खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण भारत से बासमती चावल के निर्यात में बाधा उत्पन्न हो गई है। निर्यात के चरम सीजन के दौरान बड़ी मात्रा में खेप भारतीय बंदरगाहों पर अटक गई है, जिससे निर्यातकों की लागत बढ़ती जा रही है।
अखिल भारतीय चावल निर्यात संघ (एआईआरईए) के अनुसार, इस समय भारतीय बंदरगाहों पर करीब 1.5 से 2 लाख टन बासमती चावल अटका हुआ है, जबकि लगभग 2 लाख टन माल रास्ते में है। निर्यातकों का कहना है कि कार्गो की आवाजाही में देरी के कारण कंटेनर भंडारण, बिजली कनेक्शन और हैंडलिंग शुल्क से जुड़ी लागत बढ़ती जा रही है।
एआईआरईए के अध्यक्ष सतीश गोयल ने बताया कि बताया कि संगठन ने इस अतिरिक्त खर्च से राहत दिलाने के लिए वाणिज्य और वित्त मंत्रालय से संपर्क किया है। निर्यातकों ने मांग की है कि मौजूदा व्यवधान के दौरान बंदरगाह प्राधिकरण अतिरिक्त शुल्क न लगाएं और प्रभावित देशों के अधिकारियों के साथ भी इस मुद्दे को उठाया जाए।
निर्यात में यह व्यवधान ऐसे समय में सामने आया है जब रमजान के दौरान खाड़ी देशों में मांग बढ़ने के कारण बासमती चावल की खेपे सामान्यतः अधिक भेजी जाती हैं। अनिश्चित शिपिंग कार्यक्रम के कारण समय पर आपूर्ति प्रभावित हो रही है और निर्यातकों के लिए परिचालन जोखिम बढ़ गया है। निर्यातक संगठनों के प्रतिनिधि इस मुद्दे पर राहत उपायों की संभावनाओं पर चर्चा के लिए एपीडा और वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों से मुलाकात करने वाले हैं।
वर्तमान स्थिति का समाधान अब सरकारी हस्तक्षेप पर निर्भर है। यदि वाणिज्य और वित्त मंत्रालय निर्यातकों की मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए अतिरिक्त शुल्कों में छूट और राजनयिक स्तर पर बातचीत का मार्ग अपनाते हैं, तो निर्यातकों को होने वाले वित्तीय नुकसान को कम किया जा सकता है। अंततः, शिपिंग अनिश्चितता को दूर करना भारतीय बासमती की वैश्विक विश्वसनीयता और विदेशी मुद्रा आय को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
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