प्रयोगशाला में ट्राइकोडर्मा का उत्पादन कैसे होता है? जानिए शुद्ध कल्चर से लेकर पैकेट तैयार होने की पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया

आज के समय में टिकाऊ और सुरक्षित खेती की दिशा में जैविक तकनीकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। किसान अब ऐसे विकल्पों की तलाश में हैं जो फसलों को रोगों से सुरक्षित रखें, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाएं और रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम करें। ऐसे ही सबसे प्रभावी जैविक उत्पादों में से एक है ट्राइकोडर्मा (Trichoderma)।

यह एक लाभकारी फफूंद (Beneficial Fungus) है, जिसे जैविक कवकनाशी (Biofungicide) भी कहा जाता है। ट्राइकोडर्मा मिट्टी में मौजूद कई हानिकारक रोगजनक फफूंदों जैसे जड़ गलन (Root Rot), डैम्पिंग ऑफ (Damping Off), कॉलर रॉट (Collar Rot), विल्ट (Wilt) तथा अन्य मृदा जनित रोगों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इतना ही नहीं, यह पौधों की जड़ों का विकास बढ़ाता है, पोषक तत्वों के अवशोषण को बेहतर बनाता है और फसल की बढ़वार तथा उत्पादन में भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। अक्सर किसान बाजार से ट्राइकोडर्मा खरीदकर उपयोग तो करते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को यह जानकारी होती है कि इसका वैज्ञानिक तरीके से उत्पादन कैसे किया जाता है।

किसी भी जैविक उत्पाद की गुणवत्ता उसकी उत्पादन प्रक्रिया पर निर्भर करती है। यदि उत्पादन के दौरान स्वच्छता, तापमान और वैज्ञानिक मानकों का पालन नहीं किया जाए तो ट्राइकोडर्मा की गुणवत्ता घट सकती है और खेत में उसका प्रभाव भी कम हो सकता है। इसलिए आज हम विस्तार से जानेंगे कि वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में ट्राइकोडर्मा का बड़े पैमाने पर उत्पादन किस प्रकार किया जाता है और इसके प्रत्येक चरण का क्या महत्व है।

ग्रोथ मीडियम (मकई के दाने) की तैयारी और स्टेरिलाइजेशन (Sterilization)

ट्राइकोडर्मा उत्पादन की प्रक्रिया का पहला चरण उपयुक्त माध्यम (Growth Medium) तैयार करना होता है। इसके लिए सामान्यतः मकई (Maize) के दानों का उपयोग किया जाता है क्योंकि यह ट्राइकोडर्मा की वृद्धि के लिए उत्कृष्ट पोषण प्रदान करता है। सबसे पहले साफ और स्वस्थ मकई के दानों को लगभग 24 घंटे तक स्वच्छ पानी में भिगोया जाता है।

इस दौरान दाने पर्याप्त मात्रा में पानी सोख लेते हैं जिससे बाद में फफूंद की वृद्धि समान रूप से हो सके। 24 घंटे बाद अतिरिक्त पानी पूरी तरह निकाल दिया जाता है ताकि दानों में केवल आवश्यक नमी ही बनी रहे। इसके बाद इन भीगे हुए मकई के दानों को विशेष ऑटोक्लेव बैग (Autoclavable Bags) में भरा जाता है।

बैग का मुंह कॉटन प्लग से बंद किया जाता है ताकि हवा का सीमित आदान-प्रदान होता रहे लेकिन बाहरी सूक्ष्मजीव अंदर प्रवेश न कर सकें। इसके ऊपर रबर बैंड लगाया जाता है और अंत में एल्यूमिनियम फॉयल से ढक दिया जाता है। यह पूरी व्यवस्था स्टेरिलाइजेशन के दौरान बैग को सुरक्षित रखने और संक्रमण से बचाने के लिए की जाती है।

इनोक्यूलेशन (Inoculation) और इनक्यूबेशन की वैज्ञानिक विधि

अब इन बैगों को ऑटोक्लेव मशीन में रखा जाता है। ऑटोक्लेव एक विशेष उपकरण है जो उच्च तापमान (लगभग 121°C) और उच्च दबाव पर कार्य करता है। सामान्यतः 15 PSI दबाव पर लगभग 20 से 30 मिनट तक स्टेरिलाइजेशन किया जाता है। इस प्रक्रिया में मकई के दानों पर मौजूद सभी प्रकार के बैक्टीरिया, फफूंद और अन्य अवांछित सूक्ष्मजीव पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।

यदि यह प्रक्रिया सही ढंग से न की जाए तो बाद में ट्राइकोडर्मा की जगह अन्य हानिकारक फफूंद विकसित हो सकती हैं।स्टेरिलाइजेशन के बाद बैगों को ठंडा होने दिया जाता है। इसके बाद इन्हें लेमिनार एयर फ्लो (Laminar Air Flow Cabinet) में ले जाया जाता है। यह एक विशेष स्वच्छ कार्यस्थल होता है जहां HEPA फिल्टर द्वारा शुद्ध हवा प्रवाहित होती रहती है, जिससे वातावरण पूरी तरह संक्रमण मुक्त रहता है।

यहां सबसे पहले कार्य करने वाला व्यक्ति अपने हाथों को अल्कोहल से अच्छी तरह साफ करता है, कार्यस्थल को भी अल्कोहल से सैनिटाइज किया जाता है तथा सभी उपकरणों को बर्नर की लौ पर स्टेरिलाइज किया जाता है। अब ट्राइकोडर्मा के पहले से तैयार शुद्ध (Pure Culture) कल्चर को एक स्टेरिलाइज नीडल की सहायता से सावधानीपूर्वक उठाया जाता है।

ध्यान रखा जाता है कि नीडल को आग से निकालने के तुरंत बाद उपयोग न किया जाए क्योंकि अत्यधिक गर्म नीडल ट्राइकोडर्मा के जीवित बीजाणुओं को नष्ट कर सकती है। इसलिए कुछ सेकंड ठंडा करने के बाद ही शुद्ध कल्चर को उठाया जाता है। इसके बाद इस ट्राइकोडर्मा कल्चर को स्टेरिलाइज किए गए मकई के दानों वाले बैग में डाल दिया जाता है।

यदि बैग बड़ा है या मकई की मात्रा अधिक है तो आवश्यकतानुसार अधिक मात्रा में ट्राइकोडर्मा कल्चर मिलाया जाता है ताकि सभी दानों पर समान रूप से वृद्धि हो सके। कल्चर डालने के बाद बैग को पुनः कॉटन प्लग और रबर बैंड की सहायता से अच्छी तरह बंद कर दिया जाता है। अब यह बैग बीओडी (BOD) इनक्यूबेटर में रखे जाते हैं।

इनक्यूबेटर में सामान्यतः लगभग 25 से 28 डिग्री सेल्सियस तापमान बनाए रखा जाता है, जो ट्राइकोडर्मा की वृद्धि के लिए उपयुक्त माना जाता है। लगभग 12 से 15 दिनों के भीतर ट्राइकोडर्मा पूरे मकई के दानों पर फैल जाता है और प्रत्येक दाना हरे रंग की फफूंद से पूरी तरह ढक जाता है। यही हरा रंग इस बात का संकेत होता है कि ट्राइकोडर्मा सफलतापूर्वक विकसित हो चुका है।

ग्राइंडिंग, टैल्कम मिश्रण और गुणवत्ता परीक्षण (Quality Testing)

जब सभी दानों पर समान रूप से ट्राइकोडर्मा विकसित हो जाता है, तब उन्हें बाहर निकालकर विशेष ग्राइंडर या ग्राइंडिंग मशीन की सहायता से बारीक पीस लिया जाता है। पिसने के बाद एक महीन हरे रंग का पाउडर प्राप्त होता है। इस पाउडर में करोड़ों की संख्या में ट्राइकोडर्मा के जीवित बीजाणु (Spores) मौजूद होते हैं, जो आगे चलकर खेत में रोगजनकों का नियंत्रण करते हैं।

अब इस पाउडर को उपयोग योग्य बनाने के लिए इसमें टैल्कम पाउडर (Talc Powder) मिलाया जाता है। सामान्यतः इसका अनुपात 1:10 रखा जाता है। अर्थात यदि 1 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा युक्त मकई पाउडर तैयार हुआ है, तो उसमें लगभग 10 किलोग्राम टैल्कम पाउडर अच्छी तरह मिलाया जाता है। टैल्कम पाउडर कैरियर (Carrier Material) का कार्य करता है जिससे उत्पाद को संभालना, पैक करना और खेत में उपयोग करना आसान हो जाता है।

मिश्रण तैयार होने के बाद गुणवत्ता परीक्षण (Quality Testing) किया जाता है। इसमें यह जांचा जाता है कि उत्पाद में ट्राइकोडर्मा के जीवित बीजाणुओं की संख्या मानक के अनुसार है या नहीं, किसी अन्य सूक्ष्मजीव का संक्रमण तो नहीं है तथा नमी की मात्रा सुरक्षित सीमा में है। गुणवत्ता परीक्षण सफल होने के बाद ही इसे पैकिंग के लिए भेजा जाता है।

अंतिम चरण में इस तैयार ट्राइकोडर्मा पाउडर की निर्धारित मात्रा के पैकेट बनाए जाते हैं। पैकेट पर निर्माण तिथि, समाप्ति तिथि, बैच नंबर, उपयोग की विधि तथा सावधानियां स्पष्ट रूप से लिखी जाती हैं। इसके बाद यह उत्पाद किसानों तक बिक्री के लिए उपलब्ध कराया जाता है। ट्राइकोडर्मा का उपयोग कई तरीकों से किया जा सकता है।

इसे बीज उपचार, पौधों की जड़ों के उपचार (Root Dip), गोबर की खाद या कम्पोस्ट में मिलाकर तथा सीधे मिट्टी में प्रयोग किया जा सकता है। बीज उपचार करने से शुरुआती अवस्था में ही पौधों को जड़ गलन और डैम्पिंग ऑफ जैसे रोगों से सुरक्षा मिलती है। वहीं मिट्टी में प्रयोग करने से यह जड़ों के आसपास लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाता है और रोगजनक फफूंदों की वृद्धि को रोकता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि ट्राइकोडर्मा केवल रोग नियंत्रण ही नहीं करता बल्कि पौधों की जड़ों के विकास को भी बढ़ावा देता है।

मजबूत जड़ें अधिक पानी और पोषक तत्वों का अवशोषण करती हैं, जिससे पौधे तेजी से बढ़ते हैं और उत्पादन में वृद्धि होती है। इसके अलावा यह कई प्रकार के एंजाइम और प्राकृतिक जैव सक्रिय पदार्थ (Bioactive Compounds) बनाता है जो पौधों की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता (Disease Resistance) को भी बढ़ाते हैं। ध्यान रखें कि ट्राइकोडर्मा एक जीवित जैविक उत्पाद है। इसलिए इसे हमेशा ठंडी और सूखी जगह पर संग्रहित करें।

इसे सीधे धूप में न रखें और पैकेट खोलने के बाद जल्द से जल्द उपयोग करें। समाप्ति तिथि के बाद उपयोग करने से इसकी प्रभावशीलता कम हो सकती है। यदि किसान स्वयं ट्राइकोडर्मा तैयार करना चाहते हैं, तो उन्हें यह समझना चाहिए कि प्रयोगशाला स्तर पर इसकी तैयारी के लिए ऑटोक्लेव, लेमिनार एयर फ्लो, बीओडी इनक्यूबेटर, शुद्ध कल्चर और पूर्ण स्वच्छता जैसी वैज्ञानिक सुविधाओं की आवश्यकता होती है।

इसलिए सामान्य परिस्थितियों में प्रमाणित संस्थानों या विश्वसनीय कंपनियों द्वारा तैयार गुणवत्तापूर्ण ट्राइकोडर्मा का उपयोग करना अधिक सुरक्षित और प्रभावी माना जाता है। आज जैविक खेती, प्राकृतिक खेती और समेकित रोग प्रबंधन (Integrated Disease Management) में ट्राइकोडर्मा की भूमिका लगातार बढ़ रही है। यदि किसान वैज्ञानिक सलाह के अनुसार इसका सही उपयोग करें, तो रासायनिक कवकनाशकों पर निर्भरता कम की जा सकती है, मिट्टी का स्वास्थ्य सुधारा जा सकता है और कम लागत में स्वस्थ एवं अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

निष्कर्ष: ट्राइकोडर्मा जैसी जैविक तकनीकें आधुनिक कृषि के लिए सुरक्षा कवच की तरह हैं। हालांकि, इसका पूरा लाभ तभी मिलता है जब इसके उत्पादन के दौरान 121°C तापमान, पूर्ण स्वच्छता और सटीक वैज्ञानिक मानकों का पालन किया गया हो। बिना मानकों के तैयार उत्पाद खेत में बेअसर साबित हो सकते हैं।

किसानों के लिए समझदारी इसी में है कि वे हमेशा प्रमाणित प्रयोगशालाओं या विश्वसनीय ब्रांड्स द्वारा तैयार ट्राइकोडर्मा का ही चयन करें। सही उत्पाद और वैज्ञानिक उपयोग का यह तालमेल मिट्टी के स्वास्थ्य को बहाल करने और कृषि लागत को कम करने का सबसे प्रभावी मार्ग है।

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