छह महीने की कड़ी मेहनत, ठंड-गर्मी सहने और दिन-रात खेत में पसीना बहाने के बाद जब अप्रैल के महीने में किसान अपने खेत से सुनहरा गेहूं निकालकर घर लाते हैं, तो वह सिर्फ अनाज नहीं बल्कि हमारी साल भर की कमाई और परिवार की सुरक्षा होती है।
लेकिन सच्चाई यह है कि असली चुनौती फसल काटने के बाद शुरू होती है। अगर भंडारण सही तरीके से नहीं किया गया, तो यही गेहूं कुछ ही महीनों में घुन, सुंडी और खपरा जैसे कीड़ों का शिकार बनकर बर्बाद हो सकता है। इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि आखिर बंद कोठी में कीड़े आते कहां से हैं और उन्हें रोकने का सही तरीका क्या है।
सबसे पहले इस सवाल का वैज्ञानिक जवाब समझिए कि जब हम पूरी तरह बंद लोहे की कोठी में गेहूं रखते हैं, तब भी उसमें कीड़े कैसे पैदा हो जाते हैं। दरअसल, यह कीड़े बाहर से अंदर नहीं आते, बल्कि इनके अंडे पहले से ही गेहूं में मौजूद होते हैं। जब फसल खेत में पक रही होती है या कटाई के बाद खलिहान में रखी होती है, तब घुन और भृंग जैसे कीट उसमें अंडे दे देते हैं।
ये अंडे इतने छोटे होते हैं कि आंखों से दिखाई नहीं देते। जब हम उसी गेहूं को बिना सही तैयारी के भंडारित कर देते हैं, तो अनुकूल वातावरण मिलते ही ये अंडे फूटकर कीड़ों में बदल जाते हैं और अंदर ही अंदर पूरे अनाज को नुकसान पहुंचाते हैं। अब बात आती है उन गलतियों की, जो अक्सर किसान अनजाने में कर बैठते हैं। पहली और सबसे बड़ी गलती है नमी।
अगर गेहूं में 10 से 12 प्रतिशत से ज्यादा नमी रह गई, तो बंद कोठी के अंदर गर्मी और उमस पैदा होती है। यही माहौल कीड़ों के अंडों को सक्रिय कर देता है। इसलिए भंडारण से पहले गेहूं को तेज धूप में अच्छी तरह सुखाना बेहद जरूरी है। सही तरीके से सूखा गेहूं दांत से दबाने पर तेज आवाज के साथ टूटता है। अगर दाना दब रहा है, तो उसमें नमी अभी भी मौजूद है।
दूसरी बड़ी गलती है भंडारण स्थान की सफाई न करना। कई बार किसान पिछले साल की कोठी या बोरी को बिना साफ किए ही नया गेहूं भर देते हैं। पुरानी कोठी की दरारों और बोरियों में पहले से ही कीड़े और उनके अंडे छिपे होते हैं। नया अनाज आते ही ये सक्रिय हो जाते हैं। इसलिए कोठी को अच्छी तरह साफ करना, धूप में सुखाना और बोरियों को गर्म पानी से धोकर इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है।
तीसरी गलती है गर्म गेहूं को सीधे कोठी में भर देना। धूप में सुखाने के बाद गेहूं बहुत गर्म हो जाता है। अगर इसे तुरंत बंद कोठी में भर दिया जाए, तो अंदर भाप बनती है और नमी बढ़ जाती है। इससे फंगस और कीड़े दोनों तेजी से विकसित होते हैं। इसलिए गेहूं को भरने से पहले उसे पूरी तरह ठंडा होने देना चाहिए।
अब बात करते हैं बिना किसी रासायनिक दवा के गेहूं को सुरक्षित रखने के देसी और वैज्ञानिक तरीकों की। सबसे प्रभावी तरीका है सूखी नीम की पत्तियों का उपयोग। नीम में प्राकृतिक कीटनाशक गुण होते हैं। सूखी पत्तियों की परत को नीचे, बीच और ऊपर रखने से कीड़े दूर रहते हैं। दूसरा तरीका है माचिस की डिब्बियों का उपयोग।
इसमें मौजूद फास्फोरस और सल्फर की गंध कीड़ों को पनपने नहीं देती। तीसरा तरीका लहसुन और लौंग का है, जिनकी तेज गंध कीड़े सहन नहीं कर पाते। चौथा तरीका अरंडी के तेल का है, जिससे बीज वाले गेहूं को सुरक्षित रखा जा सकता है क्योंकि यह दानों पर परत बनाकर कीड़ों को नुकसान पहुंचाने से रोकता है।
हालांकि, कुछ स्थितियों में जब कीड़ों का प्रकोप बहुत ज्यादा हो जाए, तब किसान मजबूरी में रासायनिक दवाओं का उपयोग करते हैं। इसमें सबसे ज्यादा उपयोग होने वाली दवा है एलुमिनियम फास्फाइड, जिसे आम भाषा में सल्फास कहा जाता है। लेकिन इसका उपयोग बेहद सावधानी से करना चाहिए।
इसे कभी भी नंगे हाथों से नहीं छूना चाहिए क्योंकि नमी के संपर्क में आते ही यह जहरीली गैस छोड़ती है। इसे हमेशा कपड़े में बांधकर पोटली बनाकर गेहूं के बीच में रखना चाहिए, ताकि दाना सीधे संपर्क में न आए। साथ ही, कोठी को पूरी तरह एयरटाइट बंद करना जरूरी है, नहीं तो गैस बाहर निकलकर इंसानों के लिए खतरनाक हो सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि खाने वाले गेहूं में कभी भी रासायनिक दवा का उपयोग नहीं करना चाहिए। इसके लिए हमेशा प्राकृतिक और सुरक्षित तरीकों का ही इस्तेमाल करें। दवाइयों का उपयोग केवल बीज या बेचने वाले अनाज में ही सीमित रखें।
गेहूं का सही भंडारण उतना ही जरूरी है जितना उसकी खेती। थोड़ी सी सावधानी और सही जानकारी से हम अपनी साल भर की मेहनत को सुरक्षित रख सकते हैं। अगर किसान वैज्ञानिक सोच और पारंपरिक ज्ञान को मिलाकर काम करें, तो न सिर्फ अनाज सुरक्षित रहेगा बल्कि परिवार का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहेगा। यही समझदारी असली मुनाफे की कुंजी है।
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