पॉलीहाउस उखाड़ने को मजबूर किसान: संरक्षित खेती क्यों बनी घाटे का सौदा? खीरा ₹5 किलो, लागत 3 गुना

डेढ़ दशक पहले जिस संरक्षित खेती (पॉलीहाउस) को कम जमीन में बंपर मुनाफा और आधुनिक खेती का भविष्य बताया गया था, वह आज किसानों के लिए भारी कर्ज और बर्बादी का कारण बन चुकी है। जलवायु परिवर्तन, तापमान में उतार-चढ़ाव और अनियंत्रित कीट-रोगों के चलते राजस्थान में हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि किसान पॉलीहाउस उखाड़कर दूसरी जगहों पर पलायन करने को मजबूर हैं।

राजस्थान में ‘मिनी इजराइल’ की नींव रखने वाले चर्चित किसान खेमाराम चौधरी तक को अपने पॉलीहाउस टोंक जिले में शिफ्ट करने पड़े हैं। नागौर के किसानों की बढ़ती लागत, सब्सिडी में कटौती और आईसीएआर वैज्ञानिकों की चेतावनी के साथ पढ़िए यह विशेष खोजी रिपोर्ट।

संरक्षित खेती बनी घाटे का सौदा

हलधर टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक डेढ़ दशक पहले जिस संरक्षित खेती को कम जमीन में अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और ज्यादा मुनाफे का जरिया माना गया था। वही अब किसानों के लिए घाटे का सौदा बनती जा रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान और मौसम में आ रहे उतार-चढ़ाव के बीच कीट-रोगों का बढ़ता प्रकोप किसानों की परेशानी बढ़ा रहा है।

खेमाराम चौधरी का टोंक पलायन

हालात ये हो चले हैं कि किसान पॉली हाउस उखाड़ने लगे हैं अथवा अपने पॉली हाउस को ऐसे एरिया में शिफ्ट कर रहे हैं, जहां दूर-दूर तक पॉली हाउस नहीं है। इस बात का अंदाजा मिनी इजराइल की नींव रखने वाले किसान खेमाराम चौधरी से लगाया जा सकता है। जिन्होंने अपने पॉली हाउस को टोंक जिले में शिफ्ट किया है।

कमोबेश, ऐसे ही हालात प्रदेश के दूसरे जिलों में भी देखने को मिल रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो संरक्षित खेती के हालात धीरे-धीरे कपास में गुलाबी सुंडी जैसे बनते जा रहे हैं। जबकि, संरक्षित खेती में सफेद मक्खी और थ्रिप्स कीट ने किसानों को पॉली हाउस खेती छोड़ने को मजबूर कर दिया है।

सर्दियों में ₹5 किलो खीरा

किसानों का कहना है कि वर्ष 2015 तक फसल में कीट-रोग का आंशिक प्रकोप देखने को मिलता था। लेकिन, अब पौध रोपण के साथ ही कृषि रसायनों का छिड़काव करना पड़ रहा है। इससे कृषि लागत काफी बढ़ चुकी है। वहीं, बाजार में कृषि आदान के दाम दोगुने हो चुके हैं। जबकि, बाजार में खीरा फसल की रेट में कोई ज्यादा अंतर नहीं आया है।

सर्दी की फसल में तो बाद वाली फसल को 5-10 रूपए प्रति किलो के रेट मिलते हैं। इससे मुनाफा मारा जाता है। इन हालात में किसान पॉलीहाउस में फसलें उगाने से तौबा करने लगे हैं। या फिर अपने पॉली हाउस को दूसरी जगह शिफ्ट कर रहे हैं। ताकि, बैंक ऋण का समय पर भुगतान किया जा सके। गौरतलब है कि सरकार ने संरक्षित संरचना पर अनुदान घटा दिया है। इससे किसानों पर पहले की तुलना में आर्थिक भार बढ़ा है।

₹800 का कैल्शियम ₹2,300 में

नागौर जिले के किसान अशोक कुमार सैनी ने बताया कि पॉलीहाउस स्थापना का काम आसान है। लेकिन, फसल उत्पादन करना अपने में एक बड़ी चुनौती बन चुका है। शुरुआती निवेश अधिक होने के कारण नुकसान की भरपाई करना भी आसान नहीं है। ऐसे में किसानों के सामने कर्ज, बढ़ते खर्च और घटते मुनाफे का संकट खड़ा हो रहा है।

उनका कहना है कि कृषि आदान महंगा हो चुका है। 700-800 रूपए में मिलने वाला कैल्शियम का बैग वर्तमान में 2300 रूपए का मिल रहा है। यही स्थिति दूसरे आदानों की है। ऐसे में फसल की लागत बढ़ चुकी है। गर्मी की फसल के भाव अच्छे मिलते है। लेकिन, सर्दी वाली फसल के भाव में खेती घाटे को सौदा बन चुकी है।

जलवायु परिवर्तन और दवाओं की विफलता

जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान, आर्द्रता और मौसम के चक्र में होने वाले बदलाव ने फसल प्रबंधन को अधिक जटिल बना दिया है। अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर सफेद मक्खी, थ्रिप्स, माइट्स और अन्य कीट फसलों को नुकसान पहुंचाने देर नहीं करते। गौरतलब है कि कई बार दवाओं पर खर्च बढ़ने के बावजूद अपेक्षित नियंत्रण नहीं मिल पाता। इससे उत्पादन की मात्रा और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होने का खतरा रहता है।

बढ़ गई उत्पादन लागत: एक ओर लागत में इजाफा हो रहा है, दूसरी ओर दवाओं के इस्तेमाल के बावजूद फसल को पूरा संरक्षण नहीं मिल पाना किसानों की चिंता बढ़ा रहा है। यदि बाजार में उपज का भाव भी कमजोर रहे, तो मुनाफे का गणित पूरी तरह बिगड़ जाता है।

पॉलीहाउस उखाड़ने की नौबत संरक्षित खेती में बढ़ते खर्च और अनिश्चित आमदनी के बीच किसान तकनीक छोड़ रहे हैं तो सवाल केवल एक फसल या एक किसान के नुकसान का नहीं, बल्कि कृषि निवेश, तकनीकी विस्तार और किसानों की आय बढ़ाने के प्रयासों का भी है। किसान खेमाराम ने बताया कि वर्ष 2015 तक फसल में कीट-रोग का प्रकोप नगण्य था। लेकिन, अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। बायो कंट्रोल प्रत्येक किसान के बूते से बाहर है।

कीट-रोग का बन चुके है घर: राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एसएम हलधर ने बताया कि संरक्षित फसल के सुरक्षित उत्पादन के लिए आईपीएम तकनीक ही कारगर है। क्योंकि, रसायन की गुणवत्ता किसी से छिपी नहीं हैं। यह सही है कि सघन संरक्षित खेती से कीट-रोग का प्रकोप बढ़ रहा है। ऐसे में कृषि विश्वविद्यालयों को भी कीट-रोग निगरानी तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है।

पॉलीहाउस खेती फेल होने के 3 बड़े कारण

गुलाबी सुंडी जैसे बने हालात (कीट प्रतिरोधकता): पॉलीहाउस के अंदर लगातार उच्च आर्द्रता और बंद माहौल के कारण सफेद मक्खी और थ्रिप्स ने रासायनिक कीटनाशकों के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता (Resistance) विकसित कर ली है। अब महंगी से महंगी दवाएं भी बेअसर साबित हो रही हैं।

लागत में 3 गुना उछाल और मंडी में मंदी: कृषि आदानों के दाम आसमान छू रहे हैं। जो कैल्शियम पहले ₹800 में मिलता था, वह अब ₹2,300 का हो गया है। दूसरी तरफ सर्दियों में खीरा ₹5 से ₹10 किलो बिकता है, जिससे तुड़ाई और मजदूरी की लागत भी नहीं निकल पाती।

सरकारी अनुदान में कटौती और बैंक कर्ज: सरकार द्वारा संरक्षित खेती पर मिलने वाली सब्सिडी कम करने से किसानों पर शुरुआती पूंजी का बोझ बढ़ गया है। भारी बैंक कर्ज और किस्तों के दबाव में किसान ढांचा उखाड़कर भाग रहे हैं।

निष्कर्ष: लाखों रुपये के निवेश और सरकारी दावों के बाद भी अगर खेतों से पॉलीहाउस उखड़ रहे हैं और किसान अपनी जमीन छोड़कर भागने को मजबूर हैं, तो यह समूची कृषि नीति और तकनीकी प्रसार के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी है।

संरक्षित खेती को केवल ढांचा खड़ा करने तक सीमित रखने और किसानों को कीट प्रतिरोधकता व बाजार मूल्य के चक्रव्यूह में अकेला छोड़ देने का ही यह नतीजा है। जब तक कृषि आदानों की कीमतों पर नियंत्रण, कीटों के लिए स्वतंत्र निगरानी तंत्र और उपज के लिए न्यूनतम लाभकारी मूल्य की गारंटी नहीं दी जाती, तब तक आधुनिक तकनीकों का यह सपना किसानों को कर्जदार ही बनाता रहेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. किसान अपने पॉलीहाउस क्यों उखाड़ रहे हैं या शिफ्ट कर रहे हैं?

उत्तर: सफेद मक्खी और थ्रिप्स जैसे कीटों के अनियंत्रित प्रकोप, इनपुट लागत में 3 गुना वृद्धि, मंडी में खीरे के ₹5-10 किलो तक गिरने और बैंक कर्ज के भारी दबाव के कारण किसान पॉलीहाउस उखाड़ने पर मजबूर हैं।

Q2. ‘मिनी इजराइल’ के जनक किसान खेमाराम चौधरी ने क्या कदम उठाया?

उत्तर: राजस्थान में संरक्षित खेती का मॉडल स्थापित करने वाले प्रगतिशील किसान खेमाराम चौधरी ने कीट-रोगों के अत्यधिक प्रकोप के चलते अपने पॉलीहाउस को टोंक जिले में शिफ्ट किया है।

Q3. नागौर के किसान अशोक कुमार सैनी के अनुसार लागत में कितना इजाफा हुआ है?

उत्तर: उनके अनुसार, जो कैल्शियम बैग पहले ₹700-800 में मिलता था, वह अब ₹2,300 का मिल रहा है। सभी कृषि आदानों के दाम दोगुने-तिगुने होने से खेती पूरी तरह घाटे में चली गई है।

Q4. कृषि वैज्ञानिक संरक्षित खेती के हालात की तुलना किस संकट से कर रहे हैं?

उत्तर: वैज्ञानिक इसकी तुलना कपास में ‘गुलाबी सुंडी’ (Pink Bollworm) के संकट से कर रहे हैं, जहां कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल के बावजूद कीटों पर कोई असर नहीं हो रहा है।

Q5. राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन संस्थान (NCIPM) के डॉ. एस.एम. हलधर का क्या सुझाव है?

उत्तर: डॉ. हलधर के अनुसार, अंधाधुंध रासायनिक दवाओं के बजाय केवल सख्त समेकित कीट प्रबंधन (IPM) तकनीक ही कारगर है और कृषि विश्वविद्यालयों को निगरानी तंत्र मजबूत करना होगा।

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