आज फिर एक सवाल पूरे देश के किसानों के सामने खड़ा है। आखिर किसान को अपने ही अधिकार के लिए वर्षों तक संघर्ष क्यों करना पड़ता है? जब किसी किसान की जमीन पर बिजली का टावर लगाया जाता है, हाईटेंशन लाइन गुजारी जाती है या किसी विकास परियोजना के लिए उसकी खेती प्रभावित होती है, तब सबसे पहले किसान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह राष्ट्रहित में सहयोग करे। किसान भी देशहित को समझता है और अधिकांश मामलों में सहयोग करता है।
लेकिन जब उसी किसान को उसके अधिकार, उचित मुआवजा और सम्मानजनक व्यवहार के लिए छह-छह साल तक आंदोलन करना पड़े, तो यह केवल एक किसान की नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता है। विकास की कीमत केवल किसान क्यों चुकाए? यदि विकास सबके लिए है तो न्याय भी सबके लिए समान होना चाहिए।
विकास परियोजनाएं और सालों-साल लटकता मुआवजा
देशभर में हजारों किसान ऐसी परियोजनाओं से प्रभावित हैं जिनमें उनकी जमीन का उपयोग तो तत्काल कर लिया जाता है, लेकिन मुआवजा वर्षों तक अधर में लटका रहता है। कई किसानों का कहना है कि उन्हें बार-बार अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, आवेदन देने पड़ते हैं और अंत में आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ता है।
यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती। किसान सड़क पर उतरना नहीं चाहता, वह अपने खेत में काम करना चाहता है। लेकिन जब उसकी आवाज लगातार अनसुनी की जाती है, तब उसके सामने संघर्ष के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि यदि किसी मामले में वर्षों बाद जांच की घोषणा करनी पड़ रही है, तो इसका अर्थ यह भी है कि शुरुआती शिकायतों पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
यदि शिकायतें पहले ही गंभीरता से ली जातीं, यदि भुगतान प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होती और यदि किसानों को समय पर न्याय मिलता, तो लंबे संघर्ष की नौबत शायद नहीं आती। यही वह सवाल है जिसका जवाब आज हर किसान जानना चाहता है।
बिजली के टावर से सिर्फ जमीन नहीं, पूरी खेती होती है प्रभावित
किसान केवल मुआवजे की रकम नहीं मांगता, बल्कि वह सम्मान मांगता है। उसकी जमीन उसकी पूंजी है, उसकी पहचान है और उसके परिवार की आजीविका का आधार है। जब खेत के बीचों-बीच बिजली का टावर खड़ा हो जाता है, तब केवल कुछ वर्गमीटर जमीन प्रभावित नहीं होती, बल्कि पूरे खेत की उपयोगिता बदल जाती है।
बड़े कृषि यंत्र चलाने में कठिनाई आती है, फसल प्रबंधन प्रभावित होता है और कई बार भविष्य में भूमि का बाजार मूल्य भी कम हो जाता है। ऐसे नुकसान का आकलन केवल कागजी प्रक्रिया से नहीं किया जा सकता।
डिजिटल और पारदर्शी मुआवजा प्रणाली की जरूरत
आज आवश्यकता इस बात की है कि मुआवजा प्रणाली पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाई जाए। प्रत्येक प्रभावित किसान को यह जानकारी मिले कि उसकी भूमि का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया, कितनी राशि स्वीकृत हुई, भुगतान कब होगा और यदि कोई आपत्ति है तो उसका समाधान कितने दिनों में किया जाएगा। यदि यह व्यवस्था पहले से होती, तो वर्षों तक विवाद पैदा ही नहीं होते।
सिर्फ जांच के आश्वासन नहीं, तय हो प्रशासनिक जवाबदेही
किसानों का यह भी कहना है कि केवल आश्वासन अब पर्याप्त नहीं हैं। वर्षों से अनेक मामलों में जांच की घोषणा होती रही है, लेकिन अंतिम परिणाम बहुत कम देखने को मिलते हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि हर जांच समयबद्ध हो, उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक हो और यदि कहीं अनियमितता या लापरवाही साबित होती है तो जिम्मेदार लोगों पर भी कार्रवाई दिखाई दे।
जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी समस्याएं बार-बार सामने आती रहेंगी। सरकारें अक्सर किसानों को देश का अन्नदाता कहती हैं। यह सम्मानजनक शब्द तभी सार्थक होंगे जब नीतियों और प्रशासनिक व्यवस्था में भी किसान को वही सम्मान मिले। यदि किसी परियोजना का लाभ पूरे समाज को मिलने वाला है, तो उसका बोझ केवल किसान पर नहीं डाला जा सकता। किसान से सहयोग लेना उचित है, लेकिन उसके अधिकारों की रक्षा करना उससे भी अधिक आवश्यक है।
डिजिटल युग में बढ़ा है ग्रामीण भारत का जागरूकता स्तर
आज ग्रामीण भारत का किसान पहले की तुलना में अधिक जागरूक है। वह अपने अधिकारों को समझता है, कानून पढ़ता है और डिजिटल माध्यमों से जानकारी भी प्राप्त करता है। इसलिए अब किसी भी प्रकार की अपारदर्शिता लंबे समय तक छिपी नहीं रह सकती। यदि कहीं भुगतान में देरी होगी, यदि कहीं मूल्यांकन में भेदभाव होगा या यदि किसी किसान के साथ अन्याय होगा, तो उसकी आवाज पहले से कहीं अधिक मजबूती से उठेगी।
यह भी जरूरी है कि विकास परियोजनाओं में किसानों को केवल प्रभावित व्यक्ति नहीं बल्कि भागीदार माना जाए। परियोजना शुरू होने से पहले किसानों के साथ खुली बैठक हो, उन्हें पूरी जानकारी दी जाए और उनकी समस्याओं को सुना जाए। इससे विवाद कम होंगे और परियोजनाओं के प्रति विश्वास भी बढ़ेगा। संवाद की कमी अक्सर संघर्ष को जन्म देती है।
समयबद्ध समाधान और संवेदनशील प्रशासन की पहचान
आज का किसान केवल मुआवजा नहीं चाहता, बल्कि ऐसी व्यवस्था चाहता है जिसमें उसे बार-बार अधिकारियों के सामने अपनी पीड़ा साबित न करनी पड़े। यदि भुगतान का अधिकार है तो वह समय पर मिले। यदि नुकसान हुआ है तो उसका निष्पक्ष आकलन हो। यदि गलती हुई है तो जिम्मेदारी तय हो। यही एक लोकतांत्रिक और संवेदनशील प्रशासन की पहचान होगी।
हम सभी को यह समझना होगा कि किसान का संघर्ष केवल व्यक्तिगत नहीं होता। जब एक किसान न्याय के लिए लड़ता है, तो वह भविष्य में हजारों किसानों के अधिकारों की भी रक्षा करता है। इसलिए ऐसी घटनाओं को केवल स्थानीय विवाद मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। ये घटनाएं नीति, प्रशासन और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठाती हैं।
अब समय केवल जांच के आश्वासन का नहीं बल्कि परिणाम देने का है। यदि वास्तव में निष्पक्ष जांच होती है, वास्तविक नुकसान का आकलन किया जाता है और पात्र किसानों को उनका अधिकार मिलता है, तो इससे किसानों का विश्वास मजबूत होगा। लेकिन यदि वर्षों की लड़ाई के बाद भी केवल कागजी कार्रवाई होती रही, तो किसानों का व्यवस्था पर भरोसा और कमजोर होगा।
निष्कर्ष: किसान देश के विकास का विरोधी नहीं है। वह चाहता है कि बिजली भी पहुंचे, उद्योग भी लगें और देश भी आगे बढ़े। लेकिन वह यह भी चाहता है कि विकास का रास्ता उसके अधिकारों को कुचलकर न बनाया जाए। जब तक किसान को सम्मान, पारदर्शिता और समय पर न्याय नहीं मिलेगा, तब तक विकास की तस्वीर अधूरी रहेगी।
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मेरा नाम Anil Kumar Prasad है। मैं एक प्रगतिशील किसान हूं और पिछले 5 वर्षों से खेती की बारीकियों को धरातल पर सीख और समझ रहा हूं। ‘कृषि जागृति – चलो गांव की ओर’ के माध्यम से मैं अपने निजी अनुभव और खेती की सटीक जानकारी साझा करता हूं। मेरा उद्देश्य सरकारी योजनाओं, आधुनिक तकनीक और जैविक खेती के जरिए साथी किसानों को सशक्त बनाना है।
