सरकारी योजना से शुरू हुआ ‘खुशी मिल्क उद्योग’, आज कर रहा लाखों का कारोबार

मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के पेटलावद ब्लॉक के मंडन गांव की निवासी अनीता चारेल, जो कभी अपने परिवार का गुजारा करने के लिए खेती और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर थीं, आज एक सफल डेयरी उद्यमी के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। एक समय था जब उनके पूरे परिवार की साल भर की कमाई मुश्किल से 60 हजार रुपये हो पाती थी, लेकिन आज उनकी “खुशी मिल्क उद्योग” इकाई न केवल उन्हें समृद्ध बना रही है, बल्कि दर्जनों अन्य ग्रामीण परिवारों के लिए भी सहारा बनी है।

अनीता की इस सफलता की नींव राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत एक स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के साथ रखी गई थी। इसी दौरान उन्हें प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना की जानकारी मिली, जिसने उनके सपनों को पंख दिए।

बागवानी विभाग के सक्रिय सहयोग से अनीता ने वर्ष 2025-26 में लगभग 2 लाख रुपये के शुरुआती निवेश के साथ अपनी डेयरी इकाई स्थापित की। इस निवेश में सरकार की ओर से मिली 70 हजार रुपये की सब्सिडी ने वित्तीय बोझ को काफी कम कर दिया, जिससे उन्हें व्यवसाय को मजबूती से शुरू करने का आत्मविश्वास मिला।

शुरुआत में यह सफर काफी छोटा था, जहाँ अनीता गांव के केवल छह लोगों से प्रतिदिन मात्र 15 लीटर दूध एकत्र करती थीं। लेकिन अपनी कड़ी मेहनत और उत्पादों की गुणवत्ता के दम पर उन्होंने इस व्यवसाय का तेजी से विस्तार किया।

आज उनकी इकाई प्रतिदिन करीब 180 लीटर दूध की खरीद कर रही है और केवल दूध बेचने तक सीमित न रहकर दही, पनीर, छाछ तथा पशु आहार जैसे उत्पादों का प्रसंस्करण भी कर रही है। प्रसंस्करण के इस मूल्यवर्धन ने उनकी आय में कई गुना वृद्धि की है, जिससे उनका व्यवसाय अब एक संगठित उद्योग का रूप ले चुका है।

वर्तमान में अनीता की “खुशी मिल्क उद्योग” इकाई प्रतिमाह 2.5 लाख रुपये से अधिक का कारोबार कर रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पहल ने स्थानीय स्तर पर रोजगार के बड़े अवसर पैदा किए हैं, जिससे आज गांव के करीब 35 परिवारों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आजीविका मिल रही है।

अधिकारियों का मानना है कि यह उदाहरण साबित करता है कि अगर आदिवासी महिलाओं को सही प्रशिक्षण और सरकारी योजनाओं का साथ मिले, तो वे न केवल खुद आत्मनिर्भर बन सकती हैं, बल्कि पूरे ग्रामीण समाज की आर्थिक दशा बदलने का नेतृत्व भी कर सकती हैं।

निष्कर्ष: अनीता चारेल की सफलता की कहानी यह साबित करती है कि यदि ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं को सही मार्गदर्शन, वित्तीय प्रशिक्षण और सरकारी योजनाओं का समय पर सहयोग मिले, तो वे सीमित संसाधनों के बावजूद आत्मनिर्भरता का एक नया इतिहास लिख सकती हैं।

‘खुशी मिल्क उद्योग’ न केवल एक महिला के दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत का परिणाम है, बल्कि यह इस बात का भी जीवंत उदाहरण है कि कैसे प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना जैसी पहलें ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती हैं। आज अनीता न सिर्फ अपने परिवार को आर्थिक रूप से सुदृढ़ कर चुकी हैं, बल्कि दर्जनों अन्य ग्रामीण परिवारों को आजीविका देकर पूरे समाज के लिए महिला सशक्तिकरण और उद्यमिता की एक प्रेरणादायक मिसाल बन गई हैं।

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