सिंचाई प्रबंधन भी एक महत्वपूर्ण कारक है। ज्यादा पानी देने से फसल भी खराब होती है और लागत भी ज्यादा होती है। नियंत्रित सिंचाई और उचित जल निकासी प्रणाली से गुणवत्ता बेहतर होती है, जिससे बाजार मूल्य भी अधिक होता है। कई बार किसान की मात्रा पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाता है, लेकिन आज के बाजार में गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
कीट एवं रोग प्रबंधन में भी संतुलन आवश्यक है। आवश्यकता से अधिक कीटनाशकों के उपयोग से लागत में कमी और फसल अवशेषों की समस्या भी सामने आती है, जिससे बाजार इसे अस्वीकार कर देता है। एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाना जिसमें रासायनिक, जैविक और सांस्कृतिक प्रथाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए।
इससे लागत भी कम होती है और फसल भी सुरक्षित रहती है। सबसे जरूरी बात यह है कि किसानों को बाजार की जानकारी समय पर मिलनी चाहिए। जब मांग ज्यादा हो, किस राज्य में कमी हो, कौन सी किस्म किस बाजार में चल रही है- अगर यह सही जानकारी समय पर मिल जाए तो किसान बेहतर निर्णय ले सकता है।
आज डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल के माध्यम से यह संभव है, लेकिन इसका सही उपयोग करना भी जरूरी है। आज की स्थिति कठिन जरूर है, लेकिन इससे सीख लेकर आगे की योजना मजबूत हो सकती है। खेती में सिर्फ उत्पादन का काम नहीं है, यह एक संपूर्ण प्रणाली है जिसमें मिट्टी का स्वास्थ्य, फसल का चयन, इनपुट प्रबंधन और बाजार की समझ सब कुछ शामिल है।
अगर इन सभी पुराने तरीकों से काम किया जाए तो नुकसान को कम किया जा सकता है और आने वाले समय में बेहतर मुनाफा लिया जा सकता है। यह जानकारी किसानों के अनुभव और वर्तमान परिस्थितियों पर ध्यान देते हुए साझा की गई है, ताकि हर किसान सही निर्णय ले सके और अपनी मेहनत का दाम पा सके। ऐसी ही जरूरी और जमीन से जुड़ी जानकारी किसानों के लिए लगातार कृषि जागृति के माध्यम से देना जारी रहेगी।
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