महंगे कीटनाशकों से पाए छुटकारा: घर पर ऐसे बनाएं प्रभावी नीमास्त्र और अग्न्यस्त्र

किसानों के लिए आज की खेती एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां लागत लगातार बढ़ रही है और मुनाफा घटता जा रहा है। कीटों के बढ़ते प्रकोप ने किसानों को बाजार के महंगे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर बना दिया है। लेकिन सच्चाई यह है कि इन रसायनों से कीट कुछ समय के लिए तो नियंत्रित होते हैं।

परंतु बाद में उनमें प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है और समस्या और गंभीर हो जाती है। साथ ही, यह रसायन हमारी मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में जरूरी है कि हम फिर से उन कुदरती और वैज्ञानिक तरीकों की ओर लौटें जो हमारे पूर्वज अपनाते थे।

नीमास्त्र और अग्न्यस्त्र ऐसे ही दो प्रभावी जैविक कीटनाशक हैं, जो कम लागत में बेहतरीन परिणाम देते हैं। सबसे पहले बात करते हैं नीमास्त्र की, जो रस चूसक कीटों जैसे सफेद मक्खी, माहू, थ्रिप्स और जेसिड के नियंत्रण के लिए अत्यंत प्रभावी है।

नीमास्त्र की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कीटों को सीधे मारने के बजाय उनके जीवन चक्र और खाने की क्षमता को बाधित करता है, जिससे उनकी संख्या धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। नीमास्त्र बनाने की विधि इस प्रकार है। इसके लिए आपको 10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र, 2 किलो ताजा गोबर और 10 किलो नीम की पत्तियां एवं छोटी टहनियां चाहिए।

सबसे पहले एक प्लास्टिक का ड्रम लें और उसमें गोमूत्र और गोबर को अच्छी तरह मिला लें ताकि कोई गांठ न रहे। इसके बाद नीम की पत्तियों को कूटकर या पीसकर उसका पेस्ट बना लें और इस मिश्रण में डाल दें। फिर इसमें इतना पानी मिलाएं कि पूरा मिश्रण अच्छी तरह डूब जाए।

अब इस घोल को लकड़ी के डंडे से 2 से 3 मिनट तक घड़ी की दिशा में घुमाएं और ड्रम को ढककर छाया में रख दें। अगले 48 घंटे तक सुबह-शाम इसे हिलाते रहें। दो दिन बाद नीमास्त्र तैयार हो जाएगा। उपयोग से पहले इसे सूती कपड़े से छान लें। 15 लीटर के स्प्रे पंप में 500 मिलीलीटर नीमास्त्र मिलाकर छिड़काव करें। इसका प्रयोग शाम के समय करना सबसे प्रभावी रहता है।

अब बात करते हैं अग्न्यस्त्र की, जो तना छेदक और फल छेदक जैसी इल्लियों के लिए अत्यंत प्रभावी उपाय है। यह कीटनाशक अपने तीव्र और तेज गुणों के कारण कीटों पर तुरंत असर करता है और उन्हें खत्म कर देता है।

अग्न्यस्त्र बनाने की विधि थोड़ी अलग है। इसके लिए आपको 10 लीटर गोमूत्र, 1 किलो तीखी हरी मिर्च, 500 ग्राम लहसुन, 500 ग्राम तंबाकू पाउडर और 5 किलो नीम की पत्तियां चाहिए। सबसे पहले मिर्च और लहसुन को पीसकर पेस्ट बना लें।

नीम की पत्तियों को भी कूट लें। अब एक मिट्टी या पीतल के बर्तन में गोमूत्र डालें और उसमें ये सभी सामग्री मिला दें। इसके बाद इस मिश्रण को धीमी आंच पर तब तक उबालें जब तक इसमें 4 से 5 अच्छे उबाल न आ जाएं। उबालने के बाद इसे ठंडा होने के लिए 48 घंटे तक छाया में रख दें। फिर इसे छानकर बोतलों में भर लें।

यह 2 से 3 महीने तक सुरक्षित रहता है। उपयोग के लिए 15 लीटर पानी के टैंक में 250 से 300 मिलीलीटर अग्न्यस्त्र मिलाकर छिड़काव करें। यदि कीटों का प्रकोप अधिक हो तो मात्रा 500 मिलीलीटर तक बढ़ाई जा सकती है।

इन दोनों जैविक कीटनाशकों का उपयोग करते समय कुछ महत्वपूर्ण सावधानियां बरतना जरूरी है। कभी भी इनमें रासायनिक दवाइयां, साबुन या डिटर्जेंट न मिलाएं। यदि चिपकने के लिए कुछ मिलाना हो तो एलोवेरा का रस उपयोग कर सकते हैं।

छिड़काव हमेशा शाम के समय करें, क्योंकि तेज धूप में इनका असर कम हो जाता है। साथ ही, इन्हें बहुत लंबे समय तक स्टोर न करें। नीमास्त्र को एक महीने के भीतर और अग्न्यस्त्र को तीन महीने के भीतर उपयोग कर लेना चाहिए।

यदि हम इन कुदरती उपायों को अपनाते हैं, तो हम अपनी खेती की लागत को काफी हद तक कम कर सकते हैं और मिट्टी की सेहत को भी बनाए रख सकते हैं। यह केवल एक विकल्प नहीं बल्कि टिकाऊ खेती की दिशा में एक मजबूत कदम है। आज जरूरत है कि हम अपने पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक समझ के साथ जोड़कर अपनाएं और आत्मनिर्भर खेती की ओर बढ़ें।

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