डिजिटल इंडिया के दावों के बीच खाद के लिए तरसते किसान: पीओएस मशीन और बायोमेट्रिक सर्वर बने बड़ी रुकावट, जानें जमीनी हकीकत और समाधान

डिजिटल इंडिया, स्मार्ट गवर्नेंस और पारदर्शी व्यवस्था के बड़े-बड़े दावे आज उस समय सवालों के घेरे में खड़े दिखाई देते हैं, जब एक किसान अपनी मेहनत की खेती बचाने के लिए खाद लेने सहकारी समिति पहुंचता है, लेकिन केवल इसलिए खाली हाथ लौट जाता है क्योंकि पीओएस मशीन उसका अंगूठा स्वीकार नहीं कर रही।

यह केवल तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि किसानों के साथ हो रहा प्रशासनिक अन्याय है। जिस तकनीक को किसानों की सुविधा के लिए लागू किया गया था, वही आज उनकी सबसे बड़ी परेशानी बनती जा रही है। धान रोपाई और खरीफ सीजन अपने सबसे महत्वपूर्ण दौर में है। खेतों में फसल खड़ी है, समय पर खाद डालना जरूरी है।

लेकिन दूसरी ओर किसान घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद भी बिना डीएपी या यूरिया के घर लौट रहे हैं। सवाल यह है कि जब सरकार दावा करती है कि जिले में खाद की कोई कमी नहीं है, तो फिर किसानों को खाद क्यों नहीं मिल रही? यदि गोदाम भरे पड़े हैं और किसान फिर भी खाली हाथ लौट रहे हैं, तो यह व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता नहीं तो और क्या है?

सर्वर डाउन और बायोमेट्रिक फेलियर: जमीनी हकीकत

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस समस्या का सामना एक-दो किसान नहीं बल्कि बड़ी संख्या में किसान कर रहे हैं। कई समितियों पर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं कि पीओएस मशीन अंगूठे का सत्यापन नहीं कर रही, सर्वर बार-बार डाउन हो रहा है या मशीन तकनीकी त्रुटि दिखा रही है। किसान सुबह से शाम तक इंतजार करता है, लेकिन अंत में उसे यही जवाब मिलता है कि “मशीन नहीं चल रही है, कल आइए।” आखिर एक किसान कितने दिन अपनी खेती छोड़कर केवल मशीन का इंतजार करता रहेगा?

सरकार लगातार डिजिटल व्यवस्था को पारदर्शिता का माध्यम बताती रही है। कहा गया कि पीओएस मशीन आने से फर्जीवाड़ा रुकेगा, खाद सही किसान तक पहुंचेगी और भ्रष्टाचार खत्म होगा। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। जब तकनीक ही काम न करे, तब पारदर्शिता का दावा केवल कागजों तक सीमित रह जाता है। किसान को न खाद मिलती है, न समाधान मिलता है और न ही उसकी सुनवाई होती है।

सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। यदि मशीन खराब है तो जिम्मेदार कौन है? क्या किसान इसकी कीमत चुकाएगा? क्या फसल मशीन के ठीक होने का इंतजार करेगी? क्या पौधों की बढ़वार रुक जाएगी और बाद में अधिकारी इसकी भरपाई कर देंगे? इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है।

ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर और फिंगरप्रिंट की समस्या

ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क की समस्या कोई नई बात नहीं है। कई जगह इंटरनेट कमजोर रहता है, बिजली की समस्या रहती है और सर्वर बार-बार ठप पड़ जाता है। इसके बावजूद पूरी खाद वितरण व्यवस्था केवल एक मशीन और इंटरनेट पर निर्भर कर दी गई। यह योजना बनाते समय क्या किसी ने यह सोचा कि यदि सिस्टम फेल हो गया तो किसानों को खाद कैसे मिलेगी? ऐसा लगता है कि व्यवस्था बनाने वालों ने किसानों की वास्तविक परिस्थितियों को समझने की कोशिश ही नहीं की।

किसान पर आर्थिक बोझ और समय की बर्बादी

कई किसानों के अंगूठों के निशान खेतों में लगातार मेहनत करने के कारण घिस जाते हैं। मजदूरी करने वाले, बुजुर्ग और लंबे समय से खेती करने वाले किसानों के फिंगरप्रिंट मशीन में आसानी से नहीं आते। यह समस्या वर्षों से सामने आती रही है। इसके बावजूद वैकल्पिक व्यवस्था विकसित नहीं की गई। यदि किसी किसान का अंगूठा मशीन नहीं पढ़ पा रही है तो उसे ओटीपी, फेस ऑथेंटिकेशन या किसी अन्य पहचान के आधार पर खाद क्यों नहीं दी जा सकती? आखिर पात्र किसान को तकनीकी कमी की सजा क्यों मिले?

विडंबना यह है कि कृषि विभाग एक ओर पर्याप्त खाद उपलब्ध होने का दावा करता है, दूसरी ओर किसान खाद के लिए दर-दर भटक रहा है। यदि समस्या केवल मशीन की है तो इसका समाधान तत्काल क्यों नहीं किया जा रहा? क्या तकनीकी टीमों की कमी है? क्या मशीनों का रखरखाव नहीं हो रहा? या फिर किसानों की परेशानी को गंभीरता से लिया ही नहीं जा रहा?

यह केवल समय की बर्बादी नहीं बल्कि आर्थिक नुकसान भी है। कई किसान गांव से 20 से 30 किलोमीटर दूर समिति तक पहुंचते हैं। आने-जाने का किराया, पूरा दिन खराब और फिर बिना खाद लौटना-यह नुकसान कौन भरेगा? क्या सरकार किसानों के इस अतिरिक्त खर्च की भरपाई करेगी? स्पष्ट है कि इसका उत्तर ‘नहीं’ है। नुकसान किसान का, परेशानी किसान की और इंतजार भी किसान का।

नीतिगत सुधार के इन ठोस कदमों की तुरंत आवश्यकता

यदि किसी उद्योगपति की मशीन एक दिन बंद हो जाए तो तत्काल इंजीनियर भेजे जाते हैं, लेकिन किसानों की मशीन कई दिनों तक खराब रहती है और कोई जवाबदेह दिखाई नहीं देता। इससे स्पष्ट होता है कि कृषि क्षेत्र को अभी भी उतनी प्राथमिकता नहीं मिल रही, जितनी मिलनी चाहिए।

यह भी चिंता का विषय है कि कई समितियों पर केवल एक ही पीओएस मशीन उपलब्ध है। यदि वही खराब हो जाए तो पूरा वितरण कार्य रुक जाता है। क्या करोड़ों किसानों वाले देश में इतनी महत्वपूर्ण व्यवस्था के लिए बैकअप मशीन की व्यवस्था भी नहीं की जा सकती? क्या इतनी छोटी-सी तैयारी भी नहीं की गई?

आज जरूरत केवल बयान देने की नहीं बल्कि जमीनी समाधान की है। हर समिति पर कम से कम दो पीओएस मशीनें उपलब्ध कराई जाएं। यदि बायोमेट्रिक सत्यापन न हो तो आधार ओटीपी, फेस ऑथेंटिकेशन या अधिकारी के प्रमाणन के आधार पर खाद दी जाए। सर्वर डाउन होने की स्थिति में ऑफलाइन वितरण की व्यवस्था हो और बाद में रिकॉर्ड अपडेट किया जाए। तकनीकी सहायता दल 24 घंटे सक्रिय रहें ताकि शिकायत मिलते ही मशीन ठीक की जा सके।

किसानों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना होगा। यदि पीओएस मशीन खराब होने के कारण खाद नहीं मिलती तो संबंधित अधिकारी से लिखित कारण मांगें। शिकायत हेल्पलाइन, जिला कृषि अधिकारी और सहकारिता विभाग तक पहुंचाएं। यदि समस्या लगातार बनी रहे तो सामूहिक रूप से प्रशासन के सामने अपनी बात रखें। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसान की आवाज सुनी जानी चाहिए।

यह समय आत्ममंथन का भी है। क्या डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को सुविधा देना था या उन्हें मशीनों का गुलाम बनाना? यदि तकनीक किसान के काम नहीं आ रही, तो उसमें सुधार करना सरकार की जिम्मेदारी है। तकनीक कभी भी मानव हित से ऊपर नहीं हो सकती।

निष्कर्ष: देश की खाद्य सुरक्षा किसान के भरोसे टिकी है। यदि वही किसान खाद के लिए परेशान होगा तो इसका असर केवल उसकी फसल पर नहीं बल्कि पूरे कृषि उत्पादन पर पड़ेगा। इसलिए सरकार और संबंधित विभागों को इस समस्या को सामान्य तकनीकी खराबी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खरीफ सीजन में हर दिन महत्वपूर्ण होता है और हर दिन की देरी किसानों के उत्पादन और आय पर सीधा असर डालती है।

अब समय आ गया है कि केवल डिजिटल व्यवस्था का प्रचार करने के बजाय उसे जमीन पर प्रभावी भी बनाया जाए। यदि खाद उपलब्ध है तो हर पात्र किसान तक समय पर पहुंचे। यदि मशीन खराब है तो तुरंत वैकल्पिक व्यवस्था लागू हो। और यदि किसी अधिकारी की लापरवाही से किसान परेशान हो रहा है तो उसके खिलाफ जवाबदेही तय की जाए।

किसानों को भाषण नहीं, समय पर खाद चाहिए। उन्हें पोर्टल, सर्वर और मशीनों के बहाने नहीं, बल्कि समाधान चाहिए। जब तक सरकार तकनीकी खामियों को दूर कर किसान-केंद्रित व्यवस्था विकसित नहीं करेगी, तब तक डिजिटल क्रांति के दावे किसानों के लिए केवल कागजी नारे बनकर रह जाएंगे।

Frequently Asked Questions (FAQ)

Q. पीओएस (POS) मशीन के जरिए खाद वितरण में किसानों को सबसे बड़ी समस्या क्या आ रही है?

Ans. सबसे बड़ी समस्या बायोमेट्रिक (अंगूठे के निशान) का सत्यापन न होना, ग्रामीण इलाकों में कमजोर इंटरनेट के कारण सर्वर बार-बार डाउन होना और कई समितियों पर बैकअप मशीन का न होना है।

Q. यदि किसान का अंगूठा पीओएस मशीन पर मैच न करे, तो क्या नियमतः खाद का कोई अन्य विकल्प है?

Ans. हाँ, नीतिगत सुधारों के तहत बायोमेट्रिक फेल होने पर आधार रजिस्टर्ड मोबाइल पर ओटीपी (OTP), फेस ऑथेंटिकेशन या कृषि अधिकारी/समिति प्रबंधक के भौतिक सत्यापन (Manual Authentication) का प्रावधान होना चाहिए ताकि पात्र किसान वंचित न रहे।

Q. किसानों के फिंगरप्रिंट पीओएस मशीन में अक्सर रिजेक्ट क्यों हो जाते हैं?

Ans. खेतों में लगातार मिट्ठी, पानी और कड़ा शारीरिक श्रम करने के कारण किसानों, बुजुर्गों और मजदूरों के हाथों की रेखाएं और फिंगरप्रिंट घिस जाते हैं, जिससे बायोमेट्रिक स्कैनर उन्हें आसानी से रीड नहीं कर पाता।

Q. खाद वितरण व्यवस्था में सर्वर डाउन होने पर क्या प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए?

Ans. सर्वर डाउन या इंटरनेट न होने की स्थिति में ऑफलाइन रजिस्टर में किसान के आधार व खतौनी विवरण दर्ज कर तात्कालिक वितरण की अनुमति होनी चाहिए, जिसे बाद में सर्वर ठीक होने पर ऑनलाइन अपडेट किया जा सके।

Q. पीओएस मशीन खराब होने पर किसान अपनी शिकायत कहाँ दर्ज करा सकते हैं?

Ans. किसान अपनी शिकायत संबंधित ब्लॉक विकास अधिकारी (BDO), जिला कृषि अधिकारी (DAO), राज्य सहकारिता विभाग के पोर्टल/हेल्पलाइन या राष्ट्रीय किसान कॉल सेंटर (1800-180-1551) पर दर्ज करा सकते हैं।

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