देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में इस साल लगभग 315 लाख टन उत्पादन का अनुमान है, लेकिन सरकारी खरीद की स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है। अब तक केवल 4.96 लाख टन गेहूं ही खरीदा जा सका है, जो कुल उत्पादन का बहुत छोटा हिस्सा है और पिछले साल से भी पीछे है। इस रफ्तार से तो 5 प्रतिशत खरीद तक पहुंचना भी मुश्किल नजर आ रहा है।
समस्या सिर्फ आंकड़ों की नहीं है, बल्कि सिस्टम की है। हर साल किसानों को भरोसा दिलाया जाता है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उनकी फसल खरीदी जाएगी, लेकिन जमीन पर स्थिति उलट दिखाई देती है। खरीद केंद्र देर से खुलना, रजिस्ट्रेशन और सत्यापन में दिक्कतें, भुगतान में देरी, ये सब मिलकर किसान को मजबूर कर देते हैं कि वह अपनी मेहनत की फसल सस्ते में बेच दे।
इसका सीधा असर बाजार में देखने को मिल रहा है। किसान एमएसपी से 100 से 200 रुपए कम दाम पर व्यापारियों को गेहूं बेचने को मजबूर हैं। यह मजबूरी इसलिए है क्योंकि किसान के पास इंतजार करने का विकल्प नहीं होता। उसे तुरंत पैसे की जरूरत होती है। कर्ज चुकाने के लिए, अगली फसल की तैयारी के लिए, और घर के खर्च के लिए।
स्थिति और गंभीर इसलिए हो गई है क्योंकि इस बार हरियाणा में गेहूं बेचने का विकल्प भी लगभग बंद हो गया है। पहले कई किसान अपनी उपज दूसरे राज्यों में ले जाकर बेहतर दाम हासिल कर लेते थे, लेकिन अब यह रास्ता भी सीमित हो गया है। इससे स्थानीय मंडियों पर दबाव बढ़ा है और किसानों की सौदेबाजी की ताकत और कमजोर हुई है।
यह सवाल उठता है कि जब उत्पादन अच्छा है, तो खरीद क्यों नहीं बढ़ रही। क्या सरकार के पास पर्याप्त तैयारी नहीं थी, या फिर जमीनी स्तर पर व्यवस्था ठीक से लागू नहीं हो रही। अगर खरीद केंद्र पर्याप्त संख्या में सक्रिय नहीं हैं और प्रक्रिया धीमी है, तो इसका नुकसान सीधा किसान को ही उठाना पड़ता है।
किसानों के लिए यह स्थिति बताती है कि सिर्फ उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि बाजार और खरीद व्यवस्था का मजबूत होना भी उतना ही जरूरी है। जब तक समय पर और पर्याप्त मात्रा में सरकारी खरीद नहीं होगी, तब तक एमएसपी का फायदा कागजों तक ही सीमित रहेगा।
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