काला, भूरा या सफेद: कौन सा DAP है असली? किसानों के लिए सबसे बड़ा खुलासा

किसानों के लिए आज हम एक ऐसे विषय पर विस्तार से बात करने जा रहे हैं जिसको लेकर खेत-खलिहान से लेकर खाद की दुकानों तक लगातार भ्रम बना रहता है- काला डीएपी अच्छा है या भूरा, या फिर हल्का सफेद डीएपी बेहतर है? कई किसान साथी यह भी पूछते हैं कि डीएपी पानी में घुल क्यों नहीं रहा, नीचे तल छट क्यों बन जाती है या कभी ऊपर क्यों तैरता है।

इन सभी सवालों का सीधा और वैज्ञानिक जवाब समझना जरूरी है, ताकि आप सही निर्णय ले सकें और किसी भी प्रकार की ठगी या गलत खरीद से बच सकें। सबसे पहले यह समझिए कि डीएपी यानी डाय-अमोनियम फॉस्फेट एक संतुलित उर्वरक है, जिसमें सामान्यतः 18% नाइट्रोजन और 46% फॉस्फोरस (पी₂O₅ के रूप में) होता है।

इसका मतलब यह है कि हर एक दाने में ये दोनों पोषक तत्व एक निश्चित अनुपात में मौजूद होते हैं। यह कोई मिलावटी मिश्रण नहीं होता कि अलग-अलग चीजें मिलाकर बनाया गया हो, बल्कि यह एक नियंत्रित रासायनिक प्रक्रिया से तैयार होता है। इसलिए जब डीएपी सही गुणवत्ता का होता है, तो उसका हर दाना समान रूप से प्रभावी होता है।

अब बात करते हैं रंग की, जो किसानों के बीच सबसे बड़ा भ्रम पैदा करता है। बाजार में आपको काला, भूरा, हल्का ग्रे या सफेद रंग का डीएपी देखने को मिलता है। बहुत से किसान यह मान लेते हैं कि काला डीएपी ज्यादा ताकतवर या शुद्ध होता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह धारणा सही नहीं है।

डीएपी का रंग उसके अंदर मौजूद अशुद्धियों पर निर्भर करता है, खासकर आयरन (लोहा), एल्यूमिनियम और अन्य खनिज तत्वों पर। जितना ज्यादा ये तत्व बच जाते हैं निर्माण प्रक्रिया में, उतना ही डीएपी का रंग गहरा हो जाता है। डीएपी बनाने की प्रक्रिया में रॉक फॉस्फेट का उपयोग किया जाता है, जिससे फॉस्फोरिक एसिड तैयार किया जाता है।

इसी एसिड में अमोनिया मिलाकर डीएपी बनाया जाता है। यदि फॉस्फोरिक एसिड का शुद्धिकरण सही तरीके से किया गया है, तो तैयार डीएपी हल्के रंग का होगा-सफेद या ग्रे। लेकिन अगर शुद्धिकरण में कमी रह गई और अशुद्धियां अधिक मात्रा में बच गईं, तो डीएपी का रंग गहरा भूरा या काला हो सकता है।

अब यहां एक महत्वपूर्ण बात समझिए- रंग का मतलब यह नहीं है कि पोषक तत्व कम या ज्यादा हैं। 18 से 46 का अनुपात सामान्यतः बना रहता है। लेकिन अशुद्धियों के कारण पौधों को मिलने वाली फॉस्फोरस की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। ज्यादा आयरन होने पर फॉस्फोरस का फिक्सेशन बढ़ जाता है, जिससे पौधे उसे आसानी से नहीं ले पाते।

इसलिए हल्के रंग का डीएपी अधिक प्रभावी माना जाता है क्योंकि उसमें अशुद्धियां कम होती हैं और पोषक तत्व जल्दी उपलब्ध होते हैं। कई कंपनियां मार्केटिंग के लिए डीएपी के दानों पर कोटिंग भी करती हैं, जिससे वह एक समान रंग का और आकर्षक दिखे। यह कोटिंग देखने में अच्छी लगती है, लेकिन इससे गुणवत्ता का आकलन नहीं किया जा सकता। किसान को दिखावे के बजाय असली प्रदर्शन पर ध्यान देना चाहिए।

अब बात करते हैं पहचान की। किसान स्तर पर सबसे आसान तरीका है पानी में घुलनशीलता की जांच। एक गिलास साफ पानी लें और उसमें थोड़ा डीएपी डालें। यदि डीएपी पूरी तरह घुल जाता है और कोई तल छट नहीं बचती, तो यह अच्छी गुणवत्ता का संकेत है। लेकिन यदि नीचे मिट्टी जैसी परत जम जाती है या कुछ कण तैरते रहते हैं, तो इसका मतलब है कि उसमें अशुद्धियां अधिक हैं।

दूसरा तरीका है दानों को हाथ से दबाकर देखना। अच्छा डीएपी कठोर होता है और आसानी से पाउडर नहीं बनता। यदि दाने हल्के दबाव में ही टूट जाएं, तो यह गुणवत्ता में कमी का संकेत हो सकता है। एक और महत्वपूर्ण भ्रम है कि डीएपी में कोई फिलर मिलाया जाता है जैसे बालू, मिट्टी या अन्य पदार्थ। यह पूरी तरह गलत है।

असली डीएपी में कोई फिलर नहीं होता। उसमें जो 36% हिस्सा बचता है, वह हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का होता है, जो रासायनिक संरचना का हिस्सा है, न कि कोई मिलावट। अब बात करते हैं फॉस्फोरस की वास्तविक मात्रा की। डीएपी में 46% जो लिखा होता है, वह पी₂O₅ के रूप में होता है, न कि शुद्ध फॉस्फोरस के रूप में।

वास्तविक फॉस्फोरस लगभग 20% के आसपास होता है। यही कारण है कि डीएपी को सुपर फॉस्फेट की तुलना में अधिक प्रभावी माना जाता है, क्योंकि उसमें फॉस्फोरस की सांद्रता अधिक होती है। फील्ड स्तर पर देखा गया है कि हल्के रंग का डीएपी तेजी से असर दिखाता है, जबकि गहरे रंग वाला डीएपी थोड़ा धीमा काम कर सकता है।

इसलिए किसान भाइयों को सलाह है कि रंग के आधार पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता और घुलनशीलता के आधार पर डीएपी का चयन करें। सही जानकारी ही सबसे बड़ा हथियार है। यदि आप इन बातों को समझ लेते हैं, तो कोई भी आपको गलत डीएपी बेचकर धोखा नहीं दे सकता। हमेशा विश्वसनीय विक्रेता से खरीदें, बिल लें और शक होने पर छोटे स्तर पर परीक्षण जरूर करें।

यह भी पढ़े: ह्यूमिक एसिड या माइकोराइजा: फसल की बंपर पैदावार के लिए कौन है असली ‘पावर हाउस’?

जागरूक रहिए व नुकसान से बचिए और अन्य लोगों के जागरूकता के लिए साझा करें। कृषि लेख, सरकारी योजनाएं, कृषि तकनीक, व्यवसायिक एवं जैविक खेती से संबंधित सटीक जानकारियां प्राप्त करने के लिए जुड़े कृषि जागृति चलो गांव की ओर से या कृषि संबंधित किसी भी समस्या के जैविक समाधान के लिए WhatsApp करें।

Leave a Comment