बैंगन में सूत्रकृमि (निमेटोड) का प्रकोप: लक्षण, गांठों की पहचान और बचाव के वैज्ञानिक तरीके

बैंगन की खेती में जब पौधे बिना किसी स्पष्ट कारण के पीले पड़ने लगें, बढ़वार रुक जाए और दोपहर में मुरझाने लगें, तो इसका सबसे बड़ा कारण जमीन के नीचे छिपा ‘जड़ गांठ सूत्रकृमि’ (Root-knot Nematode) हो सकता है। नर्सरी और हल्की बलुई मिट्टी में यह परजीवी सूत्रकृमि जड़ों पर हमला करके 50 से 80 प्रतिशत तक फसल बर्बाद कर देता है। अक्सर किसान इसे पोषक तत्वों की कमी समझकर यूरिया डालते रहते हैं, जिससे बीमारी और बढ़ जाती है।

जानिए सूत्रकृमि की गांठों और दलहनी राइजोबियम की गांठों में क्या अंतर है, गेंदा व नीम की खली से जैविक रोकथाम और रासायनिक नियंत्रण का पूरा वैज्ञानिक गणित।

बैंगन में सूत्रकृमि का प्रकोप

बैंगन अत्यंत ही लोकप्रिय और पोषक तत्वों से युक्त फसल है। सम्पूर्ण भारत में इसे व्यापारिक स्तर पर उगाया जाता है। लेकिन, कई सूत्रकृमि प्रजातियां बैंगन के पौधों को संक्रमित करती हैं, जैसे: जड़ गांठ अथवा मूल ग्रंथि सूत्रकृमि और लीजन सूत्रकृमि आदि। यह सूत्रकृमि प्रजातियां बैंगन में आर्थिक नुकसान पहुँचाती हैं।

यह सूत्रकृमि व्यापक रूप से नर्सरी, उपरी भूमि और अच्छी जल निकास वाली भूमि में पाये जाते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा किये गये शोध के आधार पर सूत्रकृमि का ज्यादा प्रकोप होने पर बैंगन में 50 से 60 प्रतिशत तक का नुकसान हो जाता है।

सूत्रकृमि गांठ की सही पहचान

पौधों की जड़ पर दो तरह की गाँठे बनती हैं: एक सूत्रकृमि द्वारा बनाई हुई और दूसरी राइजोबियम जीवाणु द्वारा बनाई हुई। सूत्रकृमि विभिन्न प्रकार की फसलों अथवा पौधों में गाँठे बनाते हैं। जबकि, जीवाणु राइजोबियम, दलहनी फसलों की जड़ों में गाँठे बनाता है। सूत्रकृमि जनित गाँठे फसल में पोषक तत्वों के ग्रहण करने की क्षमता को कम करती हैं।

जबकि, राइजोबियम की गाँठे दलहनी फसलों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करके लाभ पहुँचाती हैं। सूत्रकृमि की गाँठे जड़ के चारों ओर गोल आकृति में बनती हैं, जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। जबकि, जीवाणु की गाँठे जड़ की एक तरफ बनती हैं, जिन्हें रगड़कर आसानी से अलग कर सकते हैं।

पौधों में दिखने वाले लक्षण

सूत्रकृमि के लक्षण खेत में गुच्छों में और कुछ क्षेत्र में पाये जाते हैं। बैंगन के सूत्रकृमि से ग्रसित पौधों की निचली पत्तियां पीली पड़ जाती हैं। पौधे मुरझा जाते हैं। पौधे बौने रह जाते हैं। पौधों में फूल और फल देरी से लगते हैं। फलों का आकार छोटा होता है और उनकी गुणवत्ता में कमी आ जाती है। पौधों की जड़ को उखाड़कर देखने पर यह दिखता है, कि पौधे की जड़े सीधी न होकर आपस में गुच्छा बना लेती हैं और पौधे की जड़ों में गांठे दिखाई देती हैं।

उत्पादन में 80% तक नुकसान

बैंगन के खेत में सूत्रकृमि प्राथमिक और द्वितीयक जड़ों को प्रभावित करके फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। संक्रमित जड़ों भिन्न-भिन्न आकार की गांठें बनाते हैं। सूत्रकृमियों की संख्या अधिक होने पर पौधों द्वारा पानी और दूसरे पोषक तत्वों को प्राप्त करने में अवरोध उत्पन्न होता है। जिससे फसल की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है और उत्पादन में भी कमी आती है।

क्योंकि, पौधे कमजोर, बौने, पीले हो जाते हैं। इससे ग्रसित पौधों में अन्य रोग जैसे उकठा, फफूंदी आदि भी शीघ्र लग जाते हैं। सामान्य अवस्था में इस रोग से 20 से 40 प्रतिशत तक नुकसान होता है। परन्तु रोग की अधिकता होने पर 70 से 80 प्रतिशत तक भी हानि हो सकती है।

जैविक प्रबंधन और रक्षक फसलें

फसल चक्र: सूत्रकृमियों की कई प्रजातियां जैसे: मेलोइडोगायनी, ग्लोबोडेरा, हेटरोडेरा आदि मृदा में लंबे समय तक सक्रिय नहीं रहते हैं। अतः फसल चक्र अपनाकर इनका रोकथाम की जा सकती है। जिन खेतों में जड़ गांठ सूत्रकृमि का प्रकोप हो रहा है, वहां ऐसी सब्जियों अथवा फसलों का चुनाव करें, जिनमें यह नहीं लगता जैसे मक्का, गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि।

स्वच्छ कृषि औजारों का प्रयोग: एक खेत से दूसरे खेत में कृषि औजारों के प्रयोग से पहले इन्हें अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए। ताकि, सूत्रकृमि एक खेत से दूसरे खेत में कृषि औजारों के माध्यम से न जा पाए।

रोग रहित पौध का चुनाव: स्वस्थ, साफ और रोगरहित पौध का चुनाव करना चाहिये।

कार्बनिक खाद का प्रयोग: यह खादें सूत्रकृमियों के प्रति प्रतिरोध उत्पन्न करने वाले कुछ ऐसे कवक और बैक्टीरिया को बढ़ावा देती हैं, जिससे इनका प्रभाव कम हो जाता है। खादों को भूमि की जुताई करते समय अथवा बीज बोने अथवा पौध लगाने के 20 से 25 दिन पहले डालना चाहिये। इनमें मुख्यतया नीम, सरसों, महुआ, अरंडी आदि की खली 7 से 10 किलो प्रति एकड़ की दर से डालें।

रक्षक फसलें: कुछ फसलें जैसे: सतावर आदि जड़ गांठ सूत्रकृमि की संख्या को कम कर देते हैं। ये फसलें रक्षक फसलें कहलाती हैं। इनके अलावा कुछ ऐसे फसलें, जिनकी जड़ों से ऐसे रासायनिक पदार्थ स्रावित होते हैं जो सूत्रकृमियों के लिये विष का काम करते हैं जैसे गेंदा आदि। इन्हें मुख्य फसलों के बीच में या मुख्य फसल के चारों तरफ 2 से 3 कतारों में लगाना चाहिए।

रोग ग्रस्त पौधों को नष्ट करके: यदि शुरुआत में सूत्रकृमि का प्रकोप बहुत कम है, तो रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ देना चाहिये। रोग का प्रकोप कम हो जाता है।

ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई: मई-जून के महीने में खेतों में 15 से 30 सेंटीमीटर गहरी जुताई करके छोड़ देनी चाहिए जिससे सूत्रकृमियों के अण्डे और डिंभक उपरी सतह पर आ जाते हैं जो सूर्य ताप द्वारा नष्ट हो जाते हैं।

खरपतवार नियंत्रण: खेतों में उगने वाले कई प्रकार के खरपतवारों पर सूत्रकृमि पनाह लेकर पोषण प्राप्त करके अपना जीवन चक्र पूरा कर लेते हैं। आने वाली फसल पर आक्रमण करके हानि पहुंचाते हैं। अतः समय-समय पर खरपतवारों का नियंत्रण करते रहें।

रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन: सूत्रकृमियों के प्रबंधन का यह सबसे सरल सस्ता और प्रभावकारी उपाय है कि प्रतिरोधी किस्में उगानी चाहिए।

रासायनिक नियंत्रण और पौध शोधन

कार्बोफ्यूरान 30 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ भूमि में मिलायें अथवा बीज दर से उपचारित करें। पौध को कार्बोसल्फान 25 ईसी 500 पीपीएम से 1 घंटे तक उपचारित करने के बाद लगायें। डाइक्लोरोप्रोपेन अथवा ऑक्सामाइल 2 से 3 क्विंटल प्रति एकड़ अथवा थिमेट 40 किग्रा प्रति एकड़ की दर से भूमि में मिलाना चाहिये। उपो ने यासफूओपायारोन 100 ग्राम प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर 150 लीटर पानी प्रति एकड़ छिड़काव करें।

बैंगन में सूत्रकृमि रोकथाम के 3 बड़े वैज्ञानिक उपाय

गेंदे की रक्षक फसल (Trap Cropping): गेंदा (Marigold) की जड़ों से ‘अल्फा-टरथिएनिल’ नामक प्राकृतिक रसायन निकलता है, जो सूत्रकृमि के लिए विष का काम करता है। बैंगन के खेत के चारों तरफ या बीच में 2-3 लाइनें गेंदे की जरूर लगाएं।

नीम व सरसों की खली का प्रयोग: खेत की अंतिम जुताई के समय 7 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से नीम, सरसों या अरंडी की खली मिट्टी में मिलाएं। यह सूत्रकृमि-रोधी मित्र कवक को बढ़ाती है।

ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई व फसल चक्र: मई-जून की तेज धूप में 20 से 25 सेमी गहरी जुताई करने से सूत्रकृमि के अंडे और लार्वा नष्ट हो जाते हैं। बैंगन के बाद खेत में मक्का, ज्वार या गेहूं लगाएं।

निष्कर्ष: बैंगन की फसल में जड़ गांठ सूत्रकृमि एक मौन संहारक की तरह काम करता है, जो पौधे की भोजन-पानी खींचने वाली नसों को ही बंद कर देता है। केवल ऊपर से दवाएं छिड़कने से इसका समाधान कभी नहीं हो सकता; इसके लिए जमीन की सेहत सुधारना अनिवार्य है। ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई, नीम-सरसों की खली का प्रयोग, गेंदे की रक्षक कतारें और रोपाई से पहले कार्बोसल्फान से पौध उपचार का समेकित तरीका ही बैंगन को इस बीमारी से 100% सुरक्षा दे सकता है। किसान भाई बीमारी के लक्षण पहचानते ही सतर्क हों और सही वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाकर अपनी मेहनत व पैदावार सुरक्षित रखें।

अस्वीकरण (Disclaimer): यह तकनीकी जानकारी Anil Kumar Prasad द्वारा अपने 5 वर्षों के व्यावहारिक खेती के अनुभव और कृषि विश्वविद्यालयों/वैज्ञानिक अनुसंधानों (ICAR/CIB&RC) के आधार पर साझा की गई है। किसी भी कीटनाशक, फफूंदनाशक या रासायनिक उर्वरक के प्रयोग से पहले अपने स्थानीय कृषि रक्षा केंद्र, KVK या उद्यान विभाग की सलाह अवश्य लें और लेबल-क्लेम नियमों का पालन करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. बैंगन में जड़ गांठ सूत्रकृमि (Root-knot Nematode) के शुरुआती लक्षण क्या हैं?

उत्तर: खेत में जगह-जगह गुच्छों में पौधे बौने रह जाते हैं, निचली पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, पौधे दोपहर की धूप में मुरझाते हैं और जड़ उखाड़ने पर मोटी-मोटी गांठें दिखाई देती हैं।

Q2. सूत्रकृमि की गांठ और राइजोबियम की गांठ में क्या मुख्य अंतर है?

उत्तर: सूत्रकृमि की गांठें जड़ के चारों ओर अभिन्न रूप से जुड़ी होती हैं जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता, जबकि राइजोबियम की गांठें जड़ की सतह पर बाहर चिपकी होती हैं और रगड़ने पर आसानी से अलग हो जाती हैं।

Q3. गेंदा लगाने से सूत्रकृमि कैसे नियंत्रित होता है?

उत्तर: गेंदे की जड़ों से निकलने वाला प्राकृतिक स्राव सूत्रकृमि के अंडों और लार्वा को नष्ट कर देता है, जिससे खेत में इनकी आबादी तेजी से घट जाती है।

Q4. बैंगन की पौध (Nursery) को सूत्रकृमि से कैसे बचाएं?

उत्तर: पौध रोपाई से पहले पौधों की जड़ों को कार्बोसल्फान 25 ईसी (500 पीपीएम) के घोल में 1 घंटे तक उपचारित करके ही मुख्य खेत में लगाना चाहिए।

Q5. सूत्रकृमि नियंत्रण के लिए कौन-सा फसल चक्र सबसे बेहतर है?

उत्तर: जिन खेतों में सूत्रकृमि का प्रकोप हो, वहां बैंगन के बाद सोलेनेसी कुल (टमाटर, मिर्च) न लगाएं; इसके बजाय मक्का, गेहूं, ज्वार या बाजरा जैसी फसलें लें।

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