गन्ना किसानों की आय दोगुनी या लागत का बोझ चौगुना? आंकड़ों और खेत की हकीकत के बीच फंसा किसान

जब भी हम अखबार में ऐसी खबर पढ़ते हैं कि गन्ना किसानों की आय दोगुनी से अधिक हो गई है, तो एक किसान होने के नाते मन में सबसे पहला सवाल यही आता है कि क्या सच में हमारी हालत इतनी बेहतर हो गई है? कागजों में दिख रहे आंकड़े और खेत में खड़ी फसल की सच्चाई अक्सर एक जैसी नहीं होती।मैं खुद खेती से जुड़ा हूं और किसानों से रोज बात होती है।

गन्ने की खेती आसान नहीं है। यह एक लंबी फसल है, जिसमें एक बार लगाने के बाद पूरे साल खर्च चलता रहता है। खाद, पानी, मजदूरी, दवाई, ट्रांसपोर्ट-हर चीज का खर्च पहले से बढ़ चुका है। ऐसे में अगर कोई कहता है कि आय दोगुनी हो गई है, तो हमें यह भी देखना चाहिए कि खर्च कितना बढ़ा है और आखिर में किसान के हाथ में बच क्या रहा है।

खबर में बताया गया है कि गन्ने का रेट 300 से बढ़ाकर 400 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है और भुगतान तेजी से हो रहा है। यह बात सुनने में अच्छी लगती है और अगर सही तरीके से हर किसान तक पहुंचे तो निश्चित ही राहत मिल सकती है। लेकिन जमीन पर कई किसानों को आज भी समय पर भुगतान नहीं मिल पाता।

कई बार पैसे किश्तों में आते हैं, जिससे घर और खेती दोनों की योजना बिगड़ जाती है। सरकार यह भी कहती है कि किसानों को बिजली बिल में राहत दी जा रही है और सिंचाई की सुविधाएं बढ़ाई गई हैं। यह जरूरी कदम हैं, लेकिन हर गांव और हर किसान तक इनका फायदा बराबर पहुंचे, यह भी उतना ही जरूरी है।

छोटे और सीमांत किसान कई योजनाओं से पूरी तरह जुड़ नहीं पाए हैं। एक और बात जो अक्सर नजरअंदाज हो जाती है, वह है उत्पादन बढ़ने का असर। जब उत्पादन ज्यादा होता है, तो हमें लगता है कि किसान की कमाई भी ज्यादा होगी। लेकिन अगर लागत भी उसी अनुपात में बढ़ रही है और भुगतान समय पर नहीं मिल रहा, तो ज्यादा उत्पादन भी किसान के लिए दबाव बन जाता है।

सच्चाई यह है कि किसान अपनी मेहनत का सही हिसाब बहुत अच्छे से समझता है। उसे पता होता है कि एक एकड़ में कितना खर्च हुआ और बदले में कितना मिला। अगर कागजों में आय बढ़ी दिख रही है, लेकिन किसान की जिंदगी में सुधार उतना नजर नहीं आ रहा, तो हमें ईमानदारी से इस अंतर को समझने की जरूरत है।

हम किसी भी अच्छी पहल का विरोध नहीं करते। अगर वास्तव में किसानों की आय बढ़ी है, तो यह स्वागत योग्य है। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि हर किसान तक उसका लाभ पहुंचे और वह खुद महसूस करे कि उसकी स्थिति बेहतर हुई है। सिर्फ आंकड़ों से नहीं, बल्कि जमीन की सच्चाई से ही असली तस्वीर सामने आती है।

यही उम्मीद है कि नीतियां ऐसी बनें जो किसान की जेब तक पहुंचें। समय पर भुगतान, लागत पर नियंत्रण और सही दाम- अगर ये तीन चीजें ठीक हो जाएं, तो किसान को किसी दावे की जरूरत नहीं पड़ेगी, वह खुद अपनी तरक्की की कहानी लिख देगा।

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