उत्तर प्रदेश में खेती की दिशा को थोड़ा बदलने की कोशिश शुरू हो चुकी है। अब फोकस केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि मिट्टी को बचाने और लागत घटाने पर भी है। इसी कड़ी में राज्य सरकार ने रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करके हरी खाद (Green Manure) को बढ़ावा देने का फैसला लिया है।
इस पहल की जानकारी राज्य के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने समीक्षा बैठक में दी। साफ संकेत है कि आने वाले समय में खेती की रणनीति कम लागत + बेहतर मिट्टी मॉडल की ओर जाएगी। सरकार की योजना के तहत इस खरीफ सीजन में बड़े स्तर पर ढैंचा (Dhaincha) जैसे हरी खाद वाले बीजों का वितरण किया जाएगा।
करीब 45,000 क्यूंटल ढैंचा बीज उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि किसान खेत में हरी खाद तैयार कर सकें। इसके अलावा 4 लाख मिनी किट 50% सब्सिडी पर दिए जाएंगे, जिनमें ढैंचा के साथ मक्का, उर्द, ग्वार, भिंडी, लोबिया और ज्वार के बीज शामिल होंगे। इसका मकसद है कि किसान एक ही किट से विविध फसल और हरी खाद दोनों का फायदा ले सकें।
अब सवाल यह है कि हरी खाद पर इतना जोर क्यों?
दरअसल, लगातार रासायनिक खाद-खासकर यूरिया-के ज्यादा उपयोग से मिट्टी की संरचना खराब हो रही है। जमीन की जैविक शक्ति घट रही है, जिससे हर साल ज्यादा खाद डालने के बावजूद उत्पादन स्थिर या कम होता जा रहा है। ऐसे में ढैंचा जैसी फसलें खेत में उगाकर उसे जुताई के साथ मिट्टी में मिला देने से प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन और ऑर्गेनिक मैटर बढ़ता है।
इससे मिट्टी भुरभुरी होती है, पानी धारण क्षमता बढ़ती है और अगली फसल को बेहतर पोषण मिलता है। सरकार ने खरीफ 2026 के लिए बीज वितरण का लक्ष्य भी काफी बढ़ाया है। इस बार कुल लक्ष्य 2,33,177 क्विंटल रखा गया है, जो पिछले साल से काफी ज्यादा है। इसमें धान, दलहन, तिलहन और बाजरा जैसी फसलों पर विशेष फोकस है।
साथ ही श्री अन्न (मोटे अनाज) जैसे रागी, कोदो और सावा को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि, जमीनी स्तर पर चुनौती अभी भी बनी हुई है। कई बार योजनाएं कागज पर अच्छी दिखती हैं, लेकिन किसानों तक सही समय पर बीज और जानकारी नहीं पहुंच पाती।
अगर हरी खाद को सच में सफल बनाना है, तो सिर्फ बीज बांटना काफी नहीं होगा-किसानों को इसके फायदे, सही समय और तकनीक की पूरी जानकारी भी देनी होगी। दूसरी अहम बात यह है कि उर्वरक वितरण प्रणाली पर भी सख्ती के निर्देश दिए गए हैं।
इसका मतलब है कि आने वाले समय में खाद की उपलब्धता और बिक्री पर निगरानी और बढ़ेगी, ताकि कालाबाजारी और कमी की स्थिति न बने। कुल मिलाकर, यह पहल खेती को टिकाऊ बनाने की दिशा में एक जरूरी कदम है।
लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि किसान इसे कितनी तेजी से अपनाते हैं और सरकार जमीनी स्तर पर इसे कितनी प्रभावी तरीके से लागू कर पाती है। अगर आप लागत कम करना चाहते हैं और मिट्टी की ताकत बढ़ाना चाहते हैं, तो हरी खाद को अपनी खेती का हिस्सा बनाना अब केवल विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बनता जा रहा है।
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