हिसार: लाइसेंस सस्पेंड के बावजूद धड़ल्ले से बिक रही खाद, कृषि विभाग की कार्रवाई पर सवाल

खाद की कालाबाजारी और किसानों से जबरन वसूली के मामलों पर कार्रवाई के दावे तो खूब होते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही दिखाई देती है। ताजा मामला हरियाणा के हिसार से सामने आया है, जहां एक खाद-बीज विक्रेता का लाइसेंस निलंबित होने के बाद भी दुकान खुली रही और खुलेआम खाद-बीज की बिक्री जारी रही।

बताया जा रहा है कि 8 मई को एक किसान द्वारा यूरिया खाद लेने के दौरान दुकानदार पर अतिरिक्त सामान थोपने और ज्यादा पैसे वसूलने का आरोप लगाया गया था। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद कृषि विभाग हरकत में आया और दुकानदार से जवाब मांगा गया। बाद में दुकान का लाइसेंस निलंबित कर दिया गया।

लेकिन सवाल यह है कि अगर लाइसेंस निलंबित हो चुका था, तो फिर दुकान पर बिक्री कैसे जारी रही? क्या प्रशासन की कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित है? क्या किसानों के हितों की रक्षा सिर्फ प्रेस नोट और आदेश जारी करने तक रह गई है?

किसानों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि खाद के सीजन में उन्हें अक्सर मजबूरी का फायदा उठाकर अतिरिक्त सामान खरीदने पर मजबूर किया जाता है। कहीं दवाई टैग की जाती है, कहीं माइक्रोन्यूट्रिएंट और कहीं जरूरत से ज्यादा कीमत वसूली जाती है। जब किसान विरोध करता है, तब जाकर मामला सामने आता है।

अगर लाइसेंस निलंबन के बाद भी दुकानें खुली रहती हैं और बिक्री जारी रहती है, तो इससे साफ सवाल उठता है कि विभागीय निगरानी आखिर कितनी मजबूत है। सिर्फ कार्रवाई का आदेश देना काफी नहीं है, उसका पालन भी उतना ही जरूरी है।

आज जरूरत इस बात की है कि खाद वितरण व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी बने। किसानों को बिना दबाव के जरूरत के अनुसार खाद मिले और दोषी पाए जाने वाले विक्रेताओं पर सिर्फ दिखावटी नहीं बल्कि सख्त कार्रवाई हो।

निष्कर्ष: किसानों के हितों की रक्षा के लिए की जाने वाली प्रशासनिक कार्रवाई केवल कागजी आदेशों और दिखावे तक सीमित नजर आती है। लाइसेंस निलंबन जैसी कड़ी कार्रवाई के बावजूद दुकान का खुलेआम चलते रहना विभागीय निगरानी और इच्छाशक्ति की गंभीर विफलता को दर्शाता है।

खाद के सीजन में किसानों से जबरन वसूली और जरूरत से ज्यादा दाम वसूलना एक पुरानी और गहरी समस्या है, जिसे दूर करने के लिए सिर्फ प्रेस नोट जारी करना काफी नहीं है। जब तक नियमों का जमीन पर कड़ाई से पालन सुनिश्चित नहीं किया जाएगा और दोषी विक्रेताओं पर ऐसी सख्त कार्रवाई नहीं होगी जो दूसरों के लिए नजीर बने, तब तक खाद वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता लाना और किसानों को शोषण से बचाना पूरी तरह असंभव बना रहेगा।

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