बिना बीजोपचार न करें धान की नर्सरी की बुवाई, स्वस्थ पौध और बेहतर उत्पादन की पहली सीढ़ी

धान भारत सहित बिहार की प्रमुख खाद्यान्न फसल है। मई के अंतिम सप्ताह से लेकर जून-जुलाई तक किसान धान की नर्सरी तैयार करने में जुट जाते हैं। नर्सरी ही भविष्य की पूरी फसल की नींव होती है। यदि इस प्रारंभिक अवस्था में बीजजनित अथवा मृदाजनित रोगों का संक्रमण हो जाए, तो पौध कमजोर हो जाती है और बाद में खेत में रोपाई के बाद भी अपेक्षित उत्पादन प्राप्त नहीं हो पाता।

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि धान उत्पादन में बीजोपचार सबसे सस्ता, सरल और सर्वाधिक लाभकारी निवेश है। आधुनिक अनुसंधानों से यह सिद्ध हुआ है कि उचित बीजोपचार से अंकुरण क्षमता बढ़ती है, पौधों की प्रारंभिक वृद्धि बेहतर होती है तथा अनेक बीजजनित एवं मृदाजनित रोगों का प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है। कई अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि बीजोपचार फसल को शुरुआती 25 से 30 दिनों तक रोगों से सुरक्षा प्रदान कर सकता है तथा उपज में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकता है।

धान की नर्सरी में सबसे बड़ा खतरा बीजजनित और मृदाजनित रोग

धान की नर्सरी में बकानी, ब्लास्ट, ब्राउन स्पॉट, शीथ ब्लाइट, सीडलिंग रॉट तथा अन्य फफूंदजनित रोग अक्सर बीज या मिट्टी के माध्यम से फैलते हैं। एक बार संक्रमण होने पर पूरा नर्सरी क्षेत्र प्रभावित हो सकता है। परिणामस्वरूप पौधों की संख्या कम हो जाती है, पौधे कमजोर रहते हैं और रोपाई के बाद खेत में उनकी बढ़वार भी प्रभावित होती है।

ऐसी स्थिति में बीजोपचार बीज के चारों ओर एक सुरक्षात्मक कवच का निर्माण करता है, जो अंकुरण के दौरान रोगजनकों के आक्रमण को रोकता है और पौधों को स्वस्थ शुरुआत प्रदान करता है।

बीजोपचार क्यों है आवश्यक?

रोगों से प्रभावी सुरक्षा: बीजोपचार बीज में मौजूद रोगजनकों तथा मिट्टी में उपस्थित हानिकारक फफूंदों से सुरक्षा प्रदान करता है। इससे ब्लास्ट, बकानी, ब्राउन स्पॉट तथा सीडलिंग रॉट जैसी समस्याओं की संभावना कम हो जाती है।

बेहतर अंकुरण एवं पौध विकास: उपचारित बीजों का अंकुरण अधिक समान एवं तेज होता है। पौध मजबूत बनती है और प्रारंभिक वृद्धि बेहतर रहती है।

पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि: ट्राइकोडर्मा यानी जी-डर्मा प्लस, स्यूडोमोनास तथा अन्य जैव-एजेंट न केवल रोगों को नियंत्रित करते हैं बल्कि पौधों की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाते हैं।

अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता: स्वस्थ पौध ही स्वस्थ फसल की आधारशिला है। बीजोपचार के कारण पौधों की मृत्यु दर कम होती है, पौध संख्या अधिक रहती है तथा अंतिम उत्पादन में वृद्धि होती है।

बीजोपचार की वैज्ञानिक विधि

पहला चरण: बीज की छंटाई सबसे पहले 2 प्रतिशत नमक का घोल तैयार करें। 20 ग्राम नमक प्रति लीटर पानी मिलाए। धान के बीजों को घोल में डालकर अच्छी तरह हिलाएं। ऊपर तैरने वाले हल्के, रोगग्रस्त एवं कमजोर बीजों को निकाल दें। नीचे बैठे स्वस्थ बीजों को साफ पानी से 2 से 3 बार धो लें और किसी छायादार स्थान पर सुखा लें। यह प्रक्रिया स्वस्थ और भारी बीजों के चयन में अत्यंत उपयोगी है।

दूसरा चरण: फफूंदनाशी बीजोपचार- धान की नर्सरी के लिए निम्न उपचार प्रभावी माने जाते हैं। कार्बेन्डाजिम 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज या कैप्टान 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज या थीरम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज को हाल के तकनीकी दिशानिर्देशों में कार्बेन्डाजिम 1.5 से 2.0 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज अथवा ट्राइकोडर्मा 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की अनुशंसा की गई है।

तीसरा चरण: जैविक बीजोपचार- रासायनिक उपचार के बाद जैव-एजेंट का प्रयोग अत्यंत लाभकारी है। ट्राइकोडर्मा यानी 10 ग्राम जी-डर्मा प्लस को प्रति किलोग्राम बीज या स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से उपचारित करें।

ट्राइकोडर्मा यानी जी-डर्मा प्लस धान में सीडलिंग रॉट, शीथ ब्लाइट तथा अन्य मृदाजनित रोगों के विरुद्ध प्रभावी सुरक्षा प्रदान करता है तथा जड़ों के विकास को भी बढ़ावा देता है।

चौथा चरण: जैव उर्वरक उपचार- बीजों को निम्न जैव उर्वरकों से भी उपचारित किया जा सकता है- पीएसबी (फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु)- 6 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज या एजेटोबैक्टर/एजोस्पिरिलम- 6 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज, इन जैव उर्वरकों से पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है और प्रारंभिक वृद्धि में सुधार होता है।

बीजोपचार का सही क्रम

किसानों को निम्न क्रम का पालन अवश्य करना चाहिए- फफूंदनाशक, कीटनाशक (यदि आवश्यक हो), जैव एजेंट (ट्राइकोडर्मा, स्यूडोमोनास), जैव उर्वरक (पीएसबी, एजेटोबैक्टर) यह क्रम वैज्ञानिक रूप से सबसे प्रभावी माना जाता है।

बीजोपचार के दौरान महत्वपूर्ण सावधानियाँ

उपचारित बीजों को छाया में ही सुखाएं।उपचार के बाद यथाशीघ्र बुवाई करें। उपचारित बीजों को भोजन अथवा पशुचारे के रूप में उपयोग न करें। दवाओं के खाली पैकेटों का सुरक्षित एवं पर्यावरण-अनुकूल निस्तारण करें। जैविक उत्पादों को सीधे रासायनिक फफूंदनाशकों के साथ न मिलाएं। उपचार करते समय दस्ताने और मास्क का प्रयोग करें।

बदलते जलवायु परिदृश्य में बीजोपचार का बढ़ता महत्व

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित वर्षा, अधिक आर्द्रता तथा तापमान में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। ऐसी परिस्थितियाँ धान की नर्सरी में रोगों के प्रकोप को बढ़ावा देती हैं।

इसलिए बीजोपचार अब केवल एक वैकल्पिक उपाय नहीं, बल्कि सफल धान उत्पादन की अनिवार्य तकनीक बन चुका है। स्वस्थ पौधशाला ही उच्च उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और अधिक लाभ की गारंटी देती है।

किसानों के लिए संदेश

प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह का किसानों से आग्रह है कि वे“बचाव ही उपचार है” के सिद्धांत को अपनाएं। धान की नर्सरी में बुवाई से पहले बीजोपचार अवश्य करें। मात्र कुछ रुपये प्रति किलोग्राम बीज की लागत से पूरी फसल को प्रारंभिक रोगों से बचाया जा सकता है, पौधों की जीवंतता बढ़ाई जा सकती है तथा उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि प्राप्त की जा सकती है। स्वस्थ बीज, स्वस्थ पौध और स्वस्थ फसल ही समृद्ध किसान का आधार है।

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