धान, गेहूं और अधिकांश फसलों में यूरिया सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला नाइट्रोजन उर्वरक है। हर किसान जानता है कि यूरिया डालने से फसल जल्दी हरी होती है और बढ़वार तेज होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यूरिया में मौजूद 46% नाइट्रोजन का पूरा लाभ फसल को कभी नहीं मिल पाता? वास्तव में खेत में डाली गई यूरिया का बड़ा हिस्सा या तो गैस बनकर हवा में उड़ जाता है, या पानी के साथ बहकर जड़ों से नीचे चला जाता है।
कई शोध बताते हैं कि कई परिस्थितियों में यूरिया की 40 से 60 प्रतिशत तक नाइट्रोजन पौधों तक पहुंचने से पहले ही नष्ट हो जाती है। यही कारण है कि केवल अधिक यूरिया डालने से अधिक उत्पादन नहीं मिलता, बल्कि सही समय, सही मात्रा और सही तरीके से उपयोग करना अधिक महत्वपूर्ण होता है।
मिट्टी में यूरिया कैसे बदलती है? (अमोनिफिकेशन और नाइट्रीफिकेशन)
यूरिया का रासायनिक सूत्र CO(NH₂)₂ होता है और इसमें लगभग 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है। लेकिन यह नाइट्रोजन सीधे पौधों को उपलब्ध नहीं होती। जैसे ही यूरिया मिट्टी में पहुंचती है और उसे नमी मिलती है, मिट्टी में मौजूद यूरेज (Urease) एंजाइम इसे तोड़ना शुरू कर देता है। इस प्रक्रिया को अमोनिफिकेशन (Ammonification) कहते हैं।
लगभग 2 से 4 दिनों में यूरिया अमोनियम (NH₄⁺) में बदल जाती है। पौधे इस अमोनियम रूप में भी कुछ मात्रा में नाइट्रोजन का अवशोषण कर लेते हैं। यही कारण है कि यूरिया डालने के कुछ दिनों बाद फसल में हरियाली दिखाई देने लगती है।
इसके बाद मिट्टी में मौजूद विशेष लाभकारी जीवाणु इस अमोनियम को आगे नाइट्राइट (NO₂⁻) और फिर नाइट्रेट (NO₃⁻) में बदल देते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को नाइट्रीफिकेशन (Nitrification) कहा जाता है। सबसे पहले Nitrosomonas बैक्टीरिया अमोनियम को नाइट्राइट में बदलता है और उसके बाद Nitrobacter बैक्टीरिया नाइट्राइट को नाइट्रेट में परिवर्तित करता है। पौधे मुख्य रूप से नाइट्रोजन को नाइट्रेट रूप में सबसे अधिक ग्रहण करते हैं।
लीचिंग और डिनाइट्रीफिकेशन: जानिए क्यों बर्बाद होती है यूरिया?
यहीं से समस्या शुरू होती है। नाइट्रेट पानी में अत्यधिक घुलनशील होता है। यदि खेत में अधिक सिंचाई कर दी जाए या लगातार पानी भरा रहे, तो नाइट्रेट पानी के साथ जड़ों से नीचे चला जाता है। इस प्रक्रिया को लीचिंग (Leaching) कहा जाता है। दूसरी ओर यदि मिट्टी बहुत सूखी हो, तापमान अधिक हो या खेत में ऑक्सीजन की कमी हो, तो नाइट्रोजन विभिन्न गैसों जैसे नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O), नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) तथा अंत में नाइट्रोजन गैस (N₂) बनकर वातावरण में उड़ जाती है।
इस प्रक्रिया को डिनाइट्रीफिकेशन (Denitrification) कहा जाता है। इसका सीधा नुकसान किसान को होता है क्योंकि खरीदी गई यूरिया का बड़ा भाग फसल तक पहुंच ही नहीं पाता। धान की खेती में यह समस्या और भी गंभीर होती है क्योंकि धान के खेतों में अक्सर लंबे समय तक पानी भरा रहता है। यदि किसान खड़े पानी में यूरिया डाल देता है, तो यूरिया पहले पानी में घुलती है और फिर नाइट्रोजन का बड़ा हिस्सा या तो गैस बनकर उड़ जाता है या पानी के साथ बह जाता है।
इसलिए धान में यूरिया प्रबंधन का सबसे महत्वपूर्ण नियम है कि खेत में लगातार गहरा पानी भरकर यूरिया का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यदि आपने सुबह सिंचाई की है तो यूरिया शाम को डालना बेहतर रहता है। यदि शाम को पानी लगाया है तो अगले दिन सुबह यूरिया डालें। इसके बाद हल्की सिंचाई करें लेकिन खेत को लगातार दो-तीन दिन तक पानी से पूरी तरह भरा न रखें। इससे नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़ती है और नुकसान कम होता है।
यूरिया हमेशा फसल की आवश्यकता के अनुसार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में देना अधिक लाभदायक होता है। एक बार में बहुत अधिक यूरिया डाल देने से पौधे उतनी नाइट्रोजन एक साथ उपयोग नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप अतिरिक्त नाइट्रोजन नष्ट हो जाती है। इसलिए विभाजित मात्रा (Split Application) में यूरिया देना वैज्ञानिक दृष्टि से सबसे उपयुक्त तरीका माना जाता है।
धान की शुरुआती अवस्था में पौधे छोटे होते हैं और उनकी नाइट्रोजन की आवश्यकता भी कम होती है। इसलिए पहली बार लगभग 30 से 35 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ पर्याप्त मानी जाती है। यह पहली मात्रा तब दें जब पौधों में कल्ले (Tillers) निकलना शुरू हों।कम अवधि वाली धान की किस्मों जैसे PR-1509, PR-1692 तथा अन्य जल्दी पकने वाली किस्मों में पहली यूरिया लगभग 20 से 21 दिन बाद देना उपयुक्त रहता है। वहीं लंबी अवधि वाली किस्मों में पहली यूरिया लगभग 20 से 25 दिन बाद दी जाती है।
इसके बाद अगली मात्रा फसल की वृद्धि के अनुसार दें। अंतिम बार यूरिया तभी दें जब पौधे सक्रिय वृद्धि अवस्था में हों। बालियां निकलने के बाद यूरिया देने से सामान्यतः अपेक्षित लाभ नहीं मिलता और कई बार नुकसान भी हो सकता है। यदि किसी किसान को तीन बैग यूरिया की आवश्यकता है लेकिन उपलब्ध केवल दो बैग हैं, तो भी घबराने की आवश्यकता नहीं है।
यदि यही दो बैग चार या पांच छोटी-छोटी किश्तों में सही समय पर दिए जाएं, तो कई बार उनका परिणाम एक साथ अधिक मात्रा देने से बेहतर मिलता है। इसका कारण यह है कि पौधे हर बार उपलब्ध नाइट्रोजन का अधिक उपयोग कर लेते हैं और बर्बादी कम होती है। यूरिया का उपयोग हमेशा मौसम को देखकर करना चाहिए।
तेज धूप, दोपहर या अत्यधिक गर्म समय में यूरिया डालने से नाइट्रोजन का नुकसान अधिक होता है। सामान्यतः 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान पर यूरिया की उपलब्धता बेहतर रहती है। इसलिए सुबह या शाम के समय इसका प्रयोग करना अधिक लाभदायक माना जाता है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि केवल यूरिया ही अच्छी फसल की गारंटी नहीं है।
यदि खेत में जिंक, सल्फर, मैग्नीशियम, आयरन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होगी तो केवल नाइट्रोजन देने से अपेक्षित उत्पादन नहीं मिलेगा। संतुलित पोषण ही अधिक कल्ले, अधिक बालियां और बेहतर दाना भराव सुनिश्चित करता है। आज आवश्यकता अधिक यूरिया डालने की नहीं, बल्कि यूरिया का वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने की है।
सही समय पर, सही मात्रा में, उचित नमी की स्थिति में और विभाजित मात्रा में यूरिया देने से न केवल नाइट्रोजन की बर्बादी कम होती है बल्कि उर्वरक पर होने वाला खर्च भी घटता है और उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है। यदि किसान इन सरल वैज्ञानिक सिद्धांतों को अपनाएं, तो कम यूरिया में भी बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं और खेती अधिक लाभदायक बन सकती है।
निष्कर्ष: यूरिया को केवल एक ‘हरियाली लाने वाली खाद’ समझकर खेत में झोंक देना मिट्टी के स्वास्थ्य और किसान की जेब दोनों के साथ खिलवाड़ है। यूरिया के भीतर छिपी नाइट्रोजन का पूरा लाभ तभी मिल सकता है जब हम मिट्टी के भीतर चलने वाले इसके रासायनिक चक्र को समझें।
खड़े पानी या तेज धूप में यूरिया फेंकने के बजाय मौसम को देखकर ‘विभाजित मात्रा’ (Split Application) में इसका उपयोग करें। याद रखें, सफल खेती अधिक खाद डालने से नहीं, बल्कि सही समय पर संतुलित पोषण के सही प्रबंधन से होती है।
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मेरा नाम Anil Kumar Prasad है। मैं एक प्रगतिशील किसान हूं और पिछले 5 वर्षों से खेती की बारीकियों को धरातल पर सीख और समझ रहा हूं। ‘कृषि जागृति – चलो गांव की ओर’ के माध्यम से मैं अपने निजी अनुभव और खेती की सटीक जानकारी साझा करता हूं। मेरा उद्देश्य सरकारी योजनाओं, आधुनिक तकनीक और जैविक खेती के जरिए साथी किसानों को सशक्त बनाना है।
