कई किसान भाई शिकायत करते हैं कि उनके बाग में 35 से 40 साल पुराने आम के पेड़ धीरे-धीरे सूख रहे हैं। पहले कुछ टहनियां सूखती हैं, फिर पूरा पेड़ कमजोर होने लगता है और आखिरकार उत्पादन भी कम हो जाता है। यदि समय रहते सही कारण पहचान लिया जाए तो कई पेड़ों को बचाया जा सकता है।
पुराने आम के पेड़ों में सबसे बड़ी समस्या फफूंद जनित रोगों की होती है। डाइबैक (Dieback) और स्टेम रॉट (Stem Rot) जैसे रोगों में टहनियां ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगती हैं। तने की छाल फट सकती है और अंदर का भाग काला या भूरा दिखाई दे सकता है। खराब जल निकास, अधिक नमी और कटे हुए हिस्सों में संक्रमण इसके प्रमुख कारण हैं।
दूसरा बड़ा कारण दीमक और तना छेदक कीट हैं। यदि पेड़ के तने में छोटे-छोटे छेद दिखाई दें और उनमें से बुरादा निकल रहा हो तो यह तना छेदक कीट का संकेत हो सकता है। ऐसे कीट पेड़ के अंदर से उसे खोखला कर देते हैं, जिससे धीरे-धीरे पूरा पेड़ कमजोर होकर सूखने लगता है।
जड़ सड़न भी पुराने आम के पेड़ों की एक गंभीर समस्या है। जिन बागों में बारिश या सिंचाई का पानी लंबे समय तक जमा रहता है, वहां जड़ों में फफूंद लगने का खतरा बढ़ जाता है। शुरुआत में पत्तियां पीली पड़ती हैं, फिर पेड़ मुरझाने लगता है और अंत में सूख सकता है। पोषक तत्वों की कमी भी आम के पुराने पेड़ों को प्रभावित करती है।
वर्षों तक लगातार उत्पादन लेने के बाद यदि पेड़ों को पर्याप्त गोबर खाद, जैविक खाद, वार्मी कंपोस्ट और सूक्ष्म पोषक तत्व नहीं मिलते तो उनकी शक्ति कम होने लगती है। विशेष रूप से जिंक, बोरॉन और नाइट्रोजन की कमी पेड़ों को कमजोर बना सकती है।पुराने बागों में नियमित देखभाल बहुत जरूरी है।
सूखी और रोगग्रस्त टहनियों को काटकर नष्ट करें। कटे हुए भागों पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का पेस्ट लगाएं ताकि संक्रमण न फैले। पेड़ों के चारों ओर अच्छी तरह गुड़ाई करें और जल निकास की व्यवस्था बनाए रखें। साल में कम से कम एक या दो बार अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर खाद और नीम खली का उपयोग करें। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और जड़ों का विकास बेहतर होता है।
यदि दीमक या तना छेदक कीट दिखाई दें तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार उचित कीटनाशी का प्रयोग करें। याद रखें, 40 साल पुराना आम का पेड़ केवल एक पेड़ नहीं बल्कि वर्षों की मेहनत और आय का स्रोत होता है। समय पर रोग और कीट नियंत्रण, संतुलित पोषण तथा उचित देखभाल से ऐसे पेड़ों को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है।
निष्कर्ष: 35 से 40 साल पुराने आम के पेड़ बागवानों की वर्षों की मेहनत और आय का मुख्य जरिया होते हैं, जिन्हें डाइबैक, तना छेदक कीट, जड़ सड़न और पोषक तत्वों की कमी जैसी समस्याओं से समय रहते बचाया जा सकता है।
इस लेख से स्पष्ट है कि यदि किसान भाई नियमित रूप से रोगग्रस्त टहनियों की छंटाई करें, कटे हिस्सों पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का लेप लगाएं, जल निकास की उचित व्यवस्था रखें और संतुलित जैविक पोषण (जैसे गोबर की खाद और नीम खली) दें, तो इन बुजुर्ग पेड़ों को न केवल सूखने से बचाया जा सकता है बल्कि उनकी उत्पादकता को भी लंबे समय तक बरकरार रखा जा सकता है।
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