बिहार के नालंदा जिले के एक छोटे से गाँव से शुरू हुई कहानी आज पूरे पूर्वी भारत के लिए ग्रामीण उद्यमिता का सबसे सशक्त उदाहरण बन चुकी है। हिलसा प्रखंड के गजेंद्र बीघा गाँव की रहने वाली मधु पटेल ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही तकनीक, प्रशिक्षण और दृढ़ संकल्प हो, तो आपदा को भी एक बड़े अवसर में बदला जा सकता है।
मधु पटेल का परिवार पहले सीमित खेती पर निर्भर था, लेकिन 2008 की बाढ़ के बाद आजीविका का संकट गहरा गया। स्थायी आय की तलाश में उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र, नालंदा के मार्गदर्शन में मशरूम उत्पादन अपनाया और मात्र 60 बैग से शुरुआत की। धीरे-धीरे मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण और स्थानीय विपणन से जुड़ते हुए उन्होंने मिल्की व्हाइट, बटन और ऑयस्टर मशरूम के साथ अचार व स्नैक्स जैसे उत्पाद भी तैयार किए। मांग बढ़ने पर उन्होंने अन्य किसानों को जोड़कर उत्पादन का दायरा बढ़ाया।
मशरूम की खेती में सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्तापूर्ण ‘स्पॉन’ (बीज) की उपलब्धता होती है। इस कमी को दूर करने के लिए मधु पटेल ने राजगीर में बुद्धा मशरूम स्पॉन लैबोरेटरी की स्थापना की। जहां शुरुआती उत्पादन 10 किलोग्राम था, वहीं आज यह लगभग 700 किलोग्राम तक पहुँच चुका है। यह लैब अब न केवल बिहार, बल्कि झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों में भी मशरूम बीज की आपूर्ति कर रही है।
मधु पटेल ने केवल कच्चा मशरूम बेचने तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने मशरूम के मूल्य संवर्धन पर काम किया। मशरूम का अचार, पापड़, कुकीज़ और स्नैक्स जैसे उत्पाद बनाएं। मूल्य संवर्धन से उनकी आय पारंपरिक बिक्री के मुकाबले 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गई। आज मधु पटेल एक उद्यमी के साथ-साथ एक सामाजिक रोल मॉडल भी हैं। उन्होंने करीब 3,000 महिलाओं को मशरूम उत्पादन के गुर सिखाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया है।
लागत घटने और उत्पादन बढ़ने से आय में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। मधु पटेल को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान भी मिल चुका है, जिनमें आईसीएआर-आईएआरआई का सम्मान शामिल है। उनकी यात्रा यह दर्शाती है कि तकनीक, प्रशिक्षण और महिला नेतृत्व के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ और लाभकारी कृषि-उद्यम विकसित किए जा सकते हैं।
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