आज खेती केवल खेत तक सीमित नहीं रह गई है। अब अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का सीधा असर हमारी खेती की लागत और मुनाफे पर पड़ रहा है। हाल ही में ईरान, इज़राइल, अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण डीएपी उर्वरक के बाजार में हलचल देखी जा रही है। यह स्थिति किसानों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि भारत जैसे देश में उर्वरकों की कीमतें वैश्विक बाजार और आपूर्ति पर निर्भर करती हैं। यदि समय रहते किसान इस बदलाव को समझ लें, तो वे अपनी खेती की योजना बेहतर तरीके से बना सकते हैं।
फसलों के लिए डीएपी एक महत्वपूर्ण फास्फेटिक उर्वरक है, जो रबी और खरीफ दोनों फसलों में जड़ों की मजबूती, प्रारंभिक वृद्धि और उत्पादन बढ़ाने में मदद करता है। भारत में गेहूँ, धान, दलहन और तिलहन जैसी फसलों में इसका व्यापक उपयोग होता है। लेकिन इसकी बड़ी मात्रा आयात पर निर्भर होने के कारण वैश्विक राजनीतिक तनाव का असर सीधे इसकी कीमत और उपलब्धता पर पड़ता है।
इस समय मध्य-पूर्व क्षेत्र में तनाव बढ़ने से समुद्री रास्तों की सुरक्षा पर खतरा बढ़ गया है। फॉस्फेट और अमोनिया जैसे कच्चे माल की सप्लाई मुख्य रूप से इसी क्षेत्र से होती है। यदि समुद्री मार्गों में बाधा आती है, तो शिपिंग लागत बढ़ जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आ जाती है। जब कीमतें बढ़ती हैं, तो आयात करने वाले देशों में लागत और बढ़ जाती है, जिसका असर अंततः किसान भाइयों तक पहुँचता है।
इसके अलावा ब्राजील और एशियाई देशों की बढ़ती मांग भी कीमतों को प्रभावित कर रही है। आगामी फसल सीजन को देखते हुए बड़े आयातक देश पहले से ही अधिक खरीद कर रहे हैं। इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और कीमतें ऊपर जाती हैं। इसी तरह चीन जैसे बड़े निर्यातक देश की नीतियों में बदलाव से भी आपूर्ति अनिश्चित हो जाती है। यदि निर्यात नियंत्रण बढ़ता है, तो वैश्विक बाजार में कमी का माहौल बनता है।
कच्चे माल की लागत बढ़ना भी एक बड़ा कारण है। फॉस्फोरिक एसिड और सल्फर जैसे तत्वों की कीमतों में वृद्धि से डीएपी का उत्पादन महंगा हो जाता है। इसके साथ ही ऊर्जा और ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव से उत्पादन और परिवहन दोनों महंगे हो जाते हैं। यह पूरी प्रक्रिया धीरे-धीरे उर्वरकों के खुदरा बाजार तक पहुँचती है, जिससे किसानों को अधिक कीमत चुकानी पड़ती है।
भारत में उर्वरक व्यापार मुख्य रूप से डॉलर में होता है। यदि डॉलर मजबूत होता है, तो आयात की लागत बढ़ जाती है और भारतीय मुद्रा कमजोर होने पर कीमतों का दबाव और बढ़ जाता है। इसका असर यह होता है कि सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ता है और कभी-कभी बाजार में उपलब्धता प्रभावित होती है। ऐसे समय में समय पर उर्वरक न मिलने से बुवाई और फसल प्रबंधन प्रभावित होता है।
इस स्थिति में हमें घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि रणनीति बदलने की आवश्यकता है। सबसे पहले, संतुलित पोषण अपनाना जरूरी है। केवल डीएपी पर निर्भर रहने के बजाय सिंगल सुपर फॉस्फेट, जैव उर्वरक और कार्बनिक खाद का उपयोग बढ़ाना चाहिए। इससे लागत कम होगी और मिट्टी की सेहत भी सुधरेगी।
दूसरा, मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरक देना चाहिए। कई बार हम जरूरत से ज्यादा डीएपी डालते हैं, जिससे पैसा भी खर्च होता है और मिट्टी को भी नुकसान होता है। सही मात्रा और सही समय पर उर्वरक उपयोग करने से कम लागत में बेहतर उत्पादन संभव है।
तीसरा, वैकल्पिक पोषण प्रबंधन जैसे नैनो उर्वरक, ड्रिप फर्टिगेशन और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन अपनाना चाहिए। इससे उर्वरकों की उपयोग दक्षता बढ़ती है और कम मात्रा में भी अच्छे परिणाम मिलते हैं।
अंत में किसान को खेती में आने वाले बदलावों को समझना और समय के अनुसार रणनीति बनाना ही भविष्य की सफलता की कुंजी है। यदि किसान केवल बाजार पर निर्भर होकर खेती करेंगे, तो जोखिम ओर महंगाई का सामना करना पड़ेगा। लेकिन यदि किसान वैज्ञानिक और संतुलित खेती अपनाएंगे तो लागत कम कर सकते हैं और मुनाफा बढ़ा सकते हैं।
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