मध्य प्रदेश के दमोह जिले में समर्थन मूल्य (MSP) पर उड़द बेचने वाले लगभग 11,873 किसान पिछले 8 वर्षों से अपने हक के ₹26 करोड़ के भुगतान के लिए दर-दर भटक रहे हैं। वर्ष 2018-19 में ₹5,600 प्रति क्विंटल के सरकारी भाव पर फसल खरीदी गई थी, लेकिन किसानों को केवल ₹3,500 प्रति क्विंटल का आंशिक भुगतान कर प्रति क्विंटल ₹2,100 की राशि रोक दी गई। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद करीब 900 किसानों को तो पैसा मिल गया, लेकिन हजारों किसान आज भी कर्ज और दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। जानिए क्यों रुका था भुगतान, जिला सहकारी बैंक का क्या कहना है और किसानों की वास्तविक स्थिति क्या है।
8 साल से किसान इंतजार कर रहे हैं। समर्थन मूल्य पर उड़द बेचने के बाद भी पूरा पैसा नहीं मिला। दमोह जिले के करीब 11 हजार किसानों की लगभग 26 करोड़ रुपये की राशि आज भी अटकी हुई बताई जा रही है। सवाल यह है कि जिस उपज की खरीद सरकार ने समर्थन मूल्य पर की थी, उसका पूरा भुगतान किसानों को आखिर कब मिलेगा?
8 साल का इंतजार: 11 हजार किसानों के ₹26 करोड़ अटके
मामला वर्ष 2018-19 का है। उस समय उड़द का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP 5600 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित था। दमोह जिले के 11,873 किसानों ने समर्थन मूल्य पर अपनी उड़द सरकारी व्यवस्था के तहत बेची थी। किसानों को उम्मीद थी कि उपज बेचने के बाद उन्हें तय समर्थन मूल्य के अनुसार पूरा भुगतान मिल जाएगा। लेकिन भुगतान के दौरान किसानों को केवल 3500 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से राशि दी गई और करीब 2100 रुपये प्रति क्विंटल का भुगतान रोक दिया गया।
₹5,600 का समर्थन मूल्य और ₹2,100 की कटौती
बताया गया कि उड़द खरीदी में कुछ गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आने के बाद शासन स्तर से भुगतान पर रोक लगा दी गई थी। इसके बाद किसानों को आंशिक भुगतान तो मिला, लेकिन शेष राशि वर्षों बीतने के बावजूद नहीं मिल सकी। आज हालत यह है कि जिन किसानों ने आठ साल पहले अपनी फसल सरकार को बेची थी, वे अब भी अपने ही पैसे के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं।
दमोह जिले की 25 से अधिक समितियां प्रभावित
किसानों के अनुसार यह केवल कुछ लोगों की समस्या नहीं है, बल्कि हजारों किसानों से जुड़ा मामला है। बांसा तारखेड़ा, हिंडोरिया, अर्थखेड़ा, सरखड़ी, खेजराकला, बकायन, खड़ेरी, मगरोन, गैसाबाद, मडियादो, सिग्रामपुर, घटेरा-बनवार, चिरौला, हिनौती-पुतरीघाट, भैंसा, सनकुइया, मुडिया, गुंजी-नोनपानी, बेलखेड़ी, बकेनी, केवलारी, फुटेराकला, लुहारी, हिनोता कला, भिलौनी-खमरिया, देवरी फतेहपुर, देवडोंगरा, कुंडलपुर और बरोदाकला समेत कई समितियों से जुड़े किसानों की राशि अटकी होने की बात सामने आई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसानों को उनका पूरा भुगतान कब मिलेगा? आठ साल का समय कोई छोटा समय नहीं होता। इस दौरान कई किसानों की आर्थिक स्थिति बदली, कई किसान कर्ज में गए, कई ने नई फसलें उगाईं और कई परिवारों की जरूरतें बढ़ीं। लेकिन 2018-19 में बेची गई फसल का पैसा आज भी किसानों के खाते तक नहीं पहुंच पाया।
मामले में किसानों ने कई बार अधिकारियों और प्रशासन के सामने अपनी समस्या रखी। ज्ञापन दिए गए और भुगतान की मांग की गई। लेकिन किसानों का आरोप है कि उन्हें स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही है कि उनकी रुकी हुई राशि कब जारी होगी। कई किसान समिति स्तर से लेकर जिला स्तर तक जानकारी लेने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
हाईकोर्ट के आदेश से 900 को राहत, बाकी अब भी कतार में
इस मामले में वर्ष 2022 में कुछ किसान हाईकोर्ट भी पहुंचे थे। कोर्ट के आदेश के बाद करीब 900 किसानों को शेष भुगतान मिल सका, लेकिन बाकी किसान अभी भी अपनी राशि के इंतजार में हैं। यानी न्यायिक हस्तक्षेप के बाद कुछ किसानों को राहत मिली, लेकिन बड़ी संख्या में किसान अब भी उसी समस्या का सामना कर रहे हैं।
किसान बोले- कर्ज में डूबे; बैंक बोला- शासन से होगा फैसला
दमोह के किसान नेता हरिश्चंद्र पटेल गुड्डू का कहना है कि वर्ष 2018-19 में समर्थन मूल्य पर उड़द खरीदी गई थी और तब से हजारों किसान परेशान हैं। किसानों की ओर से लगातार ज्ञापन दिए गए हैं, लेकिन अब तक समस्या का समाधान नहीं हुआ है। किसानों का कहना है कि समिति स्तर पर भी उन्हें स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा रही है।
बेलखेड़ी के किसान हेमंत उदेनिया का कहना है कि उन्होंने उड़द 5600 रुपये प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य पर बेची थी, लेकिन भुगतान केवल 3500 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से हुआ। उनका कहना है कि पिछले आठ वर्षों में कई बार कृषि अधिकारियों और कलेक्टर कार्यालय के चक्कर लगाए गए, लेकिन अब तक शेष भुगतान नहीं मिला।
वहीं सकतपुर के किसान कोमल पटेल का कहना है कि भुगतान रुकने के बाद किसानों पर जो कर्ज बना, वह आज तक पूरी तरह नहीं चुकाया जा सका। उनका कहना है कि अगर सरकार इस वर्ष किसानों की वर्षों पुरानी रुकी हुई राशि का भुगतान कर दे तो इससे बेहतर राहत किसानों के लिए कुछ नहीं हो सकती।
जिला सहकारी बैंक के जीएम एसके कनौजिया के अनुसार इस संबंध में पत्र प्राप्त हुआ है और समितियों के प्रबंधकों को आवश्यक निर्देश दिए गए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भुगतान शासन स्तर से होना है, इसलिए इस संबंध में इससे अधिक जानकारी नहीं दी जा सकती।
फैक्ट की बात करें तो 2018-19 में दमोह जिले के 11,873 किसानों ने समर्थन मूल्य पर उड़द बेची थी। उस समय उड़द का MSP 5600 रुपये प्रति क्विंटल था। किसानों को 3500 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से भुगतान किया गया और शेष राशि रोक दी गई। करीब 900 किसानों को कोर्ट के आदेश के बाद शेष भुगतान मिल सका, जबकि बड़ी संख्या में किसानों की राशि अब भी अटकी हुई बताई जा रही है। किसानों के अनुसार कुल बकाया राशि करीब 26 करोड़ रुपये है।
गड़बड़ी की सजा किसान को क्यों? तुरंत हो भुगतान
आज जब किसानों की आय, कृषि लागत और समय पर भुगतान की बात की जाती है, तब आठ साल पुराने इस मामले को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। किसान अपनी फसल बेचने के बाद भुगतान के लिए वर्षों तक इंतजार करे, यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अगर किसी खरीदी में गड़बड़ी हुई थी तो उसकी जांच और जिम्मेदारी तय करना अलग विषय है, लेकिन किसानों की मेहनत की उपज का पैसा रोककर रखना समाधान नहीं हो सकता।
किसानों का कहना है कि उन्हें यह स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए कि उनकी राशि किस कारण से रोकी गई है, भुगतान की प्रक्रिया क्या है और भुगतान कब तक किया जाएगा। दमोह के किसानों की मांग सीधी है—2018-19 में समर्थन मूल्य पर बेची गई उड़द की बची हुई राशि का भुगतान किया जाए। आठ साल से इंतजार कर रहे किसानों को अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि उनके हक का पैसा चाहिए।
किसान भाइयों, आपके जिले में भी अगर समर्थन मूल्य पर बेची गई फसल का भुगतान लंबे समय से अटका हुआ है, तो अपनी समस्या जरूर बताइए। WhatsApp पर अपना जिला, फसल और कितने समय से भुगतान रुका है, यह लिखें। हो सकता है आपकी आवाज भी जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचे।
अस्वीकरण: यह विश्लेषणात्मक रिपोर्ट Anil Kumar Prasad द्वारा आधिकारिक आंकड़ों, विभिन्न विश्वसनीय समाचार स्रोतों और जमीनी कृषि वास्तविकताओं के निष्पक्ष अध्ययन के आधार पर तैयार की गई है। इसका उद्देश्य नीतिगत निर्णयों और बाजार की स्थिति से किसानों को अवगत कराना है। इस विषय पर अपने क्षेत्र की स्थिति और विचार हमारे WhatsApp पर जरूर साझा करें।
निष्कर्ष: देश में जब किसानों की आय दोगुनी करने और समय पर पारदर्शी डीबीटी भुगतान के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों, तब मध्य प्रदेश के दमोह में 11 हजार से अधिक किसानों के ₹26 करोड़ आठ साल तक अटके रहना समूची कृषि विपणन व्यवस्था पर एक गहरा धब्बा है।
किसान ने अपना पसीना बहाकर सरकारी तौल कांटे पर उपज दी थी, किसी जांच या विभागीय लापरवाही की सजा अन्नदाता को नहीं दी जा सकती। शासन और प्रशासन को चाहिए कि बिना किसी और देरी के सभी शेष पात्र किसानों के खातों में ₹2,100 प्रति क्विंटल की रुकी हुई राशि का तुरंत भुगतान करे, ताकि आठ साल से कर्ज और हताशा झेल रहे किसानों को वास्तविक न्याय मिल सके।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. दमोह जिले में उड़द खरीद का यह भुगतान विवाद क्या है?
उत्तर: वर्ष 2018-19 में दमोह जिले के 11,873 किसानों ने ₹5,600 प्रति क्विंटल के MSP पर उड़द बेची थी, लेकिन सरकार ने केवल ₹3,500 का भुगतान किया और ₹2,100 प्रति क्विंटल की दर से लगभग ₹26 करोड़ की राशि 8 साल से रोक रखी है।
Q2. सरकार ने किसानों का यह भुगतान क्यों रोका था?
उत्तर: उड़द खरीद प्रक्रिया में कुछ समितियों में कथित गड़बड़ियों और अनियमितताओं की शिकायतें सामने आने के बाद शासन स्तर से शेष भुगतान पर रोक लगा दी गई थी।
Q3. क्या इस मामले में अदालत से कोई राहत मिली थी?
उत्तर: हाँ, वर्ष 2022 में कुछ किसानों द्वारा याचिका दायर करने के बाद माननीय हाईकोर्ट के आदेश पर लगभग 900 किसानों को उनकी बकाया राशि का भुगतान किया गया था, लेकिन बाकी किसान अभी भी वंचित हैं।
Q4. जिला सहकारी बैंक के अधिकारियों का इस पर क्या रुख है?
उत्तर: जिला सहकारी बैंक के जीएम एस.के. कनौजिया के अनुसार शासन स्तर से निर्देश मिलने पर ही भुगतान संभव है, क्योंकि यह राशि सीधे राज्य शासन द्वारा जारी की जानी है।
Q5. किन-किन समितियों के किसानों की राशि अटकी हुई है?
उत्तर: हिंडोरिया, बांसा तारखेड़ा, गैसाबाद, मडियादो, सिग्रामपुर, कुंडलपुर, बेलखेड़ी, घटेरा-बनवार और बरोदाकला सहित दमोह जिले की 25 से अधिक सहकारी समितियों के किसानों का भुगतान बकाया है।
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मेरा नाम Anil Kumar Prasad है। मैं एक प्रगतिशील किसान हूं और पिछले 5 वर्षों से खेती की बारीकियों को धरातल पर सीख और समझ रहा हूं। ‘कृषि जागृति – चलो गांव की ओर’ के माध्यम से मैं अपने निजी अनुभव और खेती की सटीक जानकारी साझा करता हूं। मेरा उद्देश्य सरकारी योजनाओं, आधुनिक तकनीक और जैविक खेती के जरिए साथी किसानों को सशक्त बनाना है।
