आधुनिक कृषि विज्ञान में जहाँ एक ओर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से मृदा की जीवन-शक्ति दिन-प्रतिदिन क्षीण हो रही है, वहीं ट्राइकोडर्मा एक प्रकाश-स्तम्भ की भाँति उभरकर सामने आया है। यह एक लाभकारी मृदा-जनित फफूंद है, जो हाइपोक्रेसी परिवार से संबंधित है।
वर्ष 2025 में प्रकाशित नवीनतम वैश्विक शोध (PMC, Wageningen University) के अनुसार, बाज़ार में उपलब्ध लगभग 60% जैव-फफूंदनाशक ट्राइकोडर्मा प्रजातियों पर ही आधारित हैं- यह तथ्य इसकी अपार कृषि उपयोगिता को रेखांकित करता है। T. Harzianum, T. Viride, T. Asperellum और T. Parareesei इसकी सर्वाधिक प्रभावशाली प्रजातियाँ हैं जो बागवानी फसलों में रोगमुक्त खेती की नींव रखती हैं।
ट्राइकोडर्मा कार्य कैसे करता है?- विज्ञान की सरल भाषा में
ट्राइकोडर्मा की कार्य-प्रणाली बहुआयामी है। नवीनतम वैज्ञानिक शोध इसके पाँच प्रमुख क्रिया-तंत्रों की पुष्टि करते हैं:
मायकोपैरासिटिज्म (परजीविता): ट्राइकोडर्मा सीधे हानिकारक फफूंद (Fusarium, Pythium, Rhizoctonia, Phytophthora, Sclerotinia, Botrytis) के हायफी से लिपट जाता है और उसे नष्ट कर देता है।
एंटीबायोसिस: यह सैकड़ों जैव-सक्रिय द्वितीयक उपापचयी पदार्थ (जैसे Harzianolide, Trichokonin) स्रावित करता है जो रोगजनकों की वृद्धि रोकते हैं।
वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs): 2-Heptanone और 6-PP जैसे यौगिक पौधों की जड़-वृद्धि को प्रोत्साहित करते हैं और रोगजनकों के विरुद्ध एक अदृश्य रक्षा-कवच बनाते हैं (2024 शोध, NCBI)।
प्रेरित प्रणालीगत प्रतिरोध (ISR): ट्राइकोडर्मा पौधों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को जड़ स्तर से सक्रिय करता है। इससे पौधे स्वयं भी रोगजनकों से लड़ने योग्य बनते हैं।
पोषक तत्व घुलनशीलता: T. Harzianum SQR-T037 जैसी प्रजाति मिट्टी में फॉस्फोरस, लौह, मैंगनीज, तांबा और जिंक को घुलनशील बनाकर पौधों को उपलब्ध कराती है, जिससे उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार होता है।
ट्राइकोडर्मा प्रयोग की वैज्ञानिक विधियाँ
बीज शोधन (Seed Treatment): ट्राइकोडर्मा पाउडर या जी-डर्मा प्लस को 5 से 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से मिलाकर बीजों को उपचारित करें। यह न केवल बीज की अंकुरण क्षमता बढ़ाता है, बल्कि प्रारंभिक अवस्था से ही फफूंदजनित रोगों से सुरक्षा प्रदान करता है।
पौधशाला मिट्टी उपचार (Nursery Soil Treatment): नीम की खली, या 150 किलोग्राम 12 माह पुरानी सड़ी हुई गोबर खाद या वार्मी कंपोस्ट खाद में एक लीटर जी-डर्मा प्लस या एक किलोग ट्राइकोडर्मा को किसी छायादार स्थान पर मिलाकर संध्या के समय प्रति एकड़ खेत में मिलाएँ। यह नवांकुरित पौधों को आर्द्रगलन (Damping-off) जैसे घातक रोगों से बचाता है।
जड़ डुबकी विधि (Root Dip Method): रोपाई से पूर्व पौधे की जड़ों को 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा, 100 ग्राम ताजी गोबर को प्रति लीटर पानी में 20 से 30 मिनट डुबोएँ। इससे पौधे रोपण के बाद तेज़ी से जड़ पकड़ते हैं और रोगरोधी बनते हैं।
खेत में प्रत्यक्ष प्रयोग (Field Application); खेत की तैयारी के समय सनई/ढैंचा हरी खाद पलटने के बाद ट्राइकोडर्मा को एक किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से मिट्टी में मिलाएँ। यह मिट्टी की जैविक क्रियाओं को सक्रिय कर दीर्घकालीन सुरक्षा देता है।
खड़ी फसल में ड्रेंचिंग (Standing Crop Drenching): फसल के दौरान 10 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल से पौधों के जड़-क्षेत्र में डालें। जड़-सड़न, उकठा, तना-सड़न और कॉलर-रॉट जैसी समस्याओं में तत्काल नियंत्रण मिलता है।
- ट्राइकोडर्मा के उपयोग से मिलने वाले बहुआयामी लाभ
- मृदा एवं बीज जनित रोगों का जैविक, टिकाऊ व सस्ता समाधान
- फल-सड़न, कालर रॉट, उकठा, आर्द्रगलन और तना-सड़न पर प्रभावी नियंत्रण
- बेहतर अंकुरण एवं पौध-वृद्धि में वृद्धि
- सूखे एवं लवणीयता जैसे अजैविक तनाव सहन करने की क्षमता में वृद्धि (T. Asperellum 2024 शोध)
- मिट्टी की जैविक उर्वरता एवं सूक्ष्मजीव विविधता में सुधार
- पर्यावरण-अनुकूल, रसायन-रहित एवं मानव-स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित
- दीर्घकालीन प्रभाव- एक बार प्रयोग से मिट्टी में वर्षों तक सक्रिय रहता है
- टमाटर जैसी फसलों में फलों की पोषण गुणवत्ता और एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि में सुधार
क्या न करें- महत्वपूर्ण सावधानियाँ
- ट्राइकोडर्मा और रासायनिक फफूंदनाशक एक साथ कभी न मिलाएँ- इससे ट्राइकोडर्मा पूर्णतः निष्क्रिय हो जाता है।
- सूखी मिट्टी में प्रयोग न करें- नमी इसके जीवन-चक्र के लिए अनिवार्य है।
- शोधित बीजों को तेज़ धूप में न रखें।
- ट्राइकोडर्मा मिश्रित खाद को तैयार करके लंबे समय तक न रखें।
- मेटालेक्सिल और थीरम से उपचारित बीजों के साथ ट्राइकोडर्मा का प्रयोग किया जा सकता है।
ट्राइकोडर्मा का भविष्य: नवीन तकनीक और अनुसंधान
2025 में Wageningen University के शोध के अनुसार, ट्राइकोडर्मा आधारित बायोफॉर्मुलेशन तकनीकों में तेज़ी से विकास हो रहा है- विशेष रूप से नैनो-बायोफॉर्मुलेशन और माइक्रोबियल कंसोर्टियम (Rhizobium + Azospirillum + Trichoderma) के संयुक्त प्रयोग से फसलों में रोग नियंत्रण के साथ-साथ उत्पादन में 25 से 40% तक वृद्धि दर्ज की गई है।
भारत में लगभग 110 विश्वविद्यालय और शोध संस्थान ट्राइकोडर्मा की 15 से अधिक प्रजातियों पर सक्रिय अनुसंधान कर रहे हैं।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा में प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह के नेतृत्व में ट्राइकोडर्मा के नए देशी स्ट्रेन विकसित किए जा रहे हैं, जो बिहार और पूर्वी भारत की मिट्टी एवं जलवायु के लिए विशेष रूप से अनुकूलित हों। किसानों को प्रशिक्षण एवं प्रत्यक्ष प्रदर्शन के माध्यम से यह तकनीक जमीनी स्तर तक पहुँचाई जा रही है।
अंत में: जैविक क्रांति की ओर एक सशक्त कदम
रासायनिक फफूंदनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग न केवल मिट्टी की जैविक सेहत को नष्ट करता है, बल्कि उपभोक्ता स्वास्थ्य और निर्यात गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ऐसे में ट्राइकोडर्मा एक समग्र, वैज्ञानिक और किसान-हितैषी समाधान प्रस्तुत करता है।
यदि इसे वैज्ञानिक विधि, उचित मात्रा और सही समय पर अपनाया जाए, तो यह बागवानी फसलों को स्वस्थ, रोगमुक्त और उच्च-गुणवत्ता युक्त बनाकर किसानों की आय में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है।
निष्कर्ष (Conclusion): संक्षेप में कहा जाए तो, ट्राइकोडर्मा आधुनिक कृषि के सामने खड़ी मृदा-गिरावट और रोग-प्रबंधन की चुनौतियों का एक अचूक, वैज्ञानिक और प्राकृतिक समाधान है। जहाँ रासायनिक फफूंदनाशक मिट्टी और मानव स्वास्थ्य को दीर्घकालिक नुकसान पहुँचा रहे हैं, वहीं ट्राइकोडर्मा अपने बहुआयामी क्रिया-तंत्र (जैसे मायकोपैरासिटिज्म और प्रेरित रोग-प्रतिरोधक क्षमता) से फसलों को एक अभेद्य सुरक्षा-कवच प्रदान करता है।
नवीनतम शोधों से सिद्ध हो चुका है कि यदि किसान भाई इसे सही नमी, उचित मात्रा और वैज्ञानिक विधियों (जैसे बीज, मिट्टी या जड़ उपचार) के अनुसार अपनाएं, तो यह न केवल फसलों को घातक रोगों से बचाएगा बल्कि पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाकर उत्पादन में 25 से 40% तक की क्रांतिकारी वृद्धि भी ला सकता है। “चलो गाँव की ओर” के संकल्प के साथ सतत और समृद्ध जैविक खेती के निर्माण में ट्राइकोडर्मा को अपनाना आज समय की सबसे बड़ी मांग है।
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प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह- विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर ( बिहार )
