उत्तर प्रदेश में खाद वितरण को लेकर लिया गया यह फैसला सीधे तौर पर आपकी जेब और अधिकार- दोनों से जुड़ा हुआ है। राज्य के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने साफ कर दिया है कि अब टैगिंग यानी खाद के साथ जबरन दूसरे उत्पाद जोड़कर बेचने की प्रथा पर रोक रहेगी।
इसका सीधा मतलब समझिए-अगर आप सिर्फ यूरिया, डीएपी या कोई अन्य सब्सिडी वाली खाद खरीदना चाहते हैं, तो दुकानदार आपको मजबूर नहीं कर सकता कि साथ में बायोस्टिमुलेंट, कीटनाशक या कोई महंगा इनपुट भी लें। पहले कई इलाकों में यह शिकायत आम थी कि खाद तभी मिलती थी जब किसान अतिरिक्त सामान भी खरीदता था।
इससे लागत बेवजह बढ़ती थी और छोटे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होते थे। अब सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि उर्वरक वितरण किसानों की जोत (Land Holding) और फसल की सिफारिश (Crop-Based Recommendation) के आधार पर ही होगा। यानी आपको उतनी ही खाद मिलेगी जितनी आपकी जमीन और फसल के हिसाब से जरूरी है-न ज्यादा खरीदने का दबाव, न बेवजह खर्च।
यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि बायोस्टिमुलेंट या अन्य गैर-सब्सिडी वाले उत्पादों की बिक्री पर कोई प्रतिबंध नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह पूरी तरह आपकी पसंद पर निर्भर होगा, न कि दुकानदार की शर्तों पर। किसानों के नजरिए से देखें तो यह फैसला तीन स्तर पर असर डालेगा
लागत नियंत्रण: अब जबरन अतिरिक्त खरीद नहीं करनी पड़ेगी, जिससे सीधा खर्च घटेगा।
पारदर्शिता: खाद की बिक्री साफ और नियम आधारित होगी, जिससे कालाबाजारी और मनमानी कम होगी।
अधिकार: किसान को यह स्वतंत्रता मिलेगी कि वह अपनी जरूरत के अनुसार ही इनपुट खरीदे।
हालांकि, जमीनी स्तर पर असली परीक्षा अब शुरू होगी। कई बार नियम बन जाते हैं, लेकिन पालन ढीला रहता है। इसलिए किसान साथियों, अगर कहीं भी आपको अभी भी टैगिंग के नाम पर मजबूर किया जाए, तो तुरंत इसकी शिकायत करें। बिना आवाज उठाए यह सिस्टम नहीं सुधरेगा।
कुल मिलाकर, यह कदम खेती में अनुशासन लाने और किसानों को अनावश्यक आर्थिक बोझ से बचाने की दिशा में एक मजबूत पहल है। अब जरूरत है कि इसका सही पालन हो और किसान खुद भी जागरूक रहकर अपने अधिकार का इस्तेमाल करें।
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