विदेशी तेल महंगा होने से सरसों और सोयाबीन की कीमतों में मजबूती

देश की प्रमुख मंडियों में तिलहन के भाव इस समय अपनी मजबूती दर्ज करा रहे हैं। सरसों और सोयाबीन की कीमतों में यह तेजी वैश्विक बाजार में खाद्य तेलों के महंगे होने का सीधा परिणाम है। चूंकि आयातित तेल अब जेब पर भारी पड़ रहे हैं, इसलिए घरेलू मांग पूरी तरह से स्थानीय सरसों और सोयाबीन की ओर मुड़ गई है, जिससे बाजार को बड़ा सहारा मिला है।

राजस्थान की कोटा मंडी में सरसों के दाम 25 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़त के साथ 7,251 रुपये तक पहुंच गए हैं। कारोबारियों का कहना है कि आयातित तेलों की बढ़ती लागत ने खरीदारों को स्थानीय स्टॉक की ओर आकर्षित किया है। हालांकि, जयपुर बाजार में भाव 7,400 से 7,425 रुपये के दायरे में स्थिर रहे। हाल ही में कीमतों में आए करीब 250 रुपये के बड़े उछाल के बाद अब खरीदार और स्टॉकिस्ट थोड़े सतर्क नजर आ रहे हैं और फिलहाल जरूरत के हिसाब से ही सौदे कर रहे हैं।

आपूर्ति की बात करें तो देशभर की मंडियों में सरसों की आवक लगभग 9.5 लाख बोरी के आसपास बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आवक फिलहाल बाजार की जरूरतों को पूरा करने के लिए सामान्य है, जिससे आपूर्ति का संकट नहीं दिख रहा है। मजबूत भावों के पीछे का असली कारण मांग और आपूर्ति के संतुलन के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार का दबाव है।

सोयाबीन के मोर्चे पर भी बाजार में काफी गहमागहमी है। मध्य प्रदेश की रतलाम मंडी में सोयाबीन के भाव 6,325 से 6,650 रुपये प्रति क्विंटल के बीच मजबूती से टिके हुए हैं। तेल मिलों और प्रसंस्करणकर्ताओं की ओर से लगातार हो रही खरीदारी ने इन कीमतों को गिरने नहीं दिया है। घरेलू स्तर पर उत्पादित तिलहनों की बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति का सीधा लाभ अब किसानों और स्थानीय व्यापारियों को मिल रहा है।

निष्कर्ष: वैश्विक बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण आयातित तेल महंगे हो गए हैं, जिससे घरेलू बाजार में स्थानीय तिलहनों (सरसों और सोयाबीन) की मांग और कीमतों में भारी मजबूती आई है। राजस्थान और मध्य प्रदेश की प्रमुख मंडियों में कीमतों में आया यह उछाल स्थानीय मांग बढ़ने और तेल मिलों द्वारा की जा रही निरंतर खरीदारी का परिणाम है।

हालांकि, हालिया तेजी के बाद खरीदार अब थोड़े सतर्क होकर जरूरत के मुताबिक ही सौदे कर रहे हैं, लेकिन मंडियों में सामान्य आवक और मजबूत मांग के चलते बाजार का यह रुख फिलहाल किसानों और स्थानीय व्यापारियों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रहा है।

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