छत्तीसगढ़ में पानी और खेती को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। खबरों के अनुसार प्रशासन ने जलाशयों में उपलब्ध पानी के उपयोग को लेकर नई प्राथमिकताएं तय की हैं, जिनमें उद्योगों को प्राथमिकता देने की बात सामने आई है। साथ ही गर्मी के मौसम में धान की फसल लेने वाले किसानों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
इस फैसले ने किसानों के बीच चिंता और असंतोष दोनों बढ़ा दिए हैं। किसान पूछ रहे हैं कि आखिर पानी पर पहला अधिकार किसका होना चाहिए? उस किसान का जो देश के लिए अन्न पैदा करता है या उन उद्योगों का जो उत्पादन और व्यापार से जुड़े हैं? यह सवाल केवल छत्तीसगढ़ का नहीं बल्कि पूरे देश में जल प्रबंधन और कृषि नीति से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।
दरअसल छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। यहां की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है और लाखों किसान धान उत्पादन से अपनी आजीविका चलाते हैं। ऐसे में यदि किसानों को यह कहा जाए कि गर्मी के मौसम में धान की खेती न करें, अन्यथा कार्रवाई होगी, तो स्वाभाविक रूप से चिंता बढ़ेगी।
किसानों का तर्क है कि यदि सरकार धान उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती है, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद करती है और रिकॉर्ड उत्पादन के दावे करती है, तो फिर खेती के लिए पानी पर प्रतिबंध क्यों लगाया जा रहा है? जल संसाधन विशेषज्ञों का मानना है कि धान एक अधिक पानी मांगने वाली फसल है।
गर्मी के मौसम में जलाशयों का जलस्तर तेजी से घटता है और पीने के पानी के साथ-साथ उद्योगों तथा अन्य आवश्यक गतिविधियों के लिए भी पानी की जरूरत होती है। इसलिए कई राज्यों में गर्मी के दौरान धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों को सीमित करने की सलाह दी जाती है। लेकिन किसानों का कहना है कि यदि फसल पर रोक लगाई जा रही है तो उसके विकल्प भी स्पष्ट होने चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसानों को पहले से ऐसी फसलों के बारे में पर्याप्त जानकारी और आर्थिक सहायता दी गई है जो कम पानी में बेहतर उत्पादन दे सकें? केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। किसानों को वैकल्पिक फसलें, बाजार, बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और न्यूनतम मूल्य की गारंटी भी देनी होगी।
कई किसान संगठनों का कहना है कि यदि जलाशयों में पानी की कमी है तो उसका भार केवल किसानों पर नहीं डाला जा सकता। जल प्रबंधन में उद्योगों, शहरी क्षेत्रों और अन्य क्षेत्रों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। किसानों का तर्क है कि कृषि क्षेत्र पहले से ही मौसम की मार, बढ़ती लागत और बाजार की अनिश्चितताओं का सामना कर रहा है।
ऐसे में पानी पर अतिरिक्त प्रतिबंध उनकी आय को और प्रभावित कर सकते हैं। दूसरी ओर प्रशासन का पक्ष यह है कि सीमित जल संसाधनों का वैज्ञानिक और संतुलित उपयोग जरूरी है। यदि जलाशयों का पानी पूरी तरह कृषि में उपयोग हो गया और बाद में पेयजल संकट खड़ा हो गया तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। इसलिए सरकार जल उपयोग की प्राथमिकताएं तय कर रही है।
हालांकि इस नीति को लेकर सबसे अधिक बहस उद्योगों को प्राथमिकता दिए जाने के मुद्दे पर हो रही है। किसानों का मानना है कि अन्न उत्पादन और खाद्य सुरक्षा किसी भी देश की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसलिए जल नीति बनाते समय किसानों के हितों और जमीनी परिस्थितियों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
यदि किसी क्षेत्र में धान की खेती सीमित करनी है तो किसानों के लिए वैकल्पिक आजीविका और फसल मॉडल भी तैयार किए जाने चाहिए। आज आवश्यकता केवल प्रतिबंध लगाने की नहीं बल्कि दीर्घकालिक जल प्रबंधन नीति बनाने की है। सूक्ष्म सिंचाई, वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण, फसल विविधीकरण और वैज्ञानिक खेती जैसी तकनीकों को बड़े स्तर पर बढ़ावा देना होगा। तभी जल संकट और कृषि दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सकेगा।
किसान देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ हैं। इसलिए जल संसाधनों के उपयोग से जुड़े किसी भी निर्णय में किसानों की भागीदारी, संवाद और हितों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। जल संरक्षण भी जरूरी है और किसान की आजीविका भी। नीति ऐसी होनी चाहिए जो दोनों के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
निष्कर्ष: जल संकट और कृषि आजीविका के बीच संतुलन बनाना केवल प्रतिबंधों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए एक समावेशी और दीर्घकालिक जल नीति की आवश्यकता है। छत्तीसगढ़ जैसे कृषि-प्रधान राज्य में, जहाँ धान केवल एक फसल नहीं बल्कि लाखों परिवारों के जीवन का आधार है, पानी के बँटवारे में उद्योगों को तरजीह देना किसानों में असुरक्षा की भावना पैदा करता है।
प्रशासन का जल संरक्षण और पेयजल सुरक्षा का तर्क अपनी जगह सही हो सकता है, लेकिन इसका समाधान किसानों पर एकतरफा कड़े नियम थोपने के बजाय उन्हें फसल विविधीकरण (कम पानी वाली फसलें) के लिए ठोस विकल्प, बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और आर्थिक सुरक्षा गारंटी देकर ही निकाला जा सकता है।
अंततः देश की खाद्य सुरक्षा और अन्नदाताओं के हितों को ताक पर रखकर कोई भी जल प्रबंधन नीति सफल नहीं हो सकती; इसके लिए सरकार, किसानों और विशेषज्ञों के बीच सार्थक संवाद तथा सहयोगात्मक प्रयासों की तुरंत आवश्यकता है।
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