किसानों के लिए कागजों पर योजनाएँ जितनी आकर्षक दिखती हैं, ज़मीनी सच्चाई उतनी ही उलझी हुई नजर आती है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना का मकसद साफ था। छोटे और सीमांत किसानों को सीधे आर्थिक सहारा देना। लेकिन हाल की खबरें बताती हैं कि इस योजना का क्रियान्वयन कई जगहों पर अपनी मूल भावना से भटक चुका है।
रिपोर्ट में सामने आया है कि एक ही खेत और एक ही परिवार को कई हिस्सों में बाँटकर अलग-अलग लाभार्थी बना दिए गए। पति-पत्नी को अलग दिखाना, परिवार को कागजों में तोड़ना, और हर सदस्य के नाम पर पैसा लेना- ये सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी नहीं है, बल्कि सिस्टम की कमजोर निगरानी का सीधा परिणाम है।
सवाल यह है कि जब नियम स्पष्ट हैं, तो फिर ऐसी खामियां बार-बार क्यों सामने आती हैं? सबसे बड़ी समस्या सत्यापन प्रणाली की दिखती है। अगर पात्रता की जांच सही तरीके से हो रही होती, तो एक ही परिवार के कई खाते कैसे बन जाते? डिजिटल इंडिया और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की बात जरूर होती है।
लेकिन जब डेटा ही गलत या अधूरा है, तो तकनीक भी सही नतीजा नहीं दे सकती। इसका सीधा असर उन किसानों पर पड़ता है, जो सच में इस सहायता के हकदार हैं। इस पूरे मामले में प्रशासनिक जवाबदेही भी सवालों के घेरे में है।
स्थानीय स्तर पर जांच और निगरानी की जिम्मेदारी तय है, फिर भी इस तरह की गड़बड़ियां लंबे समय तक चलती रहती हैं। इसका मतलब साफ है कि या तो जांच सतही है या फिर जानबूझकर अनदेखी की जा रही है। दोनों ही स्थितियां किसान हित में नहीं हैं। एक और गंभीर पहलू यह है कि ऐसी अनियमितताओं के कारण सरकार अक्सर नियमों को और सख्त कर देती है।
इसका खामियाजा अंततः ईमानदार किसान को उठाना पड़ता है। उसे बार-बार दस्तावेज़ जमा करने पड़ते हैं, सत्यापन के चक्कर लगाने पड़ते हैं, और कई बार समय पर पैसा भी नहीं मिल पाता। किसानों के लिए यह समय सिर्फ योजना की तारीफ करने का नहीं, बल्कि उसकी कमियों को पहचानने का है।
जब तक सिस्टम में पारदर्शिता, सख्त निगरानी और जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक किसी भी योजना का पूरा लाभ सही लोगों तक नहीं पहुंच पाएगा। जरूरत है कि सरकार और प्रशासन दोनों मिलकर इस तरह की खामियों को दूर करें, ताकि किसान के नाम पर बनी योजना सच में किसान तक पहुंचे।
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