धान की खेती करने वाले किसानों के लिए यह समय बेहद महत्वपूर्ण है। सही समय पर नर्सरी तैयार करना और वैज्ञानिक तरीके से बिजाई करना ही आगे चलकर बेहतर उत्पादन की सबसे बड़ी गारंटी बनता है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार मध्यम अवधि वाली धान की किस्मों की नर्सरी 30 मई तक और कम अवधि वाली बौनी किस्मों की नर्सरी 30 जून तक अवश्य लगा लेनी चाहिए।
समय पर तैयार की गई नर्सरी से पौधे मजबूत बनते हैं, रोग कम लगते हैं और खेत में रोपाई के बाद फसल तेजी से विकास करती है।हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर काम्बोज ने किसानों को सलाह दी है कि धान की बिजाई से पहले बीजोपचार जरूर करें। बीजोपचार करने से बीज जनित रोगों से काफी हद तक बचाव किया जा सकता है।
10 ग्राम कार्बेन्डाजिम, 1 ग्राम स्ट्रैप्टोसाइक्लिन और 10 लीटर पानी का घोल बनाकर उसमें 10 से 12 किलोग्राम धान के बीज को 24 घंटे तक भिगोकर उपचारित करें। इससे बीज स्वस्थ रहेगा और अंकुरण भी अच्छा होगा। बीज की शुद्धता जांचने के लिए नमक घोल परीक्षण भी बेहद जरूरी है। 10 लीटर पानी में 1 किलोग्राम नमक मिलाकर घोल तैयार करें और उसमें 10 किलो बीज डालें।
हल्के, रोगग्रस्त और आभासी कंडुआ रोग से प्रभावित बीज ऊपर तैरने लगते हैं। इन्हें तुरंत निकालकर नष्ट कर दें। नीचे बैठने वाले भारी और स्वस्थ बीजों को 3 से 4 बार साफ पानी से धोकर ही बिजाई करें। यह छोटा सा तरीका आगे चलकर फसल को बड़े नुकसान से बचा सकता है। धान की नर्सरी में खरपतवार नियंत्रण बेहद जरूरी है।
यदि शुरुआती अवस्था में खरपतवार नियंत्रण नहीं किया गया तो पौध कमजोर रह जाती है और उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। बिजाई के 1 से 3 दिन बाद 600 ग्राम प्रेटिलाक्लोर 30 ईसी को 60 किलोग्राम सूखी रेत में मिलाकर प्रति एकड़ प्रयोग करें। अंकुरित धान की बिजाई के 6 दिन बाद 1.2 लीटर ब्यूटाक्लोर ईसी या थायोबेनकार्ब को सूखी रेत में मिलाकर डाल सकते हैं।
यदि बाद में खरपतवार दिखाई दें तो बिजाई के लगभग 15 दिन बाद 100 मिलीलीटर बिस्पाइरीबैक सोडियम 10 एसएल को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें। इससे घास और चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों पर अच्छा नियंत्रण मिलता है और धान की बढ़वार तेज होती है।
धान की मजबूत नर्सरी तैयार करने के लिए खेत में पर्याप्त पोषण देना भी जरूरी है। प्रति एकड़ 5 से 7 ट्रॉली 12 माह पुरानी सड़ी हुई गोबर की खाद का छिड़काव करके जुताई कर दें। इसके साथ 7:4:3 के अनुपात के अनुसार प्रति एकड़ खेत में 25 किलो यूरिया, 15 किलो एसएसपी और 10 किलो जी-सी पवार का प्रयोग करें।
बिजाई के लगभग 21 से 25 दिन बाद फिर से 15 किलो यूरिया, 10 किलो डीएपी और 10 किलोग्राम जी-प्रोम एडवांस को मिलाकर प्रति एकड़ में छिड़काव करने से पौध हरी-भरी और मजबूत बनती है। कम अवधि वाली प्रमुख धान किस्मों में आईआर-64, एचकेआर-46, एचकेआर-47 और गोबिंद शामिल हैं।
इनकी नर्सरी 20 मई से 30 जून तक लगाई जा सकती है। वहीं मध्यम अवधि वाली किस्मों जैसे जया, पीआर-106, एचकेआर-120, एचकेआर-127 और हरियाणा संकर धान-1 की नर्सरी 30 मई तक लगाने की सलाह दी गई है। अब किसान तेजी से धान की सीधी बिजाई यानी डीएसआर तकनीक की ओर भी बढ़ रहे हैं।
हरियाणा सरकार ने इस बार 22 जिलों में 5 लाख एकड़ क्षेत्र में डीएसआर का लक्ष्य रखा है। पिछले वर्ष यह लक्ष्य 4 लाख एकड़ था। डीएसआर तकनीक से लगभग 30 से 35 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है और मजदूरी का खर्च भी काफी कम हो जाता है। यही कारण है कि अब किसान इस तकनीक को तेजी से अपना रहे हैं।
सरकार किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रति एकड़ 4500 रुपये की सहायता राशि भी दे रही है। इसके अलावा डीएसआर मशीनों पर 50 प्रतिशत यानी 40 हजार रुपये तक का अनुदान दिया जाएगा। इस योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को“मेरी फसल मेरा ब्यौरा” पोर्टल पर पंजीकरण करवाना होगा।
धान की सीधी बिजाई में सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें रोपाई की जरूरत नहीं पड़ती। इससे मजदूरों की कमी की समस्या काफी हद तक दूर हो जाती है। पानी कम लगता है, समय बचता है और अगली फसल की तैयारी जल्दी हो जाती है। लेकिन डीएसआर में खरपतवार नियंत्रण और समय पर सिंचाई का विशेष ध्यान रखना जरूरी है।
कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जिन किसानों ने पिछले तीन वर्षों में किसी मशीन पर सब्सिडी नहीं ली है और जो फसल अवशेष नहीं जलाते हैं, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर मशीनों पर अनुदान दिया जाएगा।
इससे पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। धान की खेती में सफल होने के लिए समय पर नर्सरी, सही बीजोपचार, संतुलित पोषण और खरपतवार नियंत्रण सबसे जरूरी कदम हैं। किसान यदि वैज्ञानिक सलाह के अनुसार खेती करें तो कम लागत में बेहतर उत्पादन लेकर अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
निष्कर्ष: धान की खेती से कम लागत में अधिक और बेहतर उत्पादन प्राप्त करने के लिए किसानों को पूरी तरह से वैज्ञानिक और आधुनिक तौर-तरीकों को अपनाना होगा। सही समय पर नर्सरी तैयार करने से लेकर नमक के घोल व रसायनों द्वारा बीजोपचार, उचित खरपतवार नियंत्रण और संतुलित पोषण प्रबंधन ही फसल की मजबूती और उच्च पैदावार की असली गारंटी हैं।
इसके साथ ही, गिरते भूजल स्तर और बढ़ती मजदूरी की समस्या के बीच ‘धान की सीधी बिजाई’ (DSR) तकनीक एक क्रांतिकारी और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में उभरी है। सरकार द्वारा “मेरी फसल मेरा ब्यौरा” पोर्टल के माध्यम से दी जाने वाली वित्तीय सहायता और कृषि मशीनों पर मिलने वाला भारी अनुदान किसानों के लिए इस तकनीक को अपनाना और भी सुगम बनाता है।
यदि किसान पारंपरिक ढर्रे को छोड़कर कृषि वैज्ञानिकों की सलाह और सरकारी योजनाओं का सही तालमेल बिठाएं, तो वे न केवल पानी और पैसों की भारी बचत कर सकते हैं बल्कि अपनी कृषि आय को भी सुरक्षित और समृद्ध बना सकते हैं।
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