यूरिया-डीएपी की कीमतों पर बड़ा सवाल: सरकारी रेट ₹272 और ₹1350, फिर किसानों से ज्यादा वसूली क्यों?

किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता आज खेती की बढ़ती लागत है। एक तरफ सरकारें किसानों की आय बढ़ाने की बात करती हैं, दूसरी तरफ खाद, बीज, कीटनाशक, डीजल और मजदूरी की बढ़ती कीमतें किसानों की कमर तोड़ रही हैं। खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही एक बार फिर खाद की उपलब्धता और कीमतों को लेकर किसानों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

किसान नेताओं, जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों से निवेदन है कि कभी खाद वितरण व्यवस्था का भी जमीनी स्तर पर निरीक्षण करें। कागजों में भले ही यूरिया का निर्धारित मूल्य लगभग 272 रुपये प्रति बैग और डीएपी का मूल्य 1350 रुपये प्रति बैग बताया जाता हो, लेकिन कई क्षेत्रों से किसानों द्वारा शिकायत की जा रही है कि उन्हें यूरिया 350 से 400 रुपये तक और डीएपी 1800 से 2000 रुपये तक खरीदना पड़ रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब खाद वितरण को ई-टोकन और ऑनलाइन व्यवस्था से नियंत्रित किया जा रहा है, तब निजी दुकानों पर खाद का अतिरिक्त स्टॉक आखिर पहुंच कैसे रहा है? यदि किसानों को निर्धारित मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध है तो फिर खुले बाजार में ऊंचे दामों पर बिक्री की शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं?

किसानों का कहना है कि उन्हें समय पर खाद चाहिए, लेकिन कई जगह ई-टोकन, सदस्यता, स्टॉक और वितरण संबंधी प्रक्रियाओं के कारण उन्हें बार-बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। दूसरी ओर कुछ स्थानों पर निजी स्तर पर अधिक कीमत वसूलने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। यदि यह स्थिति सही है तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

खेती पहले ही घाटे का सौदा बनती जा रही है। महंगे बीज, बढ़ती मजदूरी, डीजल की कीमतें, सिंचाई खर्च और मौसम की अनिश्चितता के बीच किसान किसी तरह फसल तैयार करता है। ऐसे में यदि उसे खाद भी निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत पर खरीदनी पड़े तो उसकी लागत और बढ़ जाती है। इसका सीधा असर उसकी आय पर पड़ता है।

किसानों की मांग केवल इतनी है कि उन्हें समय पर, पर्याप्त मात्रा में और निर्धारित सरकारी दरों पर खाद उपलब्ध कराई जाए। साथ ही खाद वितरण प्रणाली में पूरी पारदर्शिता हो ताकि किसी भी स्तर पर कालाबाजारी, कृत्रिम कमी या अनियमितता की संभावना समाप्त हो सके। कृषि देश की रीढ़ है और किसान अन्नदाता है।

यदि खेती की लागत लगातार बढ़ती रही और आवश्यक कृषि आदान महंगे होते गए, तो इसका असर केवल किसानों पर ही नहीं बल्कि पूरे कृषि तंत्र और खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ेगा। आवश्यक है कि जिम्मेदार विभाग, जनप्रतिनिधि और किसान संगठन मिलकर इस विषय पर गंभीरता से काम करें, जमीनी हकीकत का आकलन करें और किसानों को राहत देने के लिए प्रभावी कदम उठाएं।

निष्कर्ष: सरकार द्वारा यूरिया और डीएपी की कीमतें निर्धारित करने और ई-टोकन जैसी ऑनलाइन व्यवस्थाएं लागू करने के बावजूद, जमीनी स्तर पर कालाबाजारी, कृत्रिम कमी और ऊंचे दामों पर बिक्री के कारण किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। देश की खाद्य सुरक्षा और कृषि तंत्र को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि कागजी दावों से इतर जमीनी हकीकत का निष्पक्ष निरीक्षण किया जाए।

जिम्मेदार विभागों, जनप्रतिनिधियों और किसान संगठनों को मिलकर वितरण प्रणाली में पारदर्शिता लानी होगी ताकि अन्नदाता को समय पर, पर्याप्त और सही सरकारी मूल्य पर कृषि आदान (खाद-बीज) मिल सकें और खेती को घाटे से बचाकर किसानों की आय को सुरक्षित किया जा सके।

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