धान की रोपाई में हो रही है देरी? जानिए 3 से 7 दिन की देरी के लिए सबसे असरदार खरपतवार नाशक का वैज्ञानिक फॉर्मूला!

धान की खेती में खरपतवार नियंत्रण (Weed Management) सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक है। यदि रोपाई के शुरुआती दिनों में खरपतवारों पर नियंत्रण नहीं किया जाए, तो वे धान के पौधों के साथ पानी, पोषक तत्व, धूप और जगह के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसका सीधा असर पौधों की बढ़वार, कल्ले बनने की क्षमता और अंततः उत्पादन पर पड़ता है।

कई बार किसान खेत तैयार कर लेते हैं, लेकिन मजदूर (लेबर) समय पर नहीं मिलते और रोपाई 2 से 3 दिन या उससे भी अधिक देर से होती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या खेत तैयार होने के तीसरे दिन खरपतवार नाशक दवा डाल दें या रोपाई होने का इंतजार करें? इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आप कौन-सी खरपतवार नाशक दवा का उपयोग कर रहे हैं। सभी दवाओं का कार्य करने का तरीका एक जैसा नहीं होता।

कुछ दवाएं ऐसी होती हैं जो खरपतवारों को उगने से पहले ही समाप्त कर देती हैं। इन्हें प्री-इमर्जेंस (Pre-Emergence Herbicides) कहा जाता है। वहीं कुछ दवाएं खरपतवार निकल आने के बाद उन्हें नष्ट करती हैं, जिन्हें पोस्ट-इमर्जेंस (Post-Emergence Herbicides) कहा जाता है। इसके अलावा अब बाजार में ऐसी मिश्रित (Combination) दवाएं भी उपलब्ध हैं जिनमें प्री और अर्ली पोस्ट इमर्जेंस दोनों प्रकार के सक्रिय तत्व मौजूद होते हैं। यही कारण है कि इनका उपयोग थोड़ा देर से भी किया जा सकता है।

प्रीटिलाक्लोर 37% EW बनाम 50% EC: जानिए कौन-सा फॉर्मूलेशन है सबसे बेस्ट?

यदि आप केवल प्रीटिलाक्लोर (Pretilachlor) जैसी शुद्ध प्री-इमर्जेंस दवा का उपयोग कर रहे हैं, तो इसे खेत तैयार होने के तीन दिन के भीतर डालना सबसे अच्छा माना जाता है। यह दवा पानी के साथ मिट्टी की सतह पर एक पतली परत (Herbicide Layer) बना देती है। जब खरपतवार के बीज अंकुरित होकर इस परत को पार करने की कोशिश करते हैं, तो वहीं नष्ट हो जाते हैं।

लेकिन यदि दवा डालने के बाद खेत में मजदूर रोपाई के लिए उतरते हैं, तो उनके चलने-फिरने से यह परत टूट जाती है और कई खरपतवार निकल सकते हैं। इसलिए यदि रोपाई अभी बाकी है और मजदूर बाद में आने वाले हैं, तो केवल प्री-इमर्जेंस दवा डालने का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। प्रीटिलाक्लोर मुख्य रूप से दो फॉर्मूलेशन में उपलब्ध है। पहला प्रीटिलाक्लोर 37% EW (Refit Plus) और दूसरा प्रीटिलाक्लोर 50% EC (Refit)। दोनों का कार्य लगभग समान है लेकिन इनके व्यवहार में अंतर है।

37% EW पानी आधारित (Water Based) फॉर्मूलेशन है। जैसे ही इसे खड़े पानी में छिड़का जाता है, यह जल्दी नीचे बैठकर मिट्टी की सतह पर समान परत बना देता है। यदि बाद में हल्की बारिश हो जाए या थोड़ा पानी निकल भी जाए तो इसका प्रभाव अपेक्षाकृत बना रहता है। दूसरी ओर 50% EC ऑयल आधारित (Oil Based) फॉर्मूलेशन है। यदि दवा डालने के तुरंत बाद तेज बारिश हो जाए या खेत का पानी बाहर निकल जाए तो इसकी प्रभावशीलता कुछ कम हो सकती है।

यही कारण है कि आज अधिकांश किसान और कृषि विशेषज्ञ 37% EW फॉर्मूलेशन को प्राथमिकता देते हैं। सामान्यतः प्रीटिलाक्लोर 37% EW की अनुशंसित मात्रा लगभग 750 मिलीलीटर प्रति एकड़ तथा प्रीटिलाक्लोर 50% EC की मात्रा लगभग 600 मिलीलीटर प्रति एकड़ मानी जाती है। दवा डालते समय खेत में लगभग 2 से 3 सेंटीमीटर पानी होना चाहिए और उसके बाद कम से कम 2 दिन तक पानी बनाए रखना चाहिए।

रोपाई में 3 से 7 दिन की देरी होने पर अपनाएं ये आधुनिक संयोजन (Combinations)

यदि रोपाई में 3 से 5 दिन की देरी हो रही है, तो ऐसे मामलों में मिश्रित खरपतवार नाशक अधिक उपयोगी साबित होते हैं। इनमें पहला प्रमुख विकल्प है बेंसल्फ्यूरोन मिथाइल + प्रीटिलाक्लोर का संयोजन। इसमें प्रीटिलाक्लोर नए उगने वाले खरपतवारों को रोकता है जबकि बेंसल्फ्यूरोन मिथाइल चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों और मोथा (Sedges) पर प्रभावी होता है।

यह संयोजन खेत तैयार होने के 5 दिन तक उपयोग किया जा सकता है और लगभग सभी प्रकार के धान के खरपतवारों पर अच्छा नियंत्रण देता है। इसकी सामान्य मात्रा लगभग 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ होती है। दूसरा उन्नत विकल्प तीन सक्रिय तत्वों वाला संयोजन है जिसमें फेनॉक्साप्रॉप-पी-एथाइल + क्लोरीम्यूरोन एथाइल + प्रीटिलाक्लोर शामिल होते हैं।

यह घोड़ा घास, संकरी पत्ती वाले खरपतवार, चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार तथा मोथा सभी पर प्रभावी होता है। यह खेत तैयार होने के 0 से 5 दिन के भीतर प्रयोग किया जा सकता है। सामान्यतः इसकी मात्रा लगभग 500 ग्राम प्रति एकड़ रहती है। इसे प्रत्यक्ष बुवाई वाली धान (DSR) में भी उपयोग किया जा सकता है। यदि किसी कारणवश खेत तैयार होने के बाद 7 दिन तक दवा नहीं डाली जा सकी, तो भी कुछ आधुनिक संयोजन अच्छे परिणाम देते हैं।

इनमें पेनॉक्ससलाम (Penoxsulam) + ब्यूटाक्लोर (Butachlor) का मिश्रण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह प्री और अर्ली पोस्ट इमर्जेंस दोनों प्रकार का प्रभाव देता है। अर्थात जो छोटे खरपतवार निकल चुके हैं उन्हें भी नियंत्रित करता है और आगे निकलने वाले खरपतवारों को भी रोकता है। इसकी अनुशंसित मात्रा लगभग 800 मिलीलीटर प्रति एकड़ होती है। लगातार पानी वाले धान के खेतों में यह दवा विशेष रूप से प्रभावी मानी जाती है।

एक अन्य लोकप्रिय और अपेक्षाकृत सस्ता विकल्प मेट्सल्फ्यूरोन मिथाइल + क्लोरीम्यूरोन मिथाइल (Almix 20 WP) है। यह मुख्य रूप से चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों तथा मोथा पर प्रभावी है। इसकी मात्रा सामान्यतः 8 ग्राम प्रति एकड़ होती है। इसका उपयोग स्प्रे के रूप में किया जाता है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर अन्य उपयुक्त खरपतवार नाशकों के साथ कृषि विशेषज्ञ की सलाह अनुसार मिलाकर भी प्रयोग किया जा सकता है।

खरपतवार नाशक का प्रभाव केवल दवा पर ही निर्भर नहीं करता बल्कि खेत की स्थिति पर भी निर्भर करता है। दवा डालते समय खेत में समान स्तर का पानी होना चाहिए। पानी बहुत अधिक गहरा नहीं होना चाहिए और न ही तुरंत बाहर निकलना चाहिए। यदि दवा डालने के तुरंत बाद पानी निकाल दिया गया तो उसका बड़ा हिस्सा खेत से बाहर चला जाएगा और नियंत्रण कमजोर हो जाएगा। वहीं यदि पानी बिल्कुल न हो तो भी दवा समान रूप से सक्रिय नहीं हो पाती।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि लगातार एक ही खरपतवार नाशक का उपयोग करने से खरपतवारों में प्रतिरोध (Herbicide Resistance) विकसित होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए कृषि वैज्ञानिक समय-समय पर अलग-अलग समूह की दवाओं का रोटेशन करने की सलाह देते हैं। इससे दवा का प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है और खरपतवारों पर बेहतर नियंत्रण मिलता है।

यदि आपकी रोपाई समय पर हो जाती है, तो प्री-इमर्जेंस खरपतवार नाशक सर्वोत्तम विकल्प हैं। लेकिन यदि मजदूरों की कमी के कारण रोपाई में 3 से 5 दिन की देरी हो रही है, तो केवल प्रीटिलाक्लोर पर निर्भर रहने के बजाय ऐसे मिश्रित खरपतवार नाशकों का चयन करना अधिक व्यावहारिक और प्रभावी रहेगा जिन्हें 5 या 7 दिन तक उपयोग किया जा सकता है। सही दवा का चयन खेत की स्थिति, खरपतवारों के प्रकार और रोपाई के समय को ध्यान में रखकर करें।

सही समय पर सही खरपतवार नाशक का प्रयोग करने से न केवल शुरुआती 30 से 40 दिनों तक खेत खरपतवार मुक्त रहता है, बल्कि धान में अधिक कल्ले बनते हैं, पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग होता है और अंततः उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। इसलिए धान की सफल खेती के लिए खरपतवार प्रबंधन को उतना ही महत्व दें जितना उर्वरक और सिंचाई को देते हैं।

निष्कर्ष: धान की खेती में खरपतवारों पर शुरुआती नियंत्रण ही बम्पर पैदावार की आधी लड़ाई जीत लेता है। लेबर की कमी के कारण यदि रोपाई में देरी भी हो रही हो, तो पैनिक होने के बजाय अपनी परिस्थितियों के अनुसार सही और आधुनिक मिश्रित खरपतवार नाशकों का वैज्ञानिक चुनाव करें।

खड़े पानी के स्तर को समान रखना और दवाओं का रोटेशन अपनाना ही इस तकनीक का पूरा लाभ दिला सकता है। सही समय पर लिया गया एक समझदारी भरा फैसला आपकी मेहनत, लागत और धान की फसल तीनों को सुरक्षित रख सकता है।

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