बीमार व्यक्ति को डॉक्टर सलाह देते हैं कि फल खाओ, मूंग की दाल खाओ और मूंग का पानी पियो। लेकिन अगर उसी मूंग की खेती में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों के अवशेषों की जांच ही न हो, तो उसकी खाद्य सुरक्षा को लेकर सवाल उठना लाजिमी है।
मंत्रियों और अधिकारियों के गंभीर बयान
मध्य प्रदेश में गर्मी की मूंग की खेती में पेस्टिसाइड के इस्तेमाल को लेकर खुद सरकार के मंत्री और अधिकारी सवाल उठा चुके हैं। जून 2024 में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने गर्मी की मूंग पर कई बार पेस्टिसाइड के इस्तेमाल का मुद्दा उठाते हुए इसे नहीं खाने की सलाह दी थी। वहीं, जून 2025 में तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव एवं कृषि उत्पाद आयुक्त अशोक वर्णवाल ने रसायनों के इस्तेमाल का हवाला देते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर मूंग की खरीदी नहीं करने की बात कही थी।
पैराक्वाट और ग्लाइफोसेट का घातक खतरा
रिपोर्ट के अनुसार, नर्मदापुरम और भोपाल संभाग में गर्मी की मूंग की खेती के दौरान पैराक्वाट डाइक्लोराइड और ग्लाइफोसेट जैसे खरपतवारनाशकों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठे हैं। पैराक्वाट इंसानों के लिए अत्यंत विषैला रसायन है और इसके संपर्क में आने से गंभीर नुकसान हो सकता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि केंद्र सरकार और मध्य प्रदेश सरकार ने इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंधात्मक कदम उठाए हैं।
सरकारी खजाने पर ₹3,062 करोड़ का बोझ
सबसे बड़ा सवाल मूंग की सरकारी खरीदी और उससे होने वाले आर्थिक नुकसान को लेकर भी है। प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2023-24 से 2025-26 के बीच सरकारी खरीदी गई मूंग पर कुल 3,062 करोड़ रुपये का नुकसान होने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी खरीद के बाद अतिरिक्त मूंग को खुले बाजार में कम कीमत पर बेचना पड़ा, जिससे सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ा।
वैज्ञानिक लैब जांच की तत्काल आवश्यकता
लेकिन खाद्य सुरक्षा का सवाल आर्थिक नुकसान से भी ज्यादा गंभीर है। अगर मूंग में हानिकारक रसायनों के अवशेष होने की आशंका है, तो सरकार को वैज्ञानिक तरीके से इसकी जांच करानी चाहिए। जांच के बिना किसी पूरी फसल को जहरीला घोषित करना भी उचित नहीं है और खाद्य सुरक्षा से जुड़े सवालों को नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं है।
किसानों और उपभोक्ताओं का साझा हित
किसानों को सुरक्षित खेती के लिए सही मार्गदर्शन, स्वीकृत कृषि रसायनों के सुरक्षित उपयोग की जानकारी और उचित बाजार मिलना चाहिए। वहीं, आम लोगों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि उनकी थाली में पहुंचने वाला भोजन निर्धारित खाद्य सुरक्षा मानकों पर खरा उतरता है। सवाल यह है कि जब मूंग की खेती में इस्तेमाल होने वाले रसायनों को लेकर इतने गंभीर सवाल उठ रहे हैं, तो इसकी व्यवस्थित जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
किसानों और उपभोक्ताओं, दोनों के हित में पारदर्शी जांच और स्पष्ट जवाबदेही जरूरी है। आपकी क्या राय है? क्या सरकार को गर्मी की मूंग की बिक्री और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यापक जांच करानी चाहिए? कमेंट में अपनी राय जरूर बताएं।
मूंग की खाद्य सुरक्षा पर ध्यान रखने योग्य 3 मुख्य बातें
बिना जांच पूरी फसल को बदनाम करना गलत: जब तक सरकारी लैब में मूंग के नमूनों की व्यवस्थित जांच (Pesticide Residue Analysis) नहीं होती, तब तक पूरे किसान समुदाय की मेहनत को जहरीला करार देना अनुचित है।
प्रतिबंधित रसायनों पर जमीनी स्तर पर रोक: पैराक्वाट जैसे जानलेवा रसायनों की दुकानों से खुली बिक्री बंद होनी चाहिए ताकि किसान मजबूरी में फसल सुखाने के लिए इसका छिड़काव न करें।
उपभोक्ताओं को शुद्धता और किसानों को सही दाम: सरकार का दायित्व है कि वह किसानों को जैविक व सुरक्षित विकल्प उपलब्ध कराए और उपभोक्ताओं की थाली तक पहुंचने वाले अनाज के लिए कड़े मानक सुनिश्चित करे।
निष्कर्ष: मूंग की दाल भारतीय थाली का सबसे भरोसेमंद और सुपाच्य पोषण मानी जाती है, इसलिए इसके उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों को लेकर उठ रहे सवाल केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सीधे 140 करोड़ नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़े हैं। ₹3,062 करोड़ के राजकोषीय नुकसान से सबक लेते हुए सरकार को चाहिए कि वह केवल राजनीतिक बयानों के आधार पर किसानों की फसल को नकारने के बजाय पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से मूंग के नमूनों की जांच कराए।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह आलेख Anil Kumar Prasad द्वारा अपने 5 वर्षों के धरातलीय खेती के अनुभव, शोधपरक कृषि रिपोर्टों और किसानों के वास्तविक हितों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य आधुनिक तकनीक, सरकारी योजनाओं और व्यावहारिक ज्ञान के जरिए किसानों को सशक्त बनाना है। अपनी राय और सुझाव जरूर साझा करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. मध्य प्रदेश में गर्मी की मूंग पर कीटनाशकों को लेकर क्या विवाद हुआ था?
उत्तर: नर्मदापुरम और भोपाल संभाग में मूंग की फसल को जल्दी सुखाने और खरपतवार नष्ट करने के लिए पैराक्वाट डाइक्लोराइड और ग्लाइफोसेट जैसे घातक रसायनों के इस्तेमाल पर खुद मंत्रियों और कृषि अधिकारियों ने सवाल उठाए थे।
Q2. मूंग की सरकारी खरीद से सरकारी खजाने को कितना नुकसान होने का दावा किया गया है?
उत्तर: प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2023-24 से 2025-26 के बीच सरकारी खरीद के बाद अतिरिक्त मूंग को खुले बाजार में कम कीमत पर बेचने से कुल ₹3,062 करोड़ का राजकोषीय नुकसान हुआ।
Q3. पैराक्वाट डाइक्लोराइड रसायन इंसानी स्वास्थ्य के लिए कितना खतरनाक है?
उत्तर: पैराक्वाट एक अत्यंत विषैला हर्बीसाइड है, जिसके अवशेष शरीर में जाने पर किडनी, लिवर और फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं और इसका कोई मेडिकल एंटीडोट (प्रतिविष) उपलब्ध नहीं है।
Q4. क्या बिना रासायनिक जांच के मूंग को असुरक्षित घोषित किया जा सकता है?
उत्तर: नहीं, वैज्ञानिक और कानूनी रूप से जब तक राष्ट्रीय मानकों के अनुसार प्रयोगशाला में पेस्टिसाइड अवशेषों की जांच (Residue Testing) न हो, तब तक किसी फसल को असुरक्षित कहना सही नहीं है।
Q5. इस समस्या का सबसे सटीक और दीर्घकालिक समाधान क्या है?
उत्तर: सरकार द्वारा हर जिले में रासायनिक अवशेष जांच केंद्र स्थापित करना, जानलेवा रसायनों की बिक्री पर कड़ाई से रोक लगाना और किसानों को प्राकृतिक रूप से फसल पकाने की सुरक्षित तकनीकें सिखाना ही इसका स्थायी उपाय है।
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मैं एक प्रगतिशील किसान और कृषि पत्रकार (Agricultural Journalist) हूँ। और पिछले 5 वर्षों से खेती की बारीकियों को धरातल पर सीख और समझ रहा हूं। ‘कृषि जागृति – चलो गांव की ओर’ के माध्यम से मैं अपने जमीनी अनुभव और खेती की सटीक जानकारियां साझा करता हूँ। मेरा उद्देश्य सरकारी योजनाओं, आधुनिक तकनीक और जैविक खेती के जरिए साथी किसानों को सशक्त बनाना है।
