चारा संकट और पशु कुपोषण: महंगे भूसे में दूध उत्पादन बढ़ाने के वैज्ञानिक उपाय

प्रति पशु रोज 75 से 90 रुपये का चारा खिलाने के बाद भी अगर आपकी गाय-भैंस उम्मीद के मुताबिक दूध न दे और बार-बार ब्यांत का समय टलता रहे, तो यह पशुपालन को सीधे घाटे का सौदा बना देता है। जब उद्योगपति महंगे दामों पर भूसा खरीदकर भट्टों में झोंक रहे हों और चारागाह सिकुड़ रहे हों, तब साधारण भूसे को ही उच्च पोषण वाले चारे में बदलने का वैज्ञानिक तरीका जाने बिना पशु पालना जेब खाली कराने जैसा है।

चारागाह अतिक्रमण और भट्टों में भूसा जलने से गहराता संकट

प्रदेश में चारागाह अतिक्रमण की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। इसके चलते किसान और पशुपालक के सामने चारे की समस्या साल दर साल गहराती जा रही है। एक दुधारू पशु को प्रतिदिन 5 किलोग्राम हरे चारे और 15 किलोग्राम भूसे अथवा सूखे चारे की आवश्यकता होती है जिसका बाजार मूल्य 75 से 90 रुपए बैठता है। किसान भूसा तैयार करता है तो उसे बायलर और भट्टों में जलाने के लिए ऊंचे दाम पर उद्योगपति खरीद लेते हैं।

इस तरह भूसे का अकाल बढ़ रहा है। साथ ही, पशु कुपोषण की समस्या साधारण पशुपालक के लिए पशुपालन बूते से बाहर हो रहा है। भूखा और कुपोषित जानवर कब तक और कितना दूध देगा? यह सोचनीय और चिन्तनीय है। पशु आहार की बढ़ती समस्या को लेकर हलधर टाइम्स की डॉ. अजेश मीणा से हुई वार्ता में बताया गया हैं।

असंतुलित आहार से पशु स्वास्थ्य और दुग्ध उत्पादन पर असर

असंतुलित आहार के कारण पशु में आनुवंशिक क्षमता से कम दुग्ध उत्पादन, छोटा दुग्ध-काल और दो ब्यांत के बीच अधिक अंतराल, प्रजनन क्षमता में कमी, पशु में उपापचयी समस्या जैसे कि मिल्क-फीवर, कीटोसिस की सम्भावना और धीमा शारीरिक विकास जैसी हानि उठानी पड़ती है।

पशुपालक चारे की पौष्टिकता को कैसे बढ़ा सकता है?

हरे चारे की कमी के कारण पशु की निर्भरता रेशेदार सूखे चारे पर अत्यधिक बढ़ जाती है। अतः सूखे चारे की पौष्टिकता बढ़ाने में यूरिया घोल, यूरिया-शीरा, खनिज तरल मिश्रण और यूरिया शीरा खनिज ब्लॉक सहायक होते हैं। स्थानीय उपलब्धता के अनुसार अरडू, खेजड़ी, बबूल, पीपल, नीम, गूलर, बरगद, शहतूत आदि की पत्ती पशु को खिलानी चाहिए। सरसों की पत्ती और दूसरे हरे चारे को, सूखी घास और कड़बी के साथ कुट्टी बनाकर खिलाने से चारा व्यर्थ नहीं जायेगा। आहार में खनिज लवण की कमी को दूर करने के लिए पशु को प्रतिदिन 50 ग्राम मिनरल मिक्सचर पाउडर खिलाना जरूरी रहता है।

चारे की समस्या से कैसे निजात पाई जा सकती है?

किसान/पशुपालक को सरकार घास मिनीकिट बांट रही है। लेकिन, मिनीकिट का किसान क्या उपयोग कर रहा है, इसकी कोई मॉनिटरिंग नहीं कर रहा है। किसान समूह बनाकर चारा उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। चारे के बढ़ते दामों पर लगाम लगाने के लिए ग्राम स्तर पर चारा डिपो ग्राम सेवा सहकारी समिति के माध्यम से संचालित हो सकते हैं। गौशालाओं को जमीन और आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाकर चारा उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। चारा उत्पादन को मनरेगा में शामिल किया जा सकता है।

गाय-भैंस में दुग्ध उत्पादन कैसे बढ़ाया जा सकता है?

गाय-भैंस में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए सूखे और हरे चारे के साथ आवश्यकतानुसार बांटा खिलायें। साथ ही, खनिज लवण और साधारण नमक नियमित रूप से पशु को दें। वर्ष में दो बार कृमिनाशक दवा पशु को दें। अधिक दुग्ध उत्पादन और उन्नत संतति के लिए उच्च गुणवत्ता वाले नर सांड से प्राकृतिक परिवेष्ट अथवा कृत्रिम गर्भाधान द्वारा गर्भित करवाना चाहिए।

कम उत्पादक नर पशु को बधिया करवाया जाना चाहिए। मादा पशु के ताप में नहीं आने अथवा गर्भ नहीं ठहरने की स्थिति में तुरन्त पशु चिकित्सक से सम्पर्क करके उपचार कराना चाहिए, ताकि पशु का शुष्क समय न्यूनतम रखा जा सके। इसके अलावा पशु आवास प्रबंधन अन्तः और बाह्य परजीवी से मुक्त होना चाहिए।

चारा संकट से निपटने के लिए 3 सबसे जरूरी बातें

सादे भूसे की पौष्टिकता बढ़ाएं: केवल सूखा भूसा पेट भर सकता है, पोषण नहीं दे सकता; भूसे पर यूरिया-शीरा का उपचार करें और अरडू, खेजड़ी, नीम जैसी स्थानीय पत्तियों की कुट्टी मिलाकर खिलाएं।

प्रतिदिन 50 ग्राम मिनरल मिक्सचर अनिवार्य: आहार में खनिज लवण और साधारण नमक की कमी से पशु समय पर गाभिन नहीं होता और दूध अचानक घट जाता है; इसे दैनिक आहार में कभी न भूलें।

साल में दो बार पेट के कीड़े की दवा (डीवर्मिंग) दें: पेट में कीड़े होने पर पशु का सारा पोषण परजीवी चूस लेते हैं; कृमिनाशक दवा देने के बाद ही महंगे दाने-बांटे का पूरा असर दूध पर दिखाई देता है।

डॉ. अजेश कुमार मीणा (पशु विशेषज्ञ) का परिचय

जीवन परिचय: भरतपुर जिले के बौरज गांव से ताल्लुक रखने वाले डॉ. अजेश कुमार वर्तमान में कृषि विज्ञान केन्द्र बागलकोट (कर्नाटक) में पशु विशेषज्ञ पद पर कार्यरत हैं। एमपीयूएटी विश्वविद्यालय उदयपुर से स्नातकोत्तर करने के बाद राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल से पशुधन उत्पादन और प्रबंधन पर विद्यावाचस्पति की उपाधि ली।

अब तक इनके 12 शोध पत्र, 2 पुस्तक, 1 पाठ्य पुस्तक, 30 आलेख, 2 सारांश प्रकाशित हो चुके हैं। स्नातकोत्तर में दो बार मैरिट अवार्ड, शोध में फेलोशिप अवार्ड और स्कॉलरशिप अवार्ड से डॉ. कुमार सम्मानित हो चुके हैं।

निष्कर्ष: चारागाहों का संरक्षण और सूखे चारे का वैज्ञानिक संवर्धन ही वर्तमान चारा संकट का स्थायी समाधान है। पशुपालक भाई स्थानीय चारा वृक्षों, 50 ग्राम मिनरल मिक्सचर और नियमित डीवर्मिंग का नियम अपनाकर महंगे चारे के दौर में भी अपनी लागत घटा सकते हैं और पशुओं से भरपूर दुग्ध उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer): यह तकनीकी मार्गदर्शन Dr. Ajesh Kumar Meena (पशु विशेषज्ञ, KVK) के वैज्ञानिक अनुसंधान के व्यावहारिक कृषि अनुभवों पर आधारित है। पशु आहार में यूरिया उपचार या दवाओं के प्रयोग से पहले किसी योग्य पशु चिकित्सक की निगरानी में सही अनुपात अवश्य समझ लें।

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