डीजल पर नई पाबंदियां केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं हैं, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खेती की मौजूदा हालत का आईना भी हैं। उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में प्रशासन ने डीजल के दुरुपयोग को रोकने के नाम पर किसानों के लिए नई व्यवस्था लागू कर दी है। अब किसानों को डीजल लेने से पहले अपनी खसरा-खतौनी लेखपाल से सत्यापित करानी होगी और यह साबित करना होगा कि उन्होंने कितनी जमीन में गन्ना, मूंग, उड़द, मक्का या सब्जी की खेती की है।
इसके बाद ही उन्हें केन, पीपे या डिब्बे में डीजल मिलेगा। प्रशासन का तर्क है कि इससे डीजल की कालाबाजारी और गलत इस्तेमाल रुकेगा, लेकिन सवाल यह है कि इसका सबसे ज्यादा बोझ आखिर किस पर पड़ेगा? जवाब साफ है- छोटे और सीमांत किसान पर।आज गांव का किसान पहले ही खाद, बीज, कीटनाशक, मजदूरी और बिजली के बढ़ते खर्च से दबा हुआ है।
सिंचाई के लिए डीजल उसकी मजबूरी है, शौक नहीं। ऐसे समय में अगर किसान को डीजल लेने के लिए पहले लेखपाल के चक्कर लगाने पड़ें, दस्तावेज सत्यापित कराने पड़ें और फिर पंप पर लाइन में खड़ा होना पड़े, तो यह व्यवस्था खेती को और जटिल बनाने वाली साबित हो सकती है। जिन किसानों के पास सीमित समय है, जिनकी फसल सूखने की कगार पर होती है, उनके लिए यह प्रक्रिया अतिरिक्त परेशानी पैदा करेगी।
प्रशासन यह मानकर चल रहा है कि डीजल का बड़ा हिस्सा गलत हाथों में जा रहा है, लेकिन क्या कभी यह जांच हुई कि गांव में कितने किसानों को समय पर पर्याप्त बिजली मिलती है? कितने क्षेत्रों में सिंचाई के लिए सरकारी विकल्प उपलब्ध हैं? जब खेतों तक नियमित बिजली नहीं पहुंचती और नहरों में पानी नहीं होता, तब किसान डीजल पंप पर निर्भर होता है।
ऐसे में डीजल को नियंत्रित करने का मतलब सीधे खेती की सांस पर नियंत्रण करना है। यह भी समझना जरूरी है कि भारत में कृषि व्यवस्था पहले ही कागजी प्रक्रियाओं से भारी हो चुकी है। किसान को खाद लेने से लेकर फसल बीमा और सरकारी योजनाओं तक हर जगह प्रमाण और सत्यापन देना पड़ता है। अब डीजल के लिए भी लेखपाल की मुहर जरूरी कर दी गई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में लेखपाल व्यवस्था की वास्तविकता किसी से छिपी नहीं है। कई बार एक हस्ताक्षर या सत्यापन के लिए किसानों को कई दिन चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऐसे में यह आदेश भ्रष्टाचार और देरी दोनों को बढ़ा सकता है। प्रशासन का उद्देश्य यदि वास्तव में डीजल की कालाबाजारी रोकना है, तो सवाल यह भी है कि क्या इसके लिए केवल किसान ही जिम्मेदार हैं?
बड़े पैमाने पर डीजल की हेराफेरी करने वाले नेटवर्क पर कार्रवाई कितनी होती है? क्या पंप स्तर पर निगरानी मजबूत की गई है? अगर नहीं, तो सबसे आसान लक्ष्य फिर वही किसान बन गया जो अपनी फसल बचाने के लिए कुछ लीटर डीजल लेने जाता है।
खेती का समय मौसम से चलता है, फाइलों से नहीं। धान की रोपाई हो, सब्जियों की सिंचाई हो या गन्ने की फसल- कई बार किसान के पास निर्णय लेने के लिए केवल कुछ घंटे होते हैं। ऐसे में अगर डीजल लेने से पहले कागजों की जांच और सत्यापन अनिवार्य कर दिया जाए, तो इसका सीधा असर फसल प्रबंधन पर पड़ेगा।
प्रशासनिक व्यवस्था और जमीनी हकीकत के बीच यही दूरी आज खेती को लगातार मुश्किल बना रही है। यह भी संभव है कि इस आदेश का कुछ सकारात्मक असर पड़े और डीजल की खुलेआम बिक्री में कमी आए। लेकिन नीति वही सफल मानी जाती है जो नियंत्रण के साथ सुविधा भी दे।
यदि सरकार और प्रशासन वास्तव में किसानों के हित में काम करना चाहते हैं, तो उन्हें पहले गांवों में सिंचाई और बिजली व्यवस्था को मजबूत करना होगा। डिजिटल सत्यापन, किसान पंजीकरण और आसान प्रक्रिया जैसे विकल्प विकसित करने होंगे ताकि किसान को हर बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें।
आज का किसान केवल मौसम से नहीं लड़ रहा, बल्कि बढ़ती लागत, घटती आमदनी और बढ़ती प्रशासनिक जटिलताओं से भी जूझ रहा है। डीजल पर यह नई सख्ती एक बार फिर यही सवाल खड़ा करती है कि क्या खेती को आसान बनाने की बजाय उसे और अधिक नियंत्रण आधारित बना दिया गया है?
आप इस नए नियम को कैसे देखते हैं?
क्या यह डीजल के दुरुपयोग को रोकेगा या किसानों की मुश्किलें बढ़ाएगा?
निष्कर्ष: श्रावस्ती जिले का यह प्रशासनिक आदेश डीजल की कालाबाजारी रोकने के एक सैद्धांतिक प्रयास के रूप में तो देखा जा सकता है, लेकिन जमीनी हकीकत में यह नियंत्रण के नाम पर कृषि व्यवस्था को और अधिक जटिल बनाने वाला कदम है।
सिंचाई के संकट और बढ़ती लागत से पहले से ही जूझ रहे छोटे और सीमांत किसानों के लिए डीजल जैसी बुनियादी जरूरत के लिए भी लेखपाल व्यवस्था के चक्कर काटना समय और संसाधन दोनों की बर्बादी है।
यह नीति इस बात का सटीक उदाहरण है कि कैसे प्रशासनिक तंत्र व्यावहारिक विकल्पों (जैसे डिजिटल किसान पंजीकरण या पंप-स्तरीय निगरानी) को चुनने के बजाय पारंपरिक कागजी प्रक्रियाओं को थोप देता है, जिससे समस्या का समाधान होने से ज्यादा किसानों की कृषि लागत, भ्रष्टाचार और मानसिक परेशानी बढ़ने की आशंका मजबूत होती है।
यह भी पढ़े: डांग में स्ट्रॉबेरी उत्पादन ने पकड़ी रफ्तार, किसानों को दिख रहा मुनाफा
जागरूक रहिए व नुकसान से बचिए और अन्य लोगों के जागरूकता के लिए साझा करें। कृषि लेख, सरकारी योजनाएं, कृषि तकनीक, व्यवसायिक एवं जैविक खेती से संबंधित सटीक जानकारियां प्राप्त करने के लिए जुड़े कृषि जागृति चलो गांव की ओर से या कृषि संबंधित किसी भी समस्या के जैविक समाधान के लिए WhatsApp करें।

मेरा नाम Anil Kumar Prasad है। मैं एक प्रगतिशील किसान हूं और पिछले 5 वर्षों से खेती की बारीकियों को धरातल पर सीख और समझ रहा हूं। ‘कृषि जागृति – चलो गांव की ओर’ के माध्यम से मैं अपने निजी अनुभव और खेती की सटीक जानकारी साझा करता हूं। मेरा उद्देश्य सरकारी योजनाओं, आधुनिक तकनीक और जैविक खेती के जरिए साथी किसानों को सशक्त बनाना है।
